नमाज पढने का सुन्नत तरीका सहीह हदीस से साबीत - (मर्द और औरत के लिए)

 

नमाज पढने का सुन्नत तरीका सहीह हदीस से साबीत- मर्द और औरत के लिए

अल्लाह तआला के महेबुब, हमारे निहायत ही शफीक आका, इमामे आजम, इमामे कायनात, सय्यिदुल अव्वलीन वल आखिरीन, इमामु व खातमुल अंबिया वल मुर्सलीन, शफिउल मुज्नबीन, रहेमतुल लिल आलमीन, सय्यिदना मुहम्मदुर रसुलुल्लाह () की मुकम्मल नमाज का तरीका निचे दिया हुआ है।

जैद ताबी (रहे) का बयान है के सय्यिदना हुजैफा बिन यौमान (रजि) ने एक शख्स को देखा जो नमाज का रुकू और सजदा मुकम्मल नही अदा कर रहा था (यानी सुन्नत के तरीके पर नही कर रहा था) तो रसुलुल्लाह () ने फरमाया "तु ने नमाज पढी ही नही और अगर तु इसी तरहा पढता रहा तो उसी तरीके पर न मरेगा जो अल्लाह ने मुहम्मद () के सिखाया है" (सहीह बुखारीः७९१)

 

१।    रसुलुल्लाह () अपनी नमाज तकबीर अल्लाहु अकबर कह कर शुरू फरमाते और दोनो हाथ कन्धों तक उठातें (यानि रफयुलदैन करते) (सहीह बुखारीः७३५, सहीह मुस्लीमः८६१)

                                 

रफयुलदैन

 

नोटः तकबीर कहते वक्त चेहरा काबे की तरफ करे और हथेलीया भी।
नोटः रसुलुल्लाह () से नमाज के शुरूवात में होथो से कानो का पकडना या छुना साबित नही। मगर कानो के बराबर हाथ उठाना (यानि रफयुलदैन करना) जरूर साबीत है। (सहीह मुस्लीमः८६५)

नोटः नमाûज की नियतः नियत दिल के इरादे को कहते है _(मुंह से नियत पढना बिदअत है। दिल में ये नियत होनी चाहिए के मै फला नमाज पढ रहा हुँ, मिसाल के तौर पर - ûजोहर की फर्ज नमाज या सुन्नत नमाज। मुंह से नियत पढ कर अल्लाह को तफसील देने की जरूर नही है, अल्लाह सब जानता है। ûजबान से नियत पढना किसी नबी () , साहबा और चौरो इमाम से साबीत नही है। नमाज की नियत तो उसी वक्त हो जाती है जब इंसान आजान सुन कर घर से मस्जीद की तरफ चल पडता है, जिस की बिना पर उसे हर कदम पर नेकी मिलती है)

 

रसुलुल्लाह () के मुबारक जमाने में आप () की तरफ से लोगो को इस बात का हुक्म दिया जाता था कि वो (कियाम) नमाज में दाया हाथ बाए जिराआ पर रखे और खुद आप () भी नमाज में अपना दाया हाथ अपनी बाए हथेली, कलाई, और साआद पर रखा करते थे (सहीह बुखारीः७४०, अलमुवत्ता मालीकः१५९/१, ३७७, सहीह मुस्लीमः८९६, सुनन नसाईः८९०)

 

                             

नोटः कोहनी के सिरे से दरमियानी उंगली के सिरे का हिस्सा -जिराआ- और कोहनी से हथेली तक का

हिस्सा -साआद- कहलाता है।

नोटः दाए हाथ को, बाए हाथ की पुरी जिराआ (हथेली, कलाई और हथेली से कोहनी तक) पर रखा जाए तो खुद ब-खुद नाफ से उपर "सीने के दरमियानी हिस्से" तक आ जाता है और यही सहीह हदीस से साबित है, चुनाँचे सय्यिदना हालिब ताई (रजि) बयान करते है की, रसुलुल्लाह () अपना दाया हाथ अपने बाए हाथ पर, सिने पर रखा करते थे (मुस्नद अहमदः२२६/५, २२०१७)

 

नोटः नाफ से निचे हाथ बांधने वाली हदीस की सनद में अब्दुर रहेमान बिन इस्हाक अल कूफी को खुद इमाम दाऊद ने जईफ लिखा और उसकी तमाम शवादिद भी जईफ है।  (सुनन अबु दाऊदः७५६)

 

रसुलुल्लाह () तकबीर के बाद निचे की दुआ पढने का हुकम फरमातेः (सहीह मुस्लीमः८९२, जामे तिरमीजीः२४२, सुनन नसाईः११३७)

