बिदअत (Bidat)
बिदअत क्या है?
Ø बिदअत का मतलब है दीन में नया काम शुरू करना जो आप (ﷺ) के दौरे मुबारक के बाद शुरू हुआ।
Ø दीन में एैसा काम करना जिन्हे करने का हुकुम रसुलुल्लाह (ﷺ) ने हमे नही दिया और जिन की असल दिन में मौजुद नही
Ø हर वो काम बिदअत होगा जिसका सबुत कुरआ-व-हदीस में नही मिलता।
Ø हर वो नई चिज जो किताब (कुरआन) व सुन्नत और सलफ व स्वालेहीन से साबीत नही वो बिदअत है
कुछ जरूरी बातें।
हमारा दीन मुकम्मल है, बहोत आसान है और सिधा है, लेकीन लोगो ने इस में नई नई चिजे डाल कर इस को complicated बना दिया है।
बिदअत एक एैसा गुनाह है जिसे इंसान सवाब समझ कर करता है, अब क्युं की वो बिदअत को सवाब का काम समझ कर करता है इसलिए उसे वो अमल या काम गलत नही लगता।
हमे ये समझना जरूरी है के, वो कौनसी नई चिजे है (या नए काम है) जो आप (ﷺ) के बाद दीन में शुरू हुए । इन्शाल्लाह हम हर वो बिदअत समझने की कोशिश करेंगे जो आज दीन के नाम पे की जा रही है।
कुरआन
आज मै ने तुम्हारे लिए तुम्हारे दिन को मुकम्मल कर दिया, और तुम पर अपनी न्यामत को पुरा कर दिया और तुम्हारे लिए दिने इस्लाम को पसंद किया। (सुरा मैदाह (५), आयत-३)।
पता चला के हमारा दीन मुकम्मल है और अब इस में कुछ अपनी तरफ से नही जोड सकते और ना ही घटा सकते, ये दीन अल्लाह का है, उस ने हमारे लिए ये पसंद किया ।
हदीस
बेशक तुम्हारे लिए अल्लाह के रसुल (ﷺ) की जिंदगी एक बहेतरीन नमुना है। (सुराह अल-अहजाब, आयत नं. २१)
हर नया काम बिदअत है, और हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहान्नुम मे ले जाएगी (Sahih Muslim, Hadith-८६७ & Sunan Nisai-Hadith १५७९)
हजरत अब्दुल्लाह-बिन-मसुद (रजि) बयान करते है के, रसुलुल्लाह (ﷺ) ने एक सिधी लकीर खिंच कर फरमाया, ये अल्लाह तआला का रस्ता है। फिर आप ने दाए और बाए चंद लकीरे खिंच कर फरमाया, ये बहोत से रास्ते जो है इन में से हर एक रास्ते पर शैतान बैठा है, जो अपनी तरफ दावत देता है और आप (ﷺ) ये आयत तिलावत फरमाई - --और ये के ये है मेरा सिधा रास्ता तो इस रास्ते पर चलो, और राहे ना चलो के तुम्हे इस की राह से जुदा कर देगी।।।।।--
(सुरे अनम (६), आयत-१५३)
और जो नबी-ए-पाक तुम्हे दे वो लो और जिस से रोक दे रुके रहो
(सुरे हशर (५९),आयत-७)।
एै लोगो इस पर चलो जो तुम्हारी तरफ तुम्हारे रब के पास से उतरा इसे छोड कर और हाकीमो के पिछे ना जाओ बहोत ही कम समझते हो
(Surah Airaf(७), Ayat-३)
हदीसे कुदसी है "सब से बहेतरीन किताब अल्लाह की है और सब से बहेतरीन तरीका नबी-ए-पाक (ﷺ) का है और सब से बद-तरीन तरीका बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है
(Sahih Muslim ,Book ४, Hadith १८८५)
नबी-ए-पाक (ﷺ) ने फरमाया "लोगो दिन पे ज्यादा जोर ना दो, ज्यादा सवाल ना करो के तुमसे पहेले लोग भी इसी वजाह से तबाह हुए, सो जो मैं तुम्हे कहुं वो करो और जिस से रोकु रुके रहो और उतना ही करो जितना मै ने कहा।"
(Sahih Bukhari, Volume ९, Book ९२, Number ३९१)
और जो शख्स अल्लाह और उस के रसुल (ﷺ) की ना-फरमानी करे और उस की मुकर्रर हदो से आगे निकले उसे वो जहान्नुम मे डाल देगा जिस में वो हमेशा रहेगा एैसो ही के लिए रुस्वाकुन अजाब है
(सुरे निसा (४), आयत-१४)
अपने दिन के बारे में हद से ना गुजर जाओ।।।।।।।।।।।।।।।।।
(सुरे निसा (४), आयत-१७१)
हजरत आयशा (रजि) से रिवायत है के, रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया की जिस ने हमारे इस दिन मे कुछ एैसी बात शामील की जो उस में से नई है तो वो मरदुद (रद्द) है।
(Sahih al-Bukhari-२६९७, Sahih Muslim-१७१८)
रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया की मेरी सुन्नत और खुलफा राशिदीन की सुन्नत को दांतो की मजबुती से पकडे रहेना और हर नयी चिज जो दिन मे निकाली जाए उस से बचना क्युंकी हर नई चिज गुमराही है।
[Musnad Ahmad (४/१२६) and at-Tirmidhee (२६७६)]
रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया की जब भी कभी एक रसुल भेजा जाता था तो उस के कुछ हवारी और सहाबा होते थे, वो सहाबी, अपने नबी की सुन्नतो को मजबुती से पकड लेते थे और उसी पर जामे रहते थे। फिर हमेशा एैसा हुआ है की उन के बाद कुछ एैसे लोग पैदा हुए जो वो कहते थे करते ना थे, और करते वो थे जिस का हुकूम भी नही हुआ था। तो सुन लो जो उन से जिहाद करेगा अपने हाथो से, अपने जुबान से, अपने दिल से वो मोमीन होगा, और इस के बाद इमान तो राई के दाने के बराबर भी नही है।
(Sahih Muslim, The Book of Faith (Kitabul-Iman) [Book-००१ hadees-००८१]
पता चला के बिदअत करने वाले को हाथ से रोको, ये ना कर सको तो जबान से रोको, ये ना कर सको तो दिल में इस चिûज को बुरा जानो लेकीन दिल में बिदअत को बुरा जान्नेवाला सब से कम इमानवाला है।
अगर कोई शख्स बिदअत इजाद करता है तो वो जिम्मेदार होगा इस के लिए। अगर कोई शख्स बिदअत इजाद करता है या किसी बिदअती को पनाह देता है, तो उस पर अल्लाह, उस के फरीश्तो और सारे लोगो की लानत होती है। (Sunan of Abu-Dawood Hadith ४५१५)
Allah BIDDATI ki Namaz, roza, haj, zakat, kisi bhi amal ko qabool nahi karta
(Sunan ibne Majah, Hadees- ४९)
"(कयामत के दिन) फिर मेरे पैरोकारो को दाए (जन्नत की) तरफ ले जाया जाएगा, लेकीन बाûज को बाए (यानी जहान्नम की) तरफ घसीटा जाएगा। मै कहुंगा -एै मेरे रब! मेरे उम्मती!-, लेकीन मुझे (अल्लाह तआला की तरफ से) बताया जाएगा के -(एै नबी) आप नही जानते उन्हो ने आप के बाद क्या किया, जब आप इनसे जुदा हुए तो ये इस्लाम से फिर गए थे-। मैं उस वक्त वही कहुंगा जो (अल्लाह के) नेक बंदे ईसा-इब्ने-मरीयम ने कहा था के -मैं इन पर गवाह रहा जब तक इन में मौजुद रहा। फिर जब तु ने मुझको उठा लिया तो तु ही इन पर निगरान रहा। और तु हर चिज से खबरदार है"।
(सहीह बुखारी-३४४७)
रसुलुल्लाह (ﷺ) हौजे कौसर से अपने उम्मतीयो वŠो पानी पिला रहे होंगे और उन्हे रोक दिया जाएगा, इन को भी नबी (ﷺ) यही समझेंगे के ये तो मेरे फरमाबरदार उम्मती है लेकीन आप (ﷺ) को मुतला किया जाएगा (बताया जाएगा) के -एै नबी (ﷺ) आप नही जानते के इन्हो ने आप के जाने के बाद क्या कुछ किया, इन्हो ने आप के बाद दिन मे (शरीयत में) नयी-नयी चिजे निकाल ली थी-, तो आप (ﷺ) फरमाएंगे "इन के लिए (रहेमत से) दुरी हो! इन के लिए (रहेमत से) दुरी हो! जिन्हो ने मेरे बाद दिन को बदल डाला"
