अव्वल वक्त मे नमाज पढना अफजल है

 

अव्वल वक्त मे नमाज पढना अफजल है

१।    रसुलुल्लाह () ने फरमाया, "अव्वल वक्त नमाज पढना अफûजल है" (सुनन तिरमीजीः किताबुल सलाह, हदीस-१७०)

२।    सय्यदा आयशा (रजि) से रिवायत है, रसुलुल्लाह () जब नमाजे फजर पढते थे, औरते (मस्जीद से नबी-ए-अकरम के साथ नमाज पढ कर) अपनी चादरो में लिपटी हुई लौटती तो अंधेरे की वजह से पहेचानी ना जाती थी (सहीह बुखारी, अल-आजान, हदीस-८६७, सहीह मुस्लीम, अल-मस्जीद, हदीस-६४५)

३।    रसुलुल्लाह () ने फरमाया, उस वक्त तुम्हारा क्या हाल होगा जब तुम पर एैसे इमाम (मुसल्लत) होंगे जो नमाज मे देर करेंगे!, फिर आप () ने हुकुम दिया के "नमाज को अव्वल वक्त में पढो"। (सहीह मुस्लीम, किताबुल मस्जीद, हदीस-६४८)

४।    हजरत अब्दुल्लाह-बिन-मसुद (रजि) से रिवायत है, नबी () ने फरमाया, "मेरे बाद कुछ एैसे भी लोग तुम्हारे मामलात के निगरान होंगे जो सुन्नत की रौशनी को बुझाएंगे, बिदअत पर अमलपैरा होंगे, और नमाज को वक्त से देर कर के पढेंगे"। मै ने कहा : अल्लाह के रसुल ! अगर मैं उन्हे पाऊ तो क्या करू?, आप () ने फरमाया, "एै उम्मे अबाद के बेटे! मुझ से पुछते हो के क्या करोगे? जो शख्स अल्लाह की नाफरमानी करे, उस की कोई इताअत नही"। (सुनन इब्ने माजा-२८६५)

 

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