                          

रसुलुल्लाह () सना पढने के बाद निचे की दुआ पढते थे  (सहीह बुखारीः६११५, सहीह मुस्लीमः६६४६)

                              

रसुलुल्लाह () इस के बाद निचे की दुआ पढते थे (सहीह मुस्लीमः८९०)

                                

रसुलुल्लाह () इस के बाद सुरेफातेहा पढा करते थे (सहीह बुखारीः७४३, सहीह मुस्लीमः८९२)

 

नोटः रसुलुल्लाह () ताकीदन इर्शाद फरमाते है के, जो शख्स सुरे फातेहा नही पढता उस की नमाज नही होती। और ये भी फरमाते है के "इमाम के पिछे किराआत मत किया करो सिवाए सुरे फातेहा के क्युंके जो सुरे फातेहा नही पढता उसकी नमाज ही नही होती (सहीह बुखारीः७५६, सहीह मुस्लीमः८७४, जामे तिरमीजीः३११, सुनन अबुद दाऊदः८२३,८२४)। इसी तरहा से अल्लाह तआला सुरे ऐराफ (७) की आयत नं.२०४ मे इरशाद फरमाता है के, जब कुरआन पढा जाए तो उस की तरफ कान लगा कर सुनो और और खामोश रहो के तुम पर रहेम हो। तो हदीस और कुरआन से ये नतिजा निकला के, जब इमाम सुरे फातेहा पढे तो खामोश रह कर सुनो और जब इमाम खामोशी में पढे तो सुरे फातेहा पढो इस से कुरआन और हदीस दोनो पे अमल हो जाएगा।

 

रसुलुल्लाह () सुरे फातेहा के बाद उंची किरात वाली नमाज मे आमीन भी उंची आवाज से कहते थे। (सुनन अबु दाऊदः९३२, ९३३, सुनन नसाईः८८०)

 नोटः हनफी आहिस्ता से आमीन कहते है और ये सरासर हदीस के खिलाफ है।

रसुलुल्लाह () पहली दो रकाअतो मे सुरे फातेहा के साथ और सुरा भी या कुरआन का कुछ हिस्सा पढते थे (सहीह मुस्लीमः१०१३, सहीह बुखारीः७६२, सुनन अबु दाऊदः८५९)

नोटः रसुलुल्लाह () आखरी दो रकातो में सिर्फ सुरे फातेहा पढते और कभी कभी साथ कोई सुरा भी  मिला लेते थे (सहीह बुखारीः७७६, सहीह मुस्लीमः१०१३ और १०१४)

रसुलुल्लाह () किराआत के बाद रकु से पहेले सक्ता (यानी कुछ देर तक के लिए वक्फा) भी फरमाया करते थे (सुनन अबु दाऊदः७७७ और ७७८, सुनन इब्ने माजाः८४५)

रसुलुल्लाह () रुकु के लिए तकबीर कहते तो दोनो हाथ कंधो तक और कभी कभी कानो तक उठातें (रफयुलदैन), अपने हाथों से घुटने को मजबुती से पकडते, अपनी कमर झुकाते, न तो सर मुबारक पेट से उंचा होता ना नीचा, बल्कि पेट की सीध में बिल्कुल बराबर होता और दोनो हाथ अपने पहेलुओ से दुर होते थे (रुकु) (सहीह बुखारीः७३५ और ८२८, सहीह मुस्लीमः८६५, सुनन अबु दाऊदः७३४)

                          

                             रफयुलदैन (तकबीर)

                        

नोटः रुकु मे जाने से पहेले रफयुलदैन करे फिर अल्लाहु-अकबर कहते हुए रुकु में जाए। रुकु

करते वक्त सजदे की जगह पर नजर रखे।

 

रसुलुल्लाह () से रुकु में दुआए साबीत है इन में से एक है (अल-मुसनफ इब्ने अबी शेबाः२२५/१, २५७१)

                                

रसुलुल्लाह () रुकु से सर मुबारक उठाते तो दोनो हाथ कंधो तक और कभी कानो तक उठातें और ये दुआ पढते (सहीह बुखारीः७३५,सहीह मुस्लीमः८६१ और ८६५)

                       

                              

                                  रफयुलदैन (तकबीर)

नोटः रुकु से उठते वक्त "समीअल्लाहु लिमन हमिदाह" कहते हुए रुकु से उठे और रफयुलदैन कर के फिर "रब्बना लकल-हम्द" कह कर सजदे मे जाए।