[Sahih Bukhari, Vol ८, kitabur-Riqaaq, Hadith- ६५८४]
बिदअत कर लिए तो क्या हुआ
कुछ लोग कहते है के, हम ने ये काम (बिदअत) कर लिए तो क्या हुआ? नेक काम ही तो है। तो आईये कुरआन की एक आयत का मुलाहेजा फरमाईये-
रसुल के पुकारने को आपस में एैसा ना ठहरा लो जैसा तुम में एक दुसरे को पुकारता है, बेशक अल्लाह जानता है जो तुम में चुपके निकल जाते है किसी चिûज की आड ले कर तो डरे जो रसुल के खिलाफ करते है के इन्हे कोई फितना पहोंचे या इन पर दर्दनाक अûजाब पडे।
(सुरे नुर (२४) की आयत नं.६३)
तो पता चला के अगर कोई शख्स जानबुछकर बिदअत को नेकी समझ कर करता है तो अल्लाह तआला उस को अûजाब और फितने में मुबतेला कर देता है।
खाने पर फातेहा देना बिदअत है
अगर बिदतीयो को फातेहा की दलील मांगी जाए तो वो निचे वाली हदीस पेश करते है :
"अनस-इब्ने-मालीक (रजि) इस हदीस के रावी है, आप कहते है के, मेरी वालेदा उम्मे सुलेन ने घी और आटे का मलीदा बनाया और एक प्याले में रख के कहा के सरकार (ﷺ) की खिदमत मे इसे लेजाओ और सरकार से कहना के ये मेरी वालेदा उम्मे सुलेन की जानीब से है और आप के बेटे इब्राहीम के लिए है। हजरते इब्राहीम जो रसुलुल्लाह के बेटे थे उन का ४० दिन पहेले इंतेकाल हुआ था। अनस-इब्ने-मालीक (रजि) ये प्याला रसुलुल्लाह के खिदमत मे प्याला ले गए, वहा ७० सहाबी मौजुद थे। अनस-इब्ने-मालीक (रजि) ने कहा के ये मेरी वालेदा उम्मे सुलेन की जानीब से है और आप के बेटे इब्राही के लिए है। तो रसुलुल्लाह ने प्याले को अपने सामने रख लिया और हाथो को उठाया और कुरआन से जितना चाहा उतना तिलावत फरमाया। उस के बाद अनस-इब्ने-मालीक (रजि) से कहा के एै अनस प्याले को उठा और मेरे हर सहाबी के सामने रख देना। अनस-इब्ने-मालीक (रजि) फरमाते है के मै प्याला हर साहबी के सामने रख देता और रसुलुल्लाह फरमाते के "इतना खाओ के शिकम सेर हो जाओ (पेठ भर के खाओ)"। वो पेट भर खाते मै प्याला दुसरे साहबे के पास रखता वो पेट भर खाते फिर प्याला तिसरे साहबी के पास रखता। यहा तक के वो प्याला ७० सहाबी के पास से फिर कर के रसुलुल्लाह के पास वापस आया। आप (ﷺ) ने भी कुछ खाया और मुझ से कहा के जाओ हमारी तरफ से ये प्याला अपनी वालेदा उम्मे सुलेन को देना। अनस-इब्ने-मालीक (रजि) कहते है के मै हैरतजदा था के जब लाया तब ज्यादा था के अब ले जा रहा हुँ तो अब ज्यादा है।" (Sahih Muslim Volume ०२ , Kitab No १६ Kitabun Nikah, Hadees १४२८) (Jamai Tirmizi Kitab No ४७ Kitabut Tafseer, Hadees ३५२४)
इस हदीस पर गौर करे?
१। ये हदीस फातेहा के सबुत के लिए मुनासीब नही क्युं के ये नबी-ए-करीम (ﷺ) का मोजûजा था?
२। आप (ﷺ) ने जो कुछ भी पढा था आपने किसी को नही बताया। कोई नही जानता के आप (ﷺ) ने क्या पढा था।
३। आप (ﷺ) ने उंचे आवाज में पढ कर नही सुनाया के आप ने कौन-कौन से सुरे पढे।
४। जो सहाबा आप (ﷺ) के पास मौजुद थे उन्हो ने आप (ﷺ) से नही पुछा के आप ने क्या पढा।
५। इस अमल को ना ही सहाबा ने सिखा और ना ही उन्हो ने कभी किया और ना ही आप (ﷺ) ने इसे करने का हुकूम दिया
६। अगर ये अमल उम्मत के लिए होता तो क्या आप (ﷺ) इसे छुपाते ?
७। हदीस में कहा लिखा है के आप ने चार कुल पढे और फलाह फलाह सुरे पढे जो के आज के लोग पढते है।
८। अगर ये अमल उम्मती के लिए होता तो इस की पुरी डिटेल आती। e.g. कौन-कौन से सुरे पढना है, कब-कब फातेहा देना है, फातेहा देने से क्या फायदे है, फातेहा का वक्त, etc
तो पता चला के फातेहा देना ये किसी सहीह हदीस और कुरआन से साबीत नही है। तो जाहीर सी बात है के खाने पर फातेहा बिदअत है।
खाने पर फातेहा देना बिदअत है
अब ज़रा ग़ौर फरमाते हैं नियाज़ फातिहा के तरीके और उस से जुडी बातों से.
नियाज़ फातिहा के ग़लत होने की दलील:-
1.
आपने देखा होगा के नियाज़ फातिहा जब भी होती है तो किसी पीर या बुज़ुर्ग या किस औलिया-ओ- पैगम्बर के नाम की होती है, मतलब उनका नाम लिया जाता है बेशक उनके नाम लेने के पहले क़ुरआनी सूरतें और आयतें पढ़ी जाती है मगर जब भी किसी और का नाम आ जाये तो फिर वो खाने की चीज़ हराम हो जाती है. इसलिए नियाज़ फातिहा दिलाना सरासर ग़लत है और गुनाह है.
2.
अगर कुछ लोग इस बात पे बहस करें के अगर हमने सिर्फ क़ुरआनी आयतें पढ़ी तो फिर तो वो हलाल हुआ क्यूंकि क़ुरआन अल्लाह का कलाम है...तो ऐसे समझदार लोगों से मैं पूछना चाहता हूँ के क्या किसी हदीस या क़ुरआन से इन्हे ऐसा करने की दलील मिलती है के कभी मुहम्मद रसूलल्लाह स० अलैह० ने या उनके सहबाओं ने ऐसा किया हो के खाने पीने के सामन सामने रख कर क़ुरआन की तिलावत की हो और फिर खाया हो??
नहीं ऐसी कोई दलील किसी सही हदीस में नहीं है. मतलब साफ़ हुआ के लोगों ने अपनी तरफ से दीन में इस नयी चीज़ का ईजाद किया है, फिर तो ये बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है.
3.
कुछ जाहिल लोग ये दलील देते हैं के खाने पे क़ुरआन की तिलावत करने से खाना हराम होता है तो फिर बिस्मिल्लाह कहने से भी कहना हराम हो गया. सबसे पहली बात के क़ुरआन की आयतें तिलावत करने से खाना हराम नहीं होता बल्कि तुम्हारा ये फेल (खाने पे तिलावत करना) बिदअत है क्यूंकि न तो मुहम्मद स० अलैह० ने कभी खाने को सामने रख कर तिलावत की और न ही उनके सहाबियों से कभी सुबूत मिला, हाँ खाने से पहले बिस्मिल्लाह के तमाम सुबूत मौजूद हैं.
4.
कुछ मौलवी जिन्होंने दीन को अपना कारोबार बन लिया है वो मेरे उन भाइयों को, जिन्हे दीन की समझ कम है ये दलील देते हैं के खाने की चीज़ पे तो हमने क़ुरआन पढ़ी और ये तो और भी अच्छी बात है फिर भी ये लोग ऐतराज़ करते हैं..... मैं अपने उन भाइयों को बताना चाहता हूँ के जैसे नमाज़ की एक रकत में सिर्फ दो ही सजदे हैं और अगर तीसरा सजदा किया तो ये गुनाह होगा बेशक सजदे के दौरान हम अल्लाह की तारीफें करें, मगर ये काम गुनाह हो गया क्यूंकि ये बिदअत है मतलब दीन-इ-इस्लाम में नयी चीज़ जोड़ी हमने इसलिए ये गुनाह है. उसी तरह से खाने की चीज़ें सामने रख कर क़ुरआन पढ़ें तो ये भी बिदअत हो जाती है क्यूंकि ये किसी हदीस से या क़ुरआन से साबित नहीं है.
