हमारे नबी को इल्मे-गैब किस तरहा है?

 

हमारे नबी को इल्मे-गैब किस तरहा है?

इल्मे गैब के बारे में बरेलवीयो (सुन्नी जमाअत) का अकिदा ये है के आप (स।स) को गैब का इल्म दे दिया गया है। आप को कायनात के जररे जररे और चप्पे चप्पे का इल्म है

 

इल्मे-गैब (गैब की खबर)

ये वो इल्म है जो अपने अकल से ना जान सके और अपने हवासे खमसा (देखकर, सुन कर, सुंग कर, चख कर, छु कर) से ना जान सके, सिर्फ किसी के बताने से हमे खबर हो। जन्नत मौजुद है ये किसने बताया? नबी ने बताया। इस का मतलब नबी को इल्मे-गैब है। नबी को हर किस्म का गैब का इल्म है, उन से कुछ छुपा नही है।

कुरआन और सहीह हदीस से सबुत मिलते है के आप () को इल्मे गैब था लेकीन उतना ही था जितना आप को अल्लाह वही के जरीए बता देता था।

जो लोग कहते है के आप () इल्मे गैब बिल्कुल नही था वो भी गलत है और जो कहते है के आप () को हर चिज का इल्मे गैब था वो भी गलत है।

१।    हदीसः आयशा (रजि) ने बयान किया के अगर तुम से कोई कहता है मुहम्मद () इल्मेगैब जानते थे तो गलत कहता है (झुठा है) क्युंकी अल्लाह तआला खुद कहता है के गैब का इल्म अल्लाह के सिवा किसी को नही {Sahih-Bukhari ७३८०}{Sahih-Bukhari ४८५५}

२।    हदीसः हजरत अबु हुरेरा (रजि) से रिवायत है के एक दिन रसुलुल्लाह () लोगो में तशरीफ फरमा हुए थे के आप के पास एक शख्स आया इस ने पुछा कयामत कब आएगी? आप () ने फरमाया के, "इस के बारे मे जवाब देने वाला पुछने वाले से कुछ ज्यादा नही जानता" {Sahih-Bukhari ५०}

३।    और वो कोई बात अपने ख्वाहीश से नही करते, वो तो नही मगर वही जो इन्हे की जाती है। (सुरे नजम (५३), आयत-३,४)

४।    आप फरमा दिजीए के मैं खुद अपनी ûजात खास के लिए किसी नफा का इख्तीयार नही रखता और ना किसी नुकसान का मगर इतना ही के जितना अल्लाह ने चाहा हो। और अगर मैं गैब की बाते जानता होता तो मैं बहोत से नफा हासील कर लेता और कोई नुकसान मुझ को ना पहोंचता, मैं तो सिर्फ डराने वाला और बशारत देने वाला हुँ इन लोगो को जो इमान रखते है। (सुरे एैराफ (७), आयत-१८८)

 

इस आयत की तफसीरः

खरीदारी के वक्त मुझे ये मालुम हो जाता के मुझे किस चिज में नुकसान होगा और इस तरहा जो चिज भी मैं बेचता मुझे इस में नफा ही हासील होता और मुझे कोई तकलीफ ना पहोंचती (तफसीर इब्ने-आबी-हातीम, १६२९/५)

इमाम इब्ने जारयार फरमाते है के मुफस्सरीन ने इस के माने ये बयान किये है के अगर मैं गैब की बात जानता होता तो खुशहाली के दौर में कहत साली की तैयारी कर लेता। (तफसीर तिबरीयाई-१९०/९)

अब्दुल रहेमान बिन-अस्लम (रहे) ने इस के माने ये बयान किये है के किसी मुसीबत के आने से पहेले मैं इस से बचने की तदबीर इख्तीयार कर लेता और इस से बच जाता। (तफसीर इब्ने आबी हातीम, १६३०/५)

२।    गैब का जान्नेवाला अपने गैब को किसी पर जाहीर नही करता सिवाय अपने रसुलो के जिसे वो पसंद कर ले, और उन के आगे पिछे पहेरेदार मुकर्रर कर देता है। (सुरे जिन्न (७२), आयत :२६-२७)

इस आयत से पता चला के गैब की बात की निगरानी फरीश्ते करते है, ये गैब की बात जिबराईल अलैहिस्सलाम लाया करते थे। अगर आप () को इल्मे गैब होता तो जिबराईल अलैहिस्सलाम को आ कर गैब की खबर देने की क्या जरूरत थी? और उस खबर को इतनी निगरानी की क्या जरूरत थी?

