बैत और पिर-मुरीदी की शरई हैसीयत

 

बैत और पिर-मुरीदी की शरई हैसीयत

बैत का मतलब अरबी में होता है तिजारत करना, लेन देन करना। अल्लाह तआला फरमाता है के, हम ने मोमीनो की जान और उन के माल के बदले उन को जन्नत दे दी है। तो ये होता है अपने आप को बेचना।

क्या एक इंसान दुसरे इंसान को बेचेगा। गुलामी भी खत्म हो चुकी है। इंसान अपने आप को अल्लाह के आगे बेच सकता है, लेकीन कोई इंसान, इंसान को नही बेच सकता।

रसुलुल्लाह () की बैत अल्लाह की बैत है। क्युंके रसुलुल्लाह () अल्लाह के भेजे हुए नुमाएंदे है। अब कयामत तक जो शख्स कलमा पढेगा वो अल्लाह के रसुल की और अल्लाह की बैत में आएगा। हर सही अकिदा मुसलमान के मुरशीद (पिर) रसुलुल्लाह () है। तो यही बैत साबीत है इस के अलावा कोई बैत साबीत नही है।

हमारे मुरशीद रसुलुल्लाह () के बारे में अल्लाह तआला फरमाता है के, "तुम्हारे नबी ना कभी बहके है ना कभी बे-राह चले है"।

बरेलवी जमाअत के लोग एक किस्सा बयान करते है के, शेख अब्दुल कादीर जिलानी के पास शैतान एक बादल की शकल में आया, बडा नुर निकला और उस ने शेख अब्दुल कादीर जिलानी से मुखातीब हो कर कहा के, मैं तुम्हारा रब हुँ, आज के बाद तुम्हारी सारी नमाजे माफ। तो शेख अब्दुल कादीर जिलानी ने -लाहोल वला कुवता इल्ला बिल्लाह- पढा तो वो वहा से गायब हो गया। तो गायब होते होते उस ने कहा के एै अब्दुल कादीर तु अपने इल्म की वजह से बच गया। शेख अब्दुल कादीर जिलानी ने कहा के मै अपने इल्म की वजह से नही बल्की अल्लाह के फजल की वजह से बचा हुँ। तो वो शैतान चिख मारता हुआ वहा से गया और उस ने कहा के अब्दुल कादीर मैं ने तेरे इस मरतबे पर पहोचे हुए ७० औलीयाओ को दोजख में पहोचा दिया है इस फरेब से। अब गौर करे के शेख अब्दुल कादीर जिलानी के मरतबे के ७० वली जहान्नम मे है तो उन के मुरीदो का क्या हाल होगा?

अहमद रûजा खान साहब अपनी किताब बैत-व-खिलाफत में लिखते है के, ये कौल गलत है के जिस का कोई पिर नही उस का पिर शैतान है, जो मोमीन है उस के पिर रसुलुल्लाह () है।

 

एक और बैत है जो साबीत है जिस का नाम खलीफतुल मुस्लीमीन की बैत है

कुरआने करीम में सुरे निसा (४), आयत नं.५९ में अल्लाह तआला फरमाता है के, "एै इमान वालो हुकम मानो अल्लाह का और हुकम मानो रसुल का और इन का जो तुम मे हुकुमत वाले है, फिर अगर तुम में से किसी बात का झगडा उठे तो उसे अल्लाह और रसुल के हुजुर रुजु करो अगर अल्लाह व कयामत पर इमान रखते हो, ये बहेतर है और इस का अंजाम सब से अच्छा है"।

इस का मतलब ये है के अल्लाह और अल्लाह के रसुल की बात मानो और उन की भी बात मानो जो तुम्हारे उपर हुकूमत करते है, लेकीन अगर तुम मे नाईत्तेफाक हो जाए तो अल्लाह और रसुल की तरफ लौटो।

रसुलुल्लाह () की वफात के बाद पहेले खलीफा हजरत अबुबकर (रजि) बने, उन के बाद हजरत उमर (रजि) दुसरे खलीफा बने, फिर उन के बाद हजरत उस्मान (रजि) तिसरे खलीफा बने और उन के बाद हजरत अली (रजि) चौथे खलीफा बने।

सहीह मुस्लीम की हदीस नं.४७९९ है के, "जब एक खलीफा की बैत कर ली जाए और दुसरा उस के खिलाफ बगावत करे तो उसे कत्ल कर दो"।