JUMA MUBARAK KEHNA BIDAT HAI
Isme koi shak nahi ke Jumah musalmano ke liye Eid ka din hai, jaise ke hadees me aya hai
Ibn -Abbaas (Radiallahu-anhu)ne kaha: Allah ke
Rasool sallallahu alaihi wa sallam ne farmaya: “jumah eid ka din hai Allah ne
musalmano ko hukm kiya, jo koi bi jumah ko aye wo ghusl kare, aur apke pas koi
khusbu ho wo lagaye, aur miswaak istemal karen.”
(Ibn Maajah, 1098)
Musalmano ki 3 eid hain: Eid al-Fitr aur Eid al-Adha, jo ke ye saal(year) me ek baar ate hain, aur Jumu-ah jo hafta me ata rahta hai. Dusra ye hai, Musalman ek dusre ko mubarak baad dete hain Eid al-Fitr aur Eid al-Adha me, jaise ke sahaaba se sabit hai saheeh hadees maujood hain. Ab jo jumah mubarak kehna hai, sahaaba jante the Jumah eid ka din hai aur ye hum se zyada ilm rakne wale the jumah ki fazilat ke bare me aur unhone kabhi bhi ek dusre ko jumah mubarak nahi kaha, ab har bhalayi sahaba ko follow karne me hai.Qki wo Rasool Allah(saw) ke sathi the, wo kisi b din ki afzaliyat ka martabah hmse zyada jante the or hmse zyada izzat dene wale the har eid k din ko, lekin unhone ne kabi ni aisa kiya. Agar JUMA MUBARAK kahna achha hota to hamre nabi(saw) ne or sahabaao ne zarur kiya hota. Sahabao ne deen ko sabse zada samjha, kyuki wo log har chiz Rasool Allah (saw) se samjhte the.LEHAZA JUMAH MUBARAK KAHNA BIDAT HAI.
ANGUTHE CHUMNA BIDAT HAI
Angutha(thumb) choomna(kissing) karna bhi ek bidat hai jiska hadith se koi saboot nahi, barelwi (sunni) hazraat is bidat ko saabit karne ke liye man ghadat aur kamzor riwayaton (hadeeso) ka sahara lete hain.
Ye bidat kisi sufi ne shuru ki hai, aur us sufi ki baat ko Sunniyon ke Imam Ahmed Raza ne naqal kiya hai aur apne followers (sunni logo) ko fatwe ke zariye bata kar bidat ko failaya hai
KISI BHI EK MARFOO (authentic) RIWAYAT (hadees) ME YE NAI HAI KI RASOOLALLAH KA NAAM SUNNE KE BAAD HAME UNGLIA CHUMNI CHAIYE. AUR JO RIWAYATE HAI WO SAHIH NAHI HAI ISLIYE UNPAR BHAROSA NAI KIYA JA SAKTA. HAMLOGO KE PAAS KAFI MAZBUT RIWAYATE HAI JO KAHTI HAI KI RASOOLALLAH (SallAllaho Alaihi wa Sallam) KA NAAM SUNNE KE BAAD UNPAR SALAM BHEJNA CHAIYE AUR MUSLIMS KO ISPAR SAKHTI SE AMAL KARNA CHAIYE.
आजान से पहले दुरूद शरीफ पढना बिदअत है
सुन्नी यानी बरेल्वी लोगो की दलील
अल्लाह ने हुकूम दिया नबी पर दुरूद पढो और खुब सलाम भेजो। लेकीन इस मे कोई कंडीशन नही लगाई जैसे के - उर्दु में, अरबी में, दिन में, रात में, खडे हो कर, बैठ कर, अकेले या इज्तेमाई तौर पर, आûजान से पहेले या बाद में। कोई भी बंदा खुद की तरफ से कुरआन की आयत पर कोई कंडीशन नही लगा सकता।
जिस इंसान को हदीस व कुरआन का इल्म नही व सुन्नी (बरोल्वी) की ये दलील को मान लेगा।
जो हुजुर ने किया या करने का हुकूम दिया, सहाबा ने भी किया, जिस के बारे मी सहीह हदीस या कुरआन से दलील मिल जाए उसी पर हमे अमल करना है। आजान से पहले दुरूद शरीफ पढना ना ही किसी हदीस से साबीत है ना ही कुरआन से। लेहाजा ये करना बिदअत है।
हम को आजान से तलूक रखनेवाली निचे दी हुई हदीस मिलती है।
हजरत उमर बिन खत्ताब (रजि) और हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर व बिन आस (रजि) से रिवायत है के नबी-ए-करीम (ﷺ) ने फरमाया, जब आजान सुनो तो जो अल्फाज मोअजन कहे वो दोहराते जाओ, अलबत्ता जब वो हय्या अलस-सला और हय्या अलल फला कहे तो तुम ला-हवला वला कुवता इल्ला बिल्लाह कहो
(सहीह मुस्लीम :३८३, ३८४)
आजान खत्म हो जाए तो दुरूद शरीफ पढो और ये दुआ मांगे और जो शख्स ये दुआ मांगता है वो रसुलुल्लाह (ﷺ) की शफाअत का हकदार हो जाता है।
(सहीह बुखारीः६१४)
हजरत अनस (रजि) रिवायत करते है के रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया, आजान और इकामत के दरमियान जो दुआ मांगी जाए व र नही होती
(सहीह तिरमीजीः२८४३)
MOO SE NAMAZ KI NIYAT KEHNA BIDAT HAI
Niyat karta hu main 4 rakat zohar ki namaz, piche iss imam ke, mu mera kaba sharif ke taraf......Ye alfaz kehna bidat hai, ye agar sabit hota to arbi hota
Aap (Sallallah
alehi Wasallam) farmate hain: "amal ki buniyad niyaton par hai"
(Bukhari,1,54,2529,3898,5070,2520, MUSLIM 1907)
Namaz ke liye niyat zaroori hai bagair niyat namaz nahi hoti, lekin niyat DIL KE IRADE ka nam hai, na ki zaban se duharaye jane ka.
नियत दिल के इरादे को कहते है, मुंह से नियत पढना बिदअत है। दिल में ये नियत होनी चाहिए के मै फला नमाज पढ रहा हुँ, मिसाल के तौर पर - ûजोहर की फर्ज नमाज या सुन्नत नमाज। मुंह से नियत पढ कर अल्लाह को तफसील देने की जरूर नही है, अल्लाह सब जानता है। ûजबान से नियत पढना किसी नबी (ﷺ) , साहबा और चौरो इमाम से साबीत नही है। नमाज की नियत तो उसी वक्त हो जाती है जब इंसान आजान सुन कर घर से मस्जीद की तरफ चल पडता है, जिस की बिना पर उसे हर कदम पर नेकी मिलती है
Hazrat
abu hurairah ra riwayat karte hain ki aap(sws) ne farmaya:-" ek shaheed,
allah ke saamne qayamat me laya jaayega , allah usse puchhega ki, tune kya amal
kiya? Wah kahega ki main teri raah me ladkar shaheed huwa, allah farmaayega:
"tu jhoota hai balki tu isliye ladha tha ki tujhe bahadur kaha jaaye"
isliye tu kaha gaya( yani teri niyat duniya me puri ho gayi, ab mujhse kya
chaahta hai) phir muh ke bal ghaseet kar aag me daal diya jaayega,; isi tarah phir
ek aalim jisne ilm, shohrat ki niyat se padha aur padhaya tha, allah ke saamne
pesh hokar jahannum me jhonk diya jaayega, phir 1 shohrat ki garz Se khairaat karne waale maaldaar ka bhi
yahi hashr hoga"
(muslim 1905)
Isse malum huwa ki dilo ka haal sirf allah hi jaanta hai
Namaz se pahle niyat padhna aqal, farmaan, aur lugad teeno ke khilaaf hai:
1-AQAL
Aqal ki khilaf isliye hai ki anginat aise kaam hain jinko shuru karte waqt ham zabaan
se niyat nahi Padhte kyonki hamare dil me unhe karne ki niyat aur iraada
maujood hota hai jaise zakaat dene lagte hai to kabhi nahi padhte :-" main
zakaat dene ki niyat karta hun" etc etc.., to kya namaz hi ek aisa kaam
hai jiske shuruat me uski niyat padhna zaruri ho gaya hai?? Namaz ki niyat to
usi waqt ho jaati hai jab insan azaan sunkar masjid ki taraf chal padhta hai
aur isi niyat ki wajah se use har qadam par nekiyan milti hai, isliye namaz
shuru karte waqt jo kuch padha jaata hai wah niyyat nahi bidat hai.