३।    शहेद का वाकीया जिस में रसुलुल्लाह () की दो बिवीयो ने मंसुबा-बंदी की और उस के नतीजे में रसुलुल्लाह () ने अपने उपर शहेद हराम फरमा लिया, बाद में अल्लाह ने आप () को सारी बात बता दी। (सुरे तेहरीम (६६), आयतः१-४) (सहीह बुखारी, किताबुल तफसीर, हदीस-४९१२, ५२६७, ५२६८, Bukhari Volume , Book ६०, Number ४३४)

४।    एक सफर में हजरत आयशा (रजि) का हार गुम हो गया। रसुलुल्लाह () इसे ढुंढने के लिए रुक गए और लोग भी आप के साथ रुक गए। हजरत आयशा के वालीद बहोत खफा हुए, बाद में उस उंट को खडा किया गया जिस पर हजरत आयशा (रजि) सवार थीं तो हार उस के निचे से मिल गया (सहीह बुखारी, हदीस-३३४, ३६७२) (सहीह मुस्लीम, किताबः अल-हैû, हदीस-३६७)

५।    आप () के बिमारी में जब आप की बिमारी बढ गई तो आप बार-बार बेहोश हुए, जब होश आता तो फरमाते क्या लोगो ने नमाज पढ ली? अर्ज किया जाता -नही-, लोग आप () का इंतेजार कर रहे है, एैसा तीन बार हुआ (सहीह बुखारी, किताबुल आûजान, हदीस-६८७, सहीह मुस्लीम, किताबुस सलाह, हदीस-४१८)

६।    रसुलुल्लाह () ने ४० या ७० कुरआन के आलीम सहाबा की एक जमाअत मुशरीकीन के पास भेजी थी, मुशरीकीन ने उन को रास्ते में कत्ल कर दिया। (सहीह बुखारी, किताबुल वितर, हदीस-१००१, १३००) अगर आप () को इल्मे गैब होता तो आप सहाबा को मुशरीकीन के साथ जाने ना देते।

७।    एक दफा सुरज ग्रहन हुआ तो आप () बहोत घबरा कर उठे, इस डर से के कही कयामत ना कायम हो जाए (सहीह बुखारी-१०५९, सहीह मुस्लीम-९१२)

८।    एक सहाबीया फौत हो गई लेकीन रसुलुल्लाह () को उस की वफात की खबर किसी ने ना दी। वो सहाबीया मस्जीद में झाडु लगाया करती थी। एक दीन आप () ने खुद याद फरमाया के वो शख्स दिखाई नही देती। सहाबा (रजि) ने कहा उस का तो इंतेकाल हो गया। आप () ने फरमाया, फिर तुम ने मुझे खबर क्यु ना दी, चलो मुझे उस की कबर बता दो। (सहीह बुखारी-४५८, सहीह मुस्लीम-९५६, सहीह बुखारी किताब-४, हदीस-२०८८)

९।    रसुलुल्लाह () ने फरमाया, मैं अपने घर जाता हुँ, वहा मुझे मेरे बिस्तर पर खजुर पडी हुई मिलती है, मैं उसे खाने के लिए उठा लेता हुँ लेकीन फिर ये डर होता है के कही ये सदका की खजुर ना हो तो मैं उसे फेंक देता हुँ। (सहीह बुखारी-२४३२, सहीह मुस्लीम-१०७०)

१०।   एक यहुदी औरत रसुलुल्लाह () की खिदमत में ûजहेर मिला बकरी का गोष्त लाई। आप () ने उस में से कुछ खाया फिर जब उस औरत को लाया गया तो उस ने ûजहेर का इकरार कर लिया तो कहा गया के क्युं ना इसे कत्ल कर दिया जाए? आप () ने फरमाया, -नही-। हजरत अनस (रजि) कहते है के उस ûजहेर का असर मै ने हमेशा रसुलुल्लाह () के तालु (uvula) में महेसुस किया। (सहीह बुखारी-२६१७, सहीह मुस्लीम-२१९०)

एक यहुदी औरत ने आप को दावत की और खाने में ûजहेर मिला दिया जिसे आपने भी खाया और सहाबा (रजि) ने भी, हत्ता के कुछ सहाबा (रजि) ने खाने के ûजहिरेपन से हलाक (मौत) ही हो गए और खुद नबी-ए-करीम () उमर भर इस ûजहेर के असरात महेसुस फरमाते रहे। - अगर आप () को इल्मे गैब होता तो आप सहाबा को ûजहीरीला खाना क्यु खाने देते?