यानी मुसलमानो का एक वक्त में एक ही खलीफा होगा, एक खलीफा होते हुए दुसरा खलीफ नही हो सकता। आज लोग कहते है के, अब तो खलीफा नही रहे, इसलिए हमारे बुजुर्ग वही बैत को ले कर चल रहे है। अगर ये बात मान ली जाए तो सही मुस्लीम की हदीस भी मान्ना पडेगी के एक ही खलीफा की बैत होगी और बाकी सारो को कत्ल किया जाएगा। हमारे माशरे में एक पिर होते हुए भी दुसरे पिर बनते है।


कुरआन की आयत से पता चलता है की, हुकमरान (पिर, अमिर, बुजुर्ग, उलमा) की बात अगर किताब व सुन्नत के खिलाफ हो तो नही ली जाएगीः

१।    सहीह बुखारी और मुस्लीम की हदीस है और हजरत अली (रजि) खुद इस के रावी है, आप बयान करते है के, मै ने रसुलुल्लाह () से सुना है के, अगर किसी खलीफा की बैत की जाती है तो उस के अमिर की बात उस वक्त तक मानी जाएगी जब तक अल्लाह और उस के रसुल के हुकुम के अंदर है और अगर वो अल्लाह और उस के रसुल की नाफरमानी बताए तो उस की बात नही मानी जाएगी। आज लोग बुजुर्गो की और पिरो की बातो को इतना बडा दर्जा देते है के, अगर उन से कहा जाए के फलाह बात सुन्नत के खिलाफ है तो कहते है के, क्या हमारे बुजुर्ग हमारे पिर, हमारे उल्मा पागल है?

२।    सहीह बुखारी और सहीह मुस्लीम की हदीस है के, "जिस ने अमिर की बात मानी उस ने मेरी बात मानी और जिस ने मेरी बात मानी उस ने अल्लाह की बात मानी"।

 

एक सफर के दौरान एक अमिर ने कहा के मुझे रसुलुल्लाह () ने तुम्हारा अमिर बनाया है। उस अमिर ने लकडीयो का ढेर जमा किया और उस मे आग लगाई और उस के पैरोकारो (फाùलोवर) से कहा के इस आग में छलांग लगाओ, मेरी बात मान्ना तुम पर वाजीब है। सहाबा इकराम ने कहा के खुदकुशी इस्लाम में हराम है तो उन्हो ने उस की बात नही मानी। हुजुर () के पास जब ये शिकायत गई तो आप () ने फरमाया के "अगर ये आग में छलांग लगा लेते तो दोजख की आग में निकलते"। तो पता चला के कोई मुल्ला, उल्मा, पिर या बुजुर्ग भी अगर अल्लाह और रसुल की ना फरमानी सिखाए तो उस की बात नही ली जाएगी।

 

बरेलवी पिर की बेशर्मीः-

सय्यदी अहमद सहाज लमासी की दो बिवीयां थी, सय्यदी अब्दुल अजीज (रहे) ने उन से फरमाया -

"रात को तुम ने एक बीवी के जागते दुसरी के साथ हमबिस्तरी की, एैसा नही करना चाहिए था"।

अरज की - "हुजुर! वो उस वक्त सोयी हुई थी"।

फरमाया - सोती ना थी, सोते में जान डाली थी (यानी झुठ मुठ की सोयी हुई थी)।

अरज किया - "हुजुर को किस तरहा पता चला?"

फरमाया - "जहा वो सो रही थी कोई और पलंग (बेड) भी था?

अरज किया - "हां एक पलंग खाली था"

फरमाया - उस पलंग पर मैं था, तो किसी वक्त शेख (पिर) मुरीद से जुदा नही, हर वक्त साथ है।

(हिकायत-ए-रिûज्वीया ५५) (मल्फुûजात आला हजरत, बरेलवी वाùल्युम २, पेज नं.५६)

इस से बढ कर बुरी बात और क्या हो सकती है के, के पिर घर के अंदर झाक रहा है और मिया बीवी के तालुकात पर नजर बनाए हुए है।

सहीह मुस्लीम की हदीस है के, _"जिस ने बगैर इजाûजत किसी के घर मे झाका घर वालो को इख्तीयार है के वो उस झाकने वाले की आँख पर मारे और अगर आँख फुट कर बाहर आ जाए तो मारने वाले पर कोई गुनाह नही होगा"।_

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