2- FARMAAN:
[
farman ke khilaaf isliye hai ki nabi(sws) aur sahaba kiram baqaayedgi ke saath
namaz padha karte they aur agar wah apni namazon se pahle "niyat"
padhna chahte to aisa kar sakte they unke liye koi rukawat nahi thi, lekin unme
se kabhi kisi ne namaz se pahle niyyat nahi padhi aur iske jawab me we hamesha
apni namazon ki shuruat takbeer e tahreema(allahuakbar) se karte rahe, saabit
huwa ki Namaz se pahle niyat padhna bidat hai
3- LUGAD(ARABIC DICTIONARY)
lugad ke isliye khilaf hai ki niyyat arabic zabaan
ka alfaaz hai, arabic me iska maayna "iraada" hai aur iraada dil se
kiya jaata hai zabaan se nahi, bilkul isi tarah jaise dekha aankh se jaata pair
(leg) se nahi, dusre alfaazon me niyat dil se ki jaati hai, zabaan se padhi
nahi jaati.
दुआ करते वक्त अव्वल-आखीर क्वांटीटी में दुरुद पढना (३ बार, ७ बार, ११ बार) साबीत नही है.........
दुआ मांगने का सहीह तरीका (सहीह हदीस से)
_कोई भी दुआ मांगने से पहले अल्लाह तआला की हम्द व सना के बाद दरूद शरीफ पढ़ें_
the Prophet (SAW) said: “ When one of you prays, let him start with praise of Allah, then let him send blessings upon the Prophet (SAW), then let him ask whatever he likes after that.” Then another man prayed after that, and he praised Allah and sent blessings upon the Prophet (SAW). The Prophet (SAW) said: “O worshipper, ask and you will be answered.” [Classed as Saheeh by Al-Albaani in Saheeh Al-Tirmidhi, 2765, 2767]
यानि पहेले अल्लाह की तारीफ करो, फिर दुरुद पढो उसके बाद अपने लिए दुआ करो.
दुआ के आदाब
१। दुआ मांगते वक्त सब से पहेले अल्लाह की हमद व सना (तारीफ) करो (जैसे सुरे फातेहा और सुरे इखलास)। फिर रसुलुल्लाह (ﷺ) पर दुरूद भेजो और फिर जो मांगना है मांगो। (जामे तिरमीजी)। नोट - दुरुद शरीफ पढना दुआ के आदाब में से है ना के ये वसीले के लिए है।
२। आखीर मे -आमीन- कह कर दुआ खत्म करे (हदीस)
३। दुआ मांगते वक्त हाथ सिने तक भी उठा सकते है, कंधे तक भी उठा सकते है, या इस से उपर भी उठा सकते है।
४। हाथ सिधे होने चाहिए, हाथ उल्टे कर के ना मांगे (हदीस)
५। हथेलियो का किबला आस्मान की तरफ होना चाहिए। यांनी हथेलीयो का पेठ आस्मान की तरफ होना चाहिए
६। आप (ﷺ) हाथ मिलाकर दुआ मांगते। अगर आप शित से दुआ करते तो अपने हाथ उंचे उठाते। जितनी शित होती उतने उपर आप हाथ उठाते (हदीस)
७। हम जो दुआ मांग रहे है वो अल्फाûज हमे मालुम होने चाहिए। यानी हम क्या दुआ मांग रहे है हमे मालुम होना चाहिए। यानी दुआ मांगते वक्त खयालात दुसरी तरफ नही जाने चाहिए। अल्लाह मेरे सामने है, वो मुझे देख भी रहा है और सुन भी रहा है एैसा खयाल दिल मे रहना चाहिए।
८। दुआ में जिद नही करनी चाहिए। मिसाल के तौर पे - आप ये चाहते है के शादी हो जाए तो बार बार "शादी करवादे, शादी करवादे" इस तरहा से कहना मुनासीब नही है। बल्की दुआ एैसी होनी चाहिए के - "एै अल्लाह अगर इस मकाम पे मेरे किस्मत पे निकाह लिखा है तो आसान फरमा दे या मेरे हक मे जो बहेतर है वो फरमा दे"।
९। चिखकर दुआ मांगना बिल्कुल गलत है, इसे नबी-ए-करीम (ﷺ) ने मना फरमाया है।
१०। नबी-ए-करीम (ﷺ) की दुआए मुख्तेसर (short, थोडी) और जामे (ûज्यादा भरी हुई) होती थी। आज कल इज्तेमा मे इतनी लंबी चौडी दुआ मांगी जाती है के लोग कलबी कुवत का शिकार हो जाते है। कोई उठे हुए हाथ निचे रख देता है, टांगे दुखने लग जाती है और बेतवज्जो होती है।
११। दुआ इस इरादे से करे के कबुल होंगी। गाफील और बे-ध्यान दिल की दुआ अल्लाह नही सुनता।
१२। खास दुआ को तिन बार दोहराया जा सकता है। (हदीस)
१३। दुसरे के लिए दुआ करने का इरादा हो तो पहेले अपने लिए मांगे फिर दुसरे के लिए (हदीस)।
१४। हाथ उठाए बगैर दुआ कर सकते है लेकीन हाथ उठा कर दुआ करना सुन्नत है।
१५। मामुली से मामुली दुआ भी अल्लाह से मांगनी चाहिए (हदीस)। जैसा के नमक की कमी पढ गई या जुते का लेस टुट गया तो भी अल्लाह से दुआ मांगना चाहिए (हदीस)
