क्या नबी (ﷺ) जन्नत के मालिक है?
क्या नबी (ﷺ) जन्नत के मालिक है?
बेशुमार आयते और हदिसे मिलती है जो बताती है के जन्नत का मालिक अल्लाह है और रसुलुल्लाह (ﷺ) जन्नत की तरफ बुलाने वाले अल्लाह के रसुल है। निचे देखीए....
१। सुरे अनाम (६), आयत नं. ५० में अल्लाह तआला रसुलुल्लाह (ﷺ) से कहलवा रहा है के, --तुम फरमा दो मैं तुम से नही कहता मेरे पास अल्लाह के खजाने है और ना ये कहु के मैं आप (खुद) गैब जान लेता हुँ और ना तुम से ये कहु के मैं फरीश्ता हुँ मै तु इस का ताबे हुँ जो मुझे वही (अल्लाह का पैगाम) आती है। तुम फरमाओ क्या बराबर हो जाएंगे अंधे और आँख वाले तो क्या तुम गौर नही करते--।
इस आयत से साफ जाहीर हो जाता है के अल्लाह तआला के खजानो के मालिक आप (ﷺ) नही है। और जन्नत भी अल्लाह तआला के खजानो में से है।
२। हुजुर (ﷺ) ने उन के चाचा अबु तालीब से बहोत गुजारीश की के वो इमान लाए लेकीन वो इमान नही लाए, अबु तालीब को मरते वक्त भी आप (ﷺ) ने कलमा पढने के लिए इरशाद फरमाया ताके ये कलमा अल्लाह की बारगाह में पेश करके उन की बख्शीश करवा सके। लेकीन अबु तालीब ने कलमा पढने से इनकार कर दिया और उन का इंतेकाल कुफ्र पर हुआ। अबु तालीक के इंतेकाल पर आप (ﷺ) को बहोत गम हुआ। अबु तालीब ने हर वक्त आप (ﷺ) का साथ दिया था और इस्लाम की बहोत मदत की, अबु तालीब को नबी की ûजात से नही बल्की नबी की बात से इन्कार था। इस पर अल्लाह तआला ने ये आयते करीमा उतारी --एै महेबुब तुम इस का गम ना करो, तुम अपना मनसबे तबलीग अदा कर चुके।।।एै नबी तुम हिदायत नही देते जिसे दोस्त रखो, हा खुदा हिदायत देता है जिसे चाहे वो खुब जानता है जो राह पाने वाले है --। दुसरी आयत में अल्लाह तआला फरमाता है के, --रवा नही नबी और इमान वालो को के अस्तगफार करे मुशरीको के लिए अगरचे वो अपने करीबी हो बाद इसके के उन पर जाहीर हो चुका के वो भडकती आग मे जाने वाले है--।
अगर नबी करीम (ﷺ) जन्नत के मालीक होते तो उन्हे अबु तालीब के मौत का गम ना होता और आप उन्हे जहान्नम में ना जाने देते बल्की जन्नत में डाल देते।
३। जंगे ओहद में जब आप (ﷺ) के दंदाने मुबारक शहीद हुए और आप जखमी हुए तो आप (ﷺ) ने फरमाया के, --ये गिरोह कैसे फलाह पाएगा जिस ने अपने पैगंबर से ये सुलुक किया जब के वो इन्हे खुदा की तरफ से दावत देता है--। इस बात पर अल्लाह तआला की तरफ से ये सुरे इमरान (३), आयत नं.१२८ नाûजील हुई और अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया के --किसी किस्म का इख्तीयार तुम्हे नही है मगर ये के खुदा चाहे के इन्हे माफ करे दे या सûजा दे क्युंके वो ûजालीम है--।
पता चला के नबी करीम (ﷺ) की ûजबाने मुबारक से जो जुमला निकले वो अल्लाह की मर्जी के बगैर पुरा नही हो सकता ।
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