दिगर दलाईलः  कुरआन की बेशुमार आयते और बेशुमार हदीसे हे, सब को लिखना मुमकीन नही है इसलिए आप को सुरा नंबर और आयत नंबर बताई जा रही है इसी तरहा हदीस नंबर बताया जा रहा है। इन्हे पढने के बाद आप खुद ही फैसला कर देंगे के हकीकत क्या है।

 

कुरआन से दलीलेः

[Surah Shuraa, ४२:५२]           [Surah Qasas, २८:४४-४६]

[Surah Qasas, २८:८६]           [Surah Namal, २७:६५]    [Surah Nisa, ४:१६४]

[Surah Maidah, ५:१०९]          [Surah Namal, २७:६५]    [Surah Luqmaan, ३१:३४]

[Surah Muddassir, ७४:३१]        [Surah Abasa, ८०:१-१२]   [Surah Taubah, ९:१०१]

[Quran ३५:२२]                [Quran ३०:५२]         [Quran ६:५०]

[Quran ७:१८८]  

[Surah Ahzab, ६३ - Surah Shoora, १७ - Surah Araaf, १८७ - Surah Ta-Ha, १५ - Surah Namal, ६५ - Surah Luqman, ३४ - Surah Fussilat, ४७ - Surah Zukhruf, ८५ - Surah Mulk, २५-२६]

 

सहीह हदीस से दलीले :

 [Surah Noor, २४:१६-२६ - Bukhari, #४१४१]

 [Surah Tehreem, ६६:१-४ - Sahih Bukhari, #४९१२-५२६७-५२६८]

 [Sahih Muslim, Hadith#२५३८]

 [Sahih Bukhari, #३४९-४२३३ - Sahih Muslim, #१६३]

 [Sahih Bukhari, #६९९९ - Sahih Muslim #१६९]

 [Sahih Bukhari, #४८५५ - Sahih Muslim, #१७७]

 [Sahih Bukhari, #६५७३ - Sahih Muslim, #१८२]

 [Sahih Bukhari #२८०]

 [Sahih Bukhari, #३३४-३६७२ - Sahih Muslim, #३६७]

 [Sahih Bukari, #६८७ - Sahih Muslim, #४१८]

[Sahih Bukhari, #१००१-१३००]

[Sahih Bukhari, #५९५ - Sahih Muslim, #६८०-६८१]

[Bukhari: ११५१]

[Bukhari: ३२०६]

[Bukhari: १०५९ - Muslim: ९१२]

[Bukhari: १२५४-१२५८ - Muslim:९३९]

[Bukhari: ४५८ - Muslim: ९५६]

[Bukhari: ६४४३]

[Bukhari: १४६६ - Muslim: १०००]

[Bukhari: २४३२ - Muslim: १०७०]

[Bukhari: २५७६ - Muslim:१०७७]

[Bukhari: २०१६ - Muslim: ११६७]

[Bukhari: ३०५]

[Bukhari: १५६८ - Muslim: १२१६]

[Bukhari: ३०४४ - Muslim: १३५७]

[Bukhari: ५१५५ - Muslim: १४२६]

[Bukhari: ३७१ - Muslim:१३६५]

[Bukhari: ५२१० - Muslim: १४३८]

[Bukhari: २६४७ - Muslim: १४५५]

[Bukhari: २०९७ - Muslim]

[Bukhari: ५३१६ - Muslim: १४९७]

[Bukhari: ४५७७ - Muslim: १६१६]

[Bukhari: २५८६ - Muslim: १६२३]

[Bukhari: ३०१८ - Muslim: १६७१]

[Bukhari: ३१४१ - Muslim:१७५२]

[Bukhari: ४११७ - Muslim: १७६९]

[Bukhari: ३९६२ - Muslim: १८००]

[Bukhari: ५५३७ - Muslim: १९४६]

[Bukhari: ४८८९-३७९८ - Muslim: २०५४]

[Bukhari: ५४७० - Muslim: २१४४]

[Bukhari: ६२५० - Muslim: २१५५]

[Bukhari: ६२४१ - Muslim: २१५६]

[Bukhari: २६१७ - Muslim: २१९०]

[Bukhari: ७०४७ - Muslim: २२७५]

[Bukhari: २९०८-२६२७ - Muslim: २३०७]

[Bukhari: २४१२ - Muslim: २३७४]

[Bukhari: ३३८३ - Muslim: २३७८]

[Bukhari: १२२ - Muslim: २३८०]

[Bukhari: ५२२६-३६७९ - Muslim: २३९४]

[Bukhari: ४४१ - Muslim: २४०९]

[Bukhari: २८४६-३७१९-४११३ - Muslim: २४१५]

[Bukhari: ५८८४-२१२२ - Muslim:२४२१]

[Bukhari: १३४२]

[Bukhari: ४१४१]

[Bukhari: १३३६]

[Bukhari: ६५१७]

[Bukhari: ७०१८]

[Bukhari: ३०४५]

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