DUA kis waqt jaldi kubul hoti hai
1. Farz namaz kay baad,
2. Aazaan aur Aqamat kay darmiyan,
3. Tahajjud kay waqt,
4. Barish Barastay waqt,
5. Safar main,
6. Aftaar k waqt,
7. Jummay k din - asar aur magrib ke bich ek Ghari,
8. Aab-e-Zam Zam peetay waqt.
9. Arafat kay din Maidaan-e-Arafaat main,
10. Quran Pak ki Tilawat kay Baad.
11. Beemari ki halat mein
12. Mazloom ki dua
मय्यत को दफनाने के बाद कबर पर आजान देना बिदअत है
आजान देने के बाद शैतान दुर भाग जाता है (हदीस)। ये बात सच है लेकीन हमारे सुन्नी (बरेल्वी) भाई इस मामले में अपनी अटकले लगा रहे होते है के, अगर हम मय्यत को दफनाने के बाद कबर पर आजान दे तो शैतान दुर भाग जाएगा और मय्यत को मुनकीर नकीर के सवालो के जवाब देने मे आसानी होगी। ये अकिदा बिल्कुल जाली अकिदा है। ये अमल किसी भी सहीह हदीस, कुरआन और सहाबा इकराम के अमल से साबीत नही है, इसलिए ये बिदअत है।
मय्यत को दफनाने के बाद कबर मे शहादत की अंगली डाल के सुरे पढना बिदअत है
बरेल्वीयो (सुन्नी) मे एक और अकिदा है के वो मय्यत को दफन करने के बाद मय्यत की कबर के सर के पास शहादत की उंगली डाल कर सुरा पढते है और इसी तरहा से मय्यत के पैर के पास भी उंगली डाल कर सुरा पढते है ताके शैतान से हिफाजत रहे। ये अमल किसी भी सहीह हदीस, कुरआन और सहाबा इकराम के अमल से साबीत नही है, इसलिए ये बिदअत है
कबर मे अहद-नामा रखना बिदअत है
सब से पहले अहद-नामा खुद ही बिदअत है। अहद-नामा खुद साबीत नही है और इस को कबर मे रखना भी साबीत नही।
कबर फुल डालना और पेड लगाना बिदअत है
इब्ने अब्बास (रजि) रिवायत करते है की, रसुलुल्लाह (ﷺ) दो कबरो से गुजरे और फरमाया, इन दोनो को हो रही है लेकीन उस चिज के लिए नही जिस से बचना मुश्कील था। उन में से एक को सजा इसलिए हो रही है क्युं की वो पेशाब के कत्रो से (अपने जिस्म और कपडो) की हिफाजत नही करता था। और दुसरा शख्स लोगो में गलत बाते फैलाता था। फिर उन्हो ने (आप (ﷺ) ने) एक ताजी खजुर के पत्ते की डाल ली और उस को दो हिस्सो मे तक्सीम किया और दोनो कबरो पर एक तुकडा रख दिया। उन लोगो ने फरमाया - या रसुलुल्लाह (ﷺ) आप ने ये क्या किया? आप (ﷺ) ने फरमाया, --शायद ये अजाब कम हो जाए जब तक ये सुखी नही होती--।
(Sahi Bukhari, Vol Kitabuz Janaiz, Hadees : 1361)
(Sahi Bukhari, Kitabul Waju, Hadees : 216)
(sahi Bukhari, Kitabl Adab, Hadees : 6055)
(Sunan Nasai, Kitabuz Janaiz, Hadees : 2070/2071)
(Sunan Nasai, Kitabut Tahara, Hadees : 31)
कबरो पर फुल डालना और कबर को पास झाड लगाना साबीत नही है इस से मय्यत को सवाब नही मिलता। हुजुर (ﷺ) ने दो कबरो पर खजुर की टहनी गाढी थी तो ये चिज आप (ﷺ) को वही के जरीये मालुम हुई थी के दो कबरो पर अजाब हो रहा है। क्या आप अपने मुर्दे के बारे मे ये सोचते है के उसे भी अजाब हो रहा है। मुर्दे के साथ बदगुमानी (बुरी सोच) रखना शरीयतन जायûज नही है। दुसरी बात आप (ﷺ) ने खजुर की टहनी लगाई थी फुल नही डाला था। इस वाकिये के बाद आप (ﷺ) ने सहाबीयो को हुकूम नही दिया के तुम भी एैसा ही किया करो और किसी सहाबी ने कभी ये अमल नही किया इसलिए ये बिदअत है।
नमाजे जनाजा के बाद मय्यत के लिए दुआ करना बिदअत है
नमाजे जनाजा खुद मय्यत के लिए दुआ है। फिर नमाज के बाद अलग से दुआ करना जहालत भी है और ये अमल किसी भी सहीह हदीस, कुरआन और सहाबा इकराम के अमल से साबीत नही है, इसलिए ये बिदअत है।
फर्ज नमाज के बाद इजतेमाई (एक जमात मे) दुआ बिदअत है
अक्सर ये देखा जाता है के, मस्जीदो में फर्ज नमाज होने के बाद इमाम साहब दुआ करते है और बाकी के लोग आमीन कहते है। ये अमल किसी भी सहीह हदीस, कुरआन और सहाबा इकराम के अमल से साबीत नही है, इसलिए ये बिदअत है।
बच्चे की छटी मनाना बिदअत है और गैर-ईस्लामी रसम है
हमारे घरानो मे अक्सर ये देखा जाता है की, बच्चे की पैदाईश के छटे (६) दिन उसकी छटी मनाते है। ये अमल हिंदू तहजीब से लिया गया है। हिंदू लोग इस अमल को छट पुजा भी कहते है। उन का ये मानना है के छटी माù (देवी) आ कर छटे दिन बच्चे की किस्मत लिख कर जाती है, इसलिए इस दिन वो लोग बच्चे को नये कपडे पहनाते है और घर में प्रोग्राम करते है। हम मुसलमानो ने ये अमल उन से लिया है। ये बिदअत भी है और हदीस के खिलाफ भी है।
नबी-ए-करीम (ﷺ) ने इरशाद फमाया "जिस ने जिस कौम से मुशाबहत (Copy) इख्तीयार की वो उन्ही मे से है"
(Abu Dawood Hadees: ४०३१)
MAAH-E-MUHARRAM ME HONE WALE SHIRK AUR BIDAT
Ashura e muharram (shuru ke 10 din) me shia hazraat jis jarah sog majlisen aur mahfilen karte hain, saaf si baat hai yah sab ghadi hui hai, aur shariat e islamia ke khilaaf hai, islam ne to maatam ke is andaaz ko ” JIHALAT” se taabeer kiya hai aur is kaam ko laanat ki wajah balki kufr tak pahuncha dene waala batlaaya hai.
Badkismati se ahle sunnat me se ek bidati wala halqa (barelwi) maatam ka shia andaaz to akhtiyaar nahi karta lekin in 10 dino me bahut se baatein akhtiyaar karta hai jin se shia ka parchaar aur unke jhoote mazhab ko badhaawa milta hai jaise:
1- Shia ki tarah karbala ke waqeye ko mahfilon me bayan karna
2- 10 muharram ko taaziye Nikaalna, unhe izzat wa ibadat e kaabil samjhna (poojna), unse mannat maangna, haleem (khichda) pakaana, paani ke counter lagaana, apne bacchon ko hare (green) rang ke kapde pahnakar unhe hz hussain ra ka fakeer banaana
3- 10 muharram ko taajiyon (statue of hz hussain ra grave) aur maatam ke julooson me badh chadh kar shirqat karna.
4- Muharram ke mahine ko sog (gham) ka mahina samjhkar is mahhne me shaadiyan na karna
5- Ghode ke juloos me sawaab ka kaam samjh kar shirqat karna
6- Aur ise andaaz ki kai cheezen, jabki ye sab cheezen bidat hain, jinse nabi akram sallallaho alaihi wasallam ke farman ke mutaabik bachna zaroori hai
Aap (SWS) ne musalmano ko taqeed ki hai
”Musalmano ! Tum meri sunnat aur hidayat yaafta chaaron khalifa ke tareeqe hi ko apnaana aur use mazbooti se Thaame rakhna aur deen me izaafa ki gayi cheezon se apne ko bachaakar rakhna, isliye ki deen me naya kaam( chaahe wah dekhne me kaisa hi ho) bidat hai aur har bidat gumraahi hai”
(musnad ahmad 4/126,127, sunan abu dawood 4607, ibne majah 42, jame tirmizi al ilm 2676)
Ye baat har kisi par saaf hai ki ye sab cheezen sadiyon baad ki paidawaar hai, isi ke saath unke bidat hone me koi shak nahi aur nabi akram sallallaho alaihi wasallam ne har bidat ko gumraahi farmaya hai.
ASHURE KE DIN (10 MUHARRAM KO) KI JANE WALE BIDAT
Ashure ke din gusal kar ke acche kapde pahenna sabit nahi hai
Ashure ki namaz sabit nahi hai
Ashure ke din achhe pakwan banana sabit nahi hai.
Note : Ye sab chize Eid me ki jaati. Ashure ka din to Imam Hussain (Razi) ki shahadat ka din hai to hum ye achhe kapde pahen kar aur achhe pakwan bana kar kya sabit kar rahe hai.
ख्वाजा की छट्टी, ग्यारव्ही (गौस) की नियाज, रज्जब के कुंडे बिदअत और शिर्क है
"तुम पे हराम किया गया मुरदार और खून और खिंजीर का गोश्त, और जिस पे अल्लाह के सिवा किसी और का नाम पुकारा गया हो."
(सुरह बकरा आयत 173)
(सुरह माएदा 3)
(सुरह अनाम 145 सुरह नहल 115)
नियाज करने की वजह
लोगो के सवालात से बचने के लिए अक्सर ये कहा जाता है के, हम बुजुर्गो से अकिदत, मोहब्बत और उन के इसाले सवाब के लिए नियाज करते है। लेकीन हकीकत ये है के नियाज करने के पिछे नियत और मक्सद ये होता है के इन बुजुर्गो की नजरे करम हो, घर मे खैर व बरकत आए, हमारे बिगडे काम बन जाए।
नियाज करना शिर्क और बिदअत क्यु
शिर्क इस्लीए, क्यु के इस के पिछे मक्सद ये होता है के इन बुजुर्गो की नजरे करम हो जाए, घर मे खैर व बरकत आ जाए, हमारे बिगडे काम बन जाए। बुजूर्गो को हाजीर व नाजीर समझ कर उन से खैर की दुआ मांगी जाती है। यही तो शिर्क है।
बिदअत इस्लीए, क्यु के कोई भी काम जो दीन में बाद मे शुरू हुआ हो वो बिदअत है, ये काम भी बाद में शुरू हुआ और इस काम में खाने पर फातेहा किया जाता है।
नियाज का खाना हराम कब बन जाता है
ये नियत पर डिपेंड है। अगर नियाज बनाने वाले की नियत सिर्फ और सिर्फ इसाले सवाब की है और अल्लाह की रजा के लिए बनाया जा रहा हो, बुजुर्ग को खुश करना और लोगो मे नाम कमाना अगर मक्सद ना हो तो ये खाना हराम नही हुआ। और अगर ये खाना बुजुर्ग के नाम से बनाया जा रहा है, नियत बुजुर्ग को राजी करने की है, लोगो मे नाम कमाने की है तो ये खाना हराम हुआ। (आयत पढ ले)
एक सवाल
इसाले सवाब की जरूरत नेक बुजुर्गो को है जिन के बारे मे कहा जाता है के वो बख्शे बख्शाये हुए है या हमारे घर के फौत लोगो को?
EID - MILAD-UN-NABI MANANA BIDAT HAI
Quran aur Hadees me iska koi saboot nahi phir bhi kuch log quran aur hadees ke aise hawala dete hai jis ka eid e milad se koi lena dena nahi
12 Rabi-Ul-Awwal Ka Din Nabi (S.A.W) Ki Zindagi Main 63 Bar Aya..
Aur Khulafa-E-Rashideen Mai Se Abu Bakar(R.A)Ki Khilafat Main 2 Bar..
Umar(R.A)Ki Khilafat Main 10 Bar..
Usman(R.A)Ki Khilafat Main 12 Bar
Aur Ali(R.A) ki Khilafat Main 4 Bar Aya, Kya In Main Say Kisi Nay Bhi
Eid-Milad-Un-Nabi Manaya? Kya Sahaba, Tabaen Or Aima-Arba Main Se Kisi Aik Ne
Bhi Ye Din Manaya? Nahi Na? To Jan Len Ke Ye Teesri Eid Biddat Hai aur “Har
Biddat Gumrahi Hai JisKa Anjam Jahannum Ki Aag Hay”.
YE HUZUR SWS KA TALIM NAHI Aur KYA YE HUZUR SE MOHABBAT KA SABOOT HAI?
Raste block karna
Shor sharaba karna
Shirkiya Naat padhna
Rasto par Jhande le kar dance karna
Rasto par loud speaker lagana
Cake kat kar Happy Birthday To You Ya Rasoolullah kehnap
etc
I agree ke Aap Mohammad (SAW) se mohammad ka izhaar karna chahiye, har musalmaan ko karna chahiye, is mein koi shak nahi hona chahiye, or kasrat se darood chahiye.
तिजा, दसवा, चेहलुम, बरसी बिदअत है
इसाले सवाब के लिए खास दिन मुकरर कर देना बिदअत है, जैसा के तिसरे दिन (तिजा), चालिसवे दिन (चालिसवा), साल पुरा होने पर (बरसी)। किसी काम के लिए खास दिन मुकरर्र करना इसलिए बिदअत है क्युं के ये खास दिन नबी (सलल्लुह अलैहि व-सल्लम) और हमारे सलफ सालेहिन से साबीत नही है।
आप के भी घर मे आप के बेटे फौत हुए, बिवीया फौत हुई। सहाबा इकराम के भी यहा मौते होती थी लेकीन किसी ने भी ऐसा अमल नही किया जो आज इसाले सवाब के नाम पे किया जा रहा है।
भुके को खाना खिलाना सदका है और अगर आप की नियत मय्यत को इस का सवाब पहोचाने की है तो इस का सवाब जरूर पहोचता है, सदका करने का कोई वक्त नही होता, कभी भी आप सदका कर सकते है, लेकीन इस के लिए दिन मुकरर्र करना और फातेहा देना बिदअत है।
खडे हो कर एक साथ हुजुर पर सलाम पढना बिदअत है, दुरूद और सलाम क्या है
ये तरीका किसी भी सहीह हदीस, कुरआन और सहाबा इकराम के अमल से साबीत नही है और हुजुर (ﷺ) ने ना ही हमे इस तरहा सलाम सिखाया है इसलिए ये बिदअत है।
दुरूद
दुरूद ये फारसी लप‹ज है और इसका मतलब होता है -दुआ-। दुरूद ये अल्लाह के रसुल के दर्जात बुलुंद करने और रहमत के लिए दुआ है जो अल्लाह से मांगी जाती है। और दुआ अल्लाह की इबादत है। हदीसों में सारी फजीलते दुरूद के उपर आई है।
सलाम
सलाम भी एक दुआ है, जो अल्लाह से मांगी जाती है। दुरूद और सलाम के माने एक जैसे ही है, दोन interchangeable (तबादला) लप‹ज है।
हुजुर (ﷺ) ने हम को सलाम पढना सिखया है जो हम नमाज मे अत्तहियात में पढते है - as-salamu -alayka ayyuha-n-Nabiyyu
एक बिदअत कई बिदतो को जन्म देती है
अगर ये चिज साबीत होती तो पुरा के पुरा सलाम हिंदी में नही बल्की अरबी में होता।
इस में लोग हुजुर पर सलाम पढने के साथ साथ, बुजुर्गो के भी नाम ले कर सलाम पढ रहे होते है।
इस के बाद फातेहा देते है (जो खुद एक अलग बिदअत है)
ये भी जहालत का सबुत है। हमारा इंडया मिलो दुर होने की वजह से मक्का और मदिना हमे सिधी डायरेक्शन में मिलेंगी ना के क्राùस डायरेक्शन में। क्राùस डायरेक्शन में बंदे का रुख अफगानिस्तान की तरफ हो रहा होता है और मदिना साऊदी अरब में है।
घडे हुए, जाली, इंसानो के बनाए हुए दुरूद शरीफ बिदअत है
आज मार्वेŠट में दुरूद शरीफ की बेशुमार किताबे मौजुद है, इस में आप को सेकडो दुरूद शरीफ मिलते है। लेकीन चंद ही दुरूद शरीफ है जो कुआन और हदीस से साबीत है, बाकी सब बुजुर्गो और उल्माओ की बनाए हुए जाली और नकली दुरूद शरीफ है (made in india & pakistan)। इसलिए हम को कौन से दुरूद साबीत है और कौन से घडे हुए ये पहेचान्ने की जरूरत है।
जाली, नकली, घडे हुए दुरूद शरीफ कौन से है
दुरुद अकबर
दुरुद ताज दुरुदे ताज में शिर्कीया अल्फाज भी मौजुद है
दुरूद लखी
दुरुद गौसीया
दुरूद माही
दुरुद तनजीना
२५, ५० लाख सवाब वाला दुरूद शरीफ
८० साल के गुनाह माफ वाला दुरूद शरीफ
वगैरा वगैरा
सब से बहेतरीन दुरूद शरीफ
सब से बहेतरीन दुरूद शरीफ है दुरूद-ए-इब्राहीम जो हम नमाज में पढते है। यही दुरूद शरीफ पढने की आदत डाले।
सब से छोटा दुरूद शरीफ
صلي الله عليه وسلم
नोट
जो लोगो ने बनाए हुए दुरुद शरीफ है उन में अगर शिर्की अल्फाज नही है और गुस्ताखाना इबारते नही है तो उन को नात के तौर पर पढ कर सकते है लेकीन दुरुद के तौर पर नही
शबे बारात में मगरीब के बाद ६ रकात नमाज पढना बिदअत है
२ रकात - उम्र दराजी की
२ रकात - घर में बरकत और बलाओ से हिफाजत की
२ रकात - अल्लाह का मोहताज रहने की
।ये जो नमाजे है ये बुजुर्गो और उल्माओ की देन है, इन का दीन से कोई तालुक नही। किसी भी सहीह हदीस से ये नमाजे और उन की फजीलते साबीत नही है।
घडे हुए, जाली, इंसानो के बनाए हुए दुआ बिदअत है
आज हर घर में पाकीस्तानी पंजसुरा नाम की एक किताब पाई जाती है, जिस में बहोत सी बाते और दुआए साबीत है और बहोत सी बिदआत है।
आज जाली दुरूद की तरहा बेशुमार जाली, नकली, इंसानो की बनाई हुए दुआऐ और उन की फजीलते मार्वेŠट में मौजुद है।
जो दुआए और उन की फजीलते हम को कुरआन से मिले, सहीह हदीस से मिले, सहाबा के अमल से मिले वही पढना चाहिए।
खत्मे ख्वाजगान, खत्मे गौसीया, नमाज-ए-गौसीया, गौसीया ख्वानी, असमाए गरामी हजरत गौसे आजम (गौस को ९९ नाम), कसीदा-ए-गौसीया, सोला सय्यदा के रोजे, १० बीबी की कहानीया, वगैरा-वगैरो
ये तमाम चिजे शिर्क और बिदआत से भरी पडी है। ये चिजे बुजुर्गो की इबादत है और बुजुर्गो से मदत मांगी जा रही है।
शबे मेअराज की रात में होने वाली इबादते बिदअत है
DUSRE DIN ROZA RAKHNA BHI BIDAT HAI
आप (ﷺ) को मेअराज की रात में आस्मानो में बुलाया गया है। ये बहोत बडा वाकीया है। आप को मेअराज हुई थी ये बात तो कुरआन और सहीह हदीस से साबीत है लेकीन इस रात को एक खास इबादत करना और दुसरे दिन रोजा रखना किसी भी सहीह हदीस, कुरआन और सहाबा इकराम के अमल से साबीत नही है, इसलिए ये बिदअत है। यहा तक के चारो इमाम (हनफी, शाफई, मालीकी, हम्बली) से भी साबीत नही।
शबे मेअराज में पढने वाली नमाजे और उन की फजीलते बिदअत है
एक पर्ची में नमाजो का तरीका और रकते लिखी होती है और साथ में उन की फजीलते भी लिखी होती है, ये सब चिजे बुजुर्गो और बाबाओ की इजाद है, इस का दीन-ए-इस्लाम से कोई तालुक नही। ये बिदआत हैं।
Roze ke Niyat ki Galat Dua se bachey !!!
Sehri ke talluk se ek Dua jo haal hi me kafi mashoor hui jo humare Rozo ko Namukammal (Incomplete) karta hai aur afsos ke aaj wo Dua hum sab me aam hai Ramzan ke Calendaro me. jab ki koi iske sahi ya galat honey par tawajjo nahi deta.
# Aayiye gour karte hai isme aisi kya galati hai ?
• Roza Rakhne ki
Niyat ki Dua “Allahumma Gadal laka Fagfirli Ma Kaddamto Wa ma Akharto
……/”
jis ka tarjuma hota hai “Aye Allah Mai Roza rakhunga KAL tere
liye.....”
SubhanAllah! Yaad rahe Arbi Zubaan me jo Kal (Past) gujra usey kehte hai “Al-Ams”, Jo aaj gujar raha hai (Present) usey kehte hai “Al-Youm” aur jo kal Aane wala (Future) hai usey kehte hai “Gadal/Gadan”.
Jab ke hum sabhi jante hai jis waqt yeh Dua ki jaati hai wo usi din ke Roze ki Dua ki jati hai tou yeh dua sahih kaisi hui mere azeezo ?.
ROZA RAKHNE KI NIYAT
रमज़ान के रोज़े की नियत के लिए इतना काफी है कि दिल में ही सोच ले कि आज मेरा रोज़ा है या रात को ही नियत कर ले कि रोज़ा रखना है क्यूंकि नियत अस्ल में दिल के इरादे का नाम है ज़ुबान से कहना ज़रूरी नहीं
ROZA KHOLNE KI DUA SAHIH HADEES SE SABIT HAI
हज़रत इब्ने उमर र.अ. फरमाते हैं कि रसूलुल लाह स.अ. जब भी इफ़्तार करते तो फरमाते :
ज़हाबज़ ज़मउ वब तल्लतिल उरूक़ु व सबातल अजरु इंशा अल्लाह
Translation : प्यास जाती रही, रगें तर हो गयीं, और अज्र इंशा अल्लाह साबित हो गया
हज़रत मआज़ बिन ज़ुहरा फरमाते हैं कि जब नबी करीम स.अ. रोज़ा इफ़्तार फरमाते तो ये दुआ पढ़ते
अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु व बिका आमन्तु व अलैका त वक्कलतू व अला रिज़ किका अफ्तरतु
(Note : Iss dua me maulviyon ne अफ्तरतु ke baad ek chiz apni taraf se dali hai... wo hai फतकब्बल मिन्नी. Jitna sabit hai utna hi padhe.
Translation : ए अल्लाह ! मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा, और तुझ ही पर ईमान लाया, और तुझ ही पर तवक्कुल किया, और तेरे ही रिज्क से इफ़्तार किया |
BAAP DADA KE TARIKE PAR CHALNA KAISA HAI
Aaiye dekhe Quran Me ALLAH NE KYA FARMAYA HAI....
“Aur jab unse kaha jata hai ki, ALLAH ne jo kuch utara hai uski ita-at karo, to kehte hain Nahi, balki ham to uski ita-at karenge jis par hamne apne baap-dada ko paya. Kya us haal me bhi jabki unke baap-dada kuch akal/dimag se kaam na lete rahe ho aur na seedhey raah par rahe ho?” ◆[Quran, Sura Baqra 2/170]
“aur jab unse kaha jata hai ki us cheez ki aur aao jo ALLAH ne naazil ki hai, aur Rasool ki aur, to wo kehte hain Hamare liye to wo hi kaafi hai jis par hamne apne baap-dada ko paya hai. Kya agar unke baap-dada kuch bhi na jaante ho aur na seedhey raah par ho?” ◆[Quran, Sura Muhmmad 47/21]
Pata chala ke baap dada agar deen ke mamle me galti par ho to unki baat ko mat mano
आलीमो, मोलवीयो, पिरो की अंधाधुंद पैरवी करना गलत है
क्या हमारे बडे बडे उलमा पागल है?, क्या हमारे बुजुर्ग पागल है?, क्या हमारे पिर पागल है?।
जब रसुलुल्लाह (ﷺ) ने लोगो को तौहीद की दावत दी तो लोग आप (ﷺ) को दुर से आता हुआ देख कर रस्ता बदल देते थे, कुछ लोग कहते थे के उन के पास ना जाना उन की बात ना सुन्ना उन के पास जादु है, तुम बहेक जाओगे, हमारे बडे जो कहते है वही करो।
आज यही हाल हमारा उन मुशरीको की तरहा हो गया है, आज हम अपने फिरके के उलेमा और बाप-दादा के अंधे तरीको पर ही चलना पसंद करते है और अगर कोई तौहीद की बात बताने आए तो उस की बात सुन्ना पसंद नही करते
अगर कोई शख्स हिंदु के घर में पैदा हो तो उस के मां बाप उसे हिंदु बना देते है इसीतरहा से अगर कोई शख्स बद-अकिदा मदरसो से आलीम की डिग्री हासील कर ले तो वो बद-अकिदा आलीम बनता है।
इस्लीए किसी भी मौलवी, आलीम या पिर की बात मानने के पहले तस्दीक करे वो सहीह है या नही
कुरआन का पैगाम
उस से जालीम कौन है जिसे अल्लाह की आयतो दिखाई जाए और वो उसे ना माने
(सुरे कहफ (१८), आयतः५७) (सुरे जासीया (४५), आयतः ६-८)
हदीस शरीफः
रसुलुल्लाह (ﷺ) ने इरशाद फरमाया, -बनी इसराईल के ७२ फिरके थे मेरी उम्मत के ७३ फिरके होंगे, सिवाय एक के तमाम जहान्नम में जाएंगे-- सहाबा (रजि) ने पुछा, --जन्नत में कौन होंगे?-- रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया --जो मेरे और सहाबा के तरीके पर होंगे-- (तिरमीजी)
इस हदीस से या बात मालुम होती है के, जन्नत का हकदार वही है जो रसुलुल्लाह (ﷺ) के और सहाबा इकराम के तरीके पर चलेगा ।
मौलवी, आलीम, पिर की अंधाधुंद पैरवी की सजा
बेशक अल्लाह ने लानत की है काफीरो पर (कुरआन और हदीस की आयतो का इंकान करने वाला काफीर होता है) और तयार कर रखी है इन के लिए जहान्नम की आग, रहेंगे वो इस में हमेशा, ना पाएंगे कोई दोस्त ना मदतगार, जिस दिन उलट पलट किए जाएंगे इन के चेहरे आग में तो कहेंगे के, एै काश हम अताअत करते (बात मानते) अल्लाह की और अताअत करते रसुल की, और कहेंगे हमारे रब बेशक हम ने अताअत की अपने सरदारो की और अपने बडो की तो भटका दिया इन्हो ने हम को रास्ते से, हमारे रब दे इन को दुगना अûजाब और कर लानत इन पर, बहोत बडी लानत।
(सुरे अहजाब (३३), आयत-६४ से ६८)
और कहेंगे वो जिन्हो ने कुफ्र किया हमारे रब हमे दिखा वो लोग जिन्हो ने हम को गुमराह किया था, जिनो में और इंसानो में से के हम इन को रौंद डाले अपने पाव तले ताके वो हो जाए ज़िल्लत उठाने वालो में से
(सुरे हा-मिम (४१), आयत-२९)
हक बात (दिन की बात) अगर शैतान भी बताए तो भी तस्दीक करना चाहिए डायरेक्ट रिजेक्ट नही करना चाहिए
हदीसः अबु हुरेरा (रजि) कहते है के, रसुलुल्लाह (ﷺ) ने मुझ को सदका-ए-फितर की निगेहबानी पर मुकर्रर फरमाया। इतने में एक शख्स आया वो लाप भर-भर कर उस में से (खजुर) लेने लगा। मैं ने उस को पकड लिया, मैं ने कहा, मैं तुझ को रसुलुल्लाह (ﷺ) के पास ले जाऊंगा (छोडुंगा नही)। उस ने कहा (मुझे अल्लाह के रसुल के पास मत ले जाओ मै तुम्हे कुछ बात बताता हुँ जिस से तुम्हे अल्लाह फायदा पहोंचाएगा), अबु हुरेरा! जब तु (सोने के लिए) बिछोने पर जाए तो आयतुल-कुर्सी पढ ले, सुबाह तक अल्लाह तआला की तरफ से तुझ पर एक निगेहबान फरीश्ता मुकर्रर रहेगा और तेरे पास शैतान ना फटकने पाएगा। और अबु हुरेरा (रजि) ने ये बात रसुलुल्लाह (ﷺ) से बयान फरमाई, आप (ﷺ) ने फरमाया, "जो वो बडा झुटा है मगर ये बात उस ने सच कही, वो शैतान था"। (सहीह बुखारी, किताबुल फजाईल कुरआन, हदीस-५०१०)
कुरआन मजीद मे साफ लिखा है के -
"अल्लाह की बात मानो और अल्लाह के रसुल की बात मानो और वो लोग जिन के पास इल्म है
(सुरे निसा (४), आयत-५९)"।
आगे लिखा है के "अगर उल्मा मे इख्तेलाफ है तो फिर से अल्लाह और अल्लाह के रसुल पर लौट जाओ"।
यानी उस की बात हदीस और कुरआन से टकराए तो उस की बात नही ली जाएगी।
अल्लाह और उस के रसुल के मुकाबले में बाप, दादा और मौलवीयो के पिछे मत चलो।
“Aur jab unse kaha jata hai ki, ALLAH ne jo kuch utara hai uski ita-at karo, to kehte hain Nahi, balki ham to uski ita-at karenge jis par hamne apne baap-dada ko paya. Kya us haal me bhi jabki unke baap-dada kuch akal/dimag se kaam na lete rahe ho aur na seedhey raah par rahe ho?” ◆[Quran, Sura Baqra 2/170]
“aur jab unse kaha jata hai ki us cheez ki aur aao jo ALLAH ne naazil ki hai, aur Rasool ki aur, to wo kehte hain Hamare liye to wo hi kaafi hai jis par hamne apne baap-dada ko paya hai. Kya agar unke baap-dada kuch bhi na jaante ho aur na seedhey raah par ho?” ◆[Quran, Sura Muhmmad 47/21]
और जब उनसे कहा जाता है कि उसकी ओर आओ, जो अल्लाह ने उतारा है तथा रसूल की ओर (आओ), तो कहते हैं, हमें वही बस है, जिसपर हमने अपने पूर्वजों को पाया है, क्या उनके पूर्वज कुछ न जानते रहे हों और न संमार्ग पर रहे हों (तब भी वे उन्हीं के रास्ते पर चलेंगे)?
(सुरे मैदाह (५), आयत-१०४)
और जब कहा जाता है उनसे कि पालन करो उस क़ुर्आन का, जिसे उतारा है अल्लाह ने, तो कहते हैं: बल्कि हम तो उसी का पालन करेंगे, जिसपर अपने पूर्वजों को पाया है। क्या यद्यपि शैतान उन्हें बुला रहा हो अल्लाह की यातना की[1] ओर?
(सुरे लुकमान (३१), आयत-२१)
सिर्फ गुमान और अटकलो के पिछे मत चलो
तथा (हे नबी!) याद करो, जब वह सबको एकत्र करके (कहेगाः) हे जिन्नों के गिरोह! तुमने बहुत-से मनुष्यों को कुपथ कर दिया और मानव में से उनके मित्र कहेंगे कि हे हमारे पालनहार! हम एक-दूसरे से लाभान्वित होते रहे[1] और वह समय आ पहुँचा, जो तूने हमारे लिए निर्धारित किया था। (अल्लाह) कहेगाः तुम सबका आवास नरक है, जिसमें सदावासी होगे। परन्तु, जिसे अल्लाह (बचाना) चाहे। वास्तव में, आपका पालनहार गुणी सर्व ज्ञानी है। (सुरे अनाम (६), आयत-१२८)
अकसरीयत (बडी जमाअत) के पिछे मत चलो
और एै सुनने वाले जमीन मे अकसर वो है के तु इन के कहे पर चले तो तुझे अल्लाह की राह से बहका दे वो सिर्फ गुमान के पिछे है और निरी अटकले दौडाते है।
(सुरे अनाम (६), आयत-११६)
एै लोगो इस पर चलो जो तुम्हारी तरफ तुम्हारे रब के पास से उतरा और इसे छोड कर और हाकीमो के पिछे ना जाओ बहोत ही कम समझते हो
(सुरे आराफ (७), आयत-३)
रसुलुल्लाह (ﷺ) की पैरवी ही निजात का बहेतरीन जरीया है।
(ऐ रसूल) जनि लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार कयिा उनसे कह दो कि बहुत जल्द तुम (मुसलमानो के मुक़ाबले में) मग़लूब (हारे हुए) होंगे और जहन्नुम में इकट्ठे किए जाओगे और वह (क्या) बुरा ठकिाना है (सुरे इमरान (३), आयत-१२)
हे नबी कह दोः यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे प्रेम[1] करेगा तथा तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा और अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है। (सुरे इमरान (३), आयत-३१)
हे नबी कह दोः अल्लाह और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करो। फिर भी यदि वे विमुख हों, तो निःसंदेह अल्लाह काफ़िरों से प्रेम नहीं करता। (सुरे इमरान (३), आयत-३२)
ऐ ईमानदारों ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की और जो तुममें से साहेबाने हुकूमत हों उनकी इताअत करो और अगर तुम किसी बात में झगड़ा करो पस अगर तुम ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हो तो इस अम्र में ख़ुदा और रसूल की तरफ़ रूजू करो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अन्जाम की राह से बहुत अच्छा है (सुरे निसा (४), आयत-५९)
और हमने जो भी रसूल भेजा, वो इसलिए, ताकि अल्लाह की अनुमति से, उसकी आज्ञा का पालन किया जाये और जब उन लोगों ने अपने ऊपर अत्याचार किया, तो यदि वे आपके पास आते, फिर अल्लाह से क्षमा याचना करते तथा उनके लिए रसूल क्षमा की प्रार्थना करते, तो अल्लाह को अति क्षमाशील दयावान् पाते। (सुरे निसा (४), आयत-६४)
तो आपके पालनहार की शपथ! वे कभी ईमान वाले नहीं हो सकते, जब तक अपने आपस के विवाद में आपको निर्णायक न बनाएँ[1], फिर आप जो निर्णय कर दें, उससे अपने दिलों में तनिक भी संकीर्णता (तंगी) का अनुभव न करें और पूर्णता स्वीकार कर लें। (सुरे निसा (४), आयत-६५)
तथा जो अल्लाह और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करेंगे, वही (स्वर्ग में), उनके साथ होंगे, जिनपर अल्लाह ने पुरस्कार किया है, अर्थात नबियों, सत्यवादियों, शहीदों और सदाचारियों के साथ और वे क्या ही अच्छे साथी हैं? (सुरे निसा (४), आयत-६९)
जिसने रसूल की आज्ञा का अनुपालन किया, (वास्तव में) उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया तथा जिसने मुँह फेर लिया, तो (हे नबी) हमने आपको उनका प्रहरी (रक्षक) बनाकर नहीं भेजा[1] है (सुरे निसा (४), आयत-८०)
तथा जो व्यक्ति अपने ऊपर मार्गदर्शन उजागर हो जाने के[1] पश्चात् रसूल का विरोध करे और ईमान वालों की राह के सिवा (दूसरी राह) का अनुसरण करे, तो हम उसे वहीं फेर[2] देंगे, जिधर फिरा है और उसे नरक में झोंक देंगे तथा वह बुरा निवास स्थान है। (सुरे निसा (४), आयत-११५)
और ख़ुदा का हुक्म मानों और रसूल का हुक्म मानों और नाफ़रमानी से बचे रहो इस पर भी अगर तुमने हुक्म ख़ुदा सेमुँह फेरा तो समझ रखो कि हमारे रसूल पर बस साफ़ साफ़ पैग़ाम पहुँचा देना फर्ज है (सुरे मैदाह (५), आयत-९२)
ऐ ईमानदारों खुदा और उसके रसूल की इताअत करो और उससे मुँह न मोड़ो जब तुम समझ रहे हो
(सुरे अनफाल (८), आयत-२०)
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