नोटः अफजल यही है के, मुक्तदी भी नमाज में इमाम के पीछे ये दुआ पुरी ही पढे (अल-मुसनफ इब्ने अबी शेबाः२२७/१, २६००) 

                      

कौमाह में हाथ सीधे छोडने पर उम्मत का अम्ली तवातर और इजमा (agreement of the Muslim scholars) है, बल्कि अरकान-ए-नमाज में हाथो की सुन्नत हालत बताने वाली हदीस में भी इसका इशारा मिलता है (सुनन नसाईः८९०)

रसुलुल्लाह () तकबीर कहते हुए सज्दे के लिए झुकते तो आप () फरमाते मुझे सात हड्डीयों पर सज्दा करने का हुकम दिया गया है, पेशानी नाक, दो हाथ, दो घुटने, और दो पांव, मजीद फरमाया के जब तुम सज्दा करो तो उंट की तरहा न बैठो (बल्की) अपने दोनो हाथो को घटनो से पहले जमीन पर रखो (सहीह बुखारीः८०३ और ८१२, सहीह मुस्लीमः८६८, सुनन अबु दाऊदः८४०)

 

नोटः सजदे मे जाते वक्त अपने दोनो हाथ जमीन पर पहेले रखे फिर घुटने जमीन पर टेके।


रसुलुल्लाह () सजदे में नाक और पेशानी, जमीन पर खुब जमा कर रखते, अपने बाजुओ को अपने पहलुओ से दुर रखते और दोनो हथेलिया कंधो के बराबर (जमीन) पर रखते और कभी अपनी दोनो हथेलिया को अपने कानों के बराबर रखते, और सजदे में अपने हाथ (जमीन पर) रखते तो न तो उन्हो बिछाते और न (बहुत) समेटते, और रसुलुल्लाह () अपनी पांव की उंगलियो को किबला रुख रखते और पांव की दोनो एडियाँ मिला लेते थे। (सहीह बुखारीः८२८, सहीह मुस्लीमः११०५, सुनन अबु दाऊदः७३० और ७३४, सुनन नसाईः८९०)

नोटः सजदा करते वक्त पाव की दोनो एडियो को मिला ले, हाथो को कुत्ती की तरहा ना बिछाए

रसुलुल्लाह () हुकम फरमाते "सजदे में ऐतदाल करो, कुत्ते की तरहा बाजु न बिछाओ, अपनी हथेलिया जमीन पर रखो और कोहनियाँ उठा लों" (सहीह बुखारीः८२२, सहीह मुस्लीमः११०४)

नोटः इस सहीह हदीस के वाजेह हुकुम के तहेत औरतें भी सजदो में बाजु ना बिछाए, मजीद ये की मर्दो और औरतो की नमाज के तरीके में कोई फरक नही है, और इस बारे मे जो भी हदीसे पेश की जाती है वो सब के सब जईफ है। जब की सहीह हदीस में साफ हुकम है "नमाज इसी तरहा पढो जिस तरहा मुझे (रसुलुल्लाह () को) पढते हुए देखते हो (सहीह बुखारीः६३१)

 

रसुलुल्लाह () से सजदो मे २/३ दुआए साबित है उन मे से एक निचे दी गई है। ये दुआ कम से कम ३ मरतबा पढे (अल-मुसनफ इब्ने अबी शेबाः२२५/१, २५७१)

                                  

 

रसुलुल्लाह () तकबीर कहे कर सजदे से सर मुबारक उठाते और (जल्से में) अपना बाया पांव बिछाकर उस पर बैठ जाया करते थे (सहीह बुखारीः८२७, सुनन अबु दाऊदः७३०)

                        


रसुलुल्लाह () जब भी तशहुद के लिए बैठते तो अपने दोनो हाथ अपनी दोनो रानाो (मांडीयो) पर रखते कभी दाया हाथ दाए घुटने और बाया हाथ बाए घुटने पर रखते। फिर दाए अंगुठे को दरमियानी उंगली से मिलाकर हल्का बनाते। रसुलुल्लाह () अपनी शहादत की उंगली को थोडा सा झुका देते और उंगली से इशारा करते हुए इसके साथ तशहुद में दुआ करते और उंगली को (आहिस्ता आहिस्ता) हरकत भी देते और इसकी तरफ देखते रहते थे (सहीह मुस्लीमः१३०८ और १३१०, सुनन अबी दाऊदः९९१, सुनन नसाईः११६१ और ११६२ और १२६९, सुनन इब्ने माजाः९१२) 

                            

नोटः पहेले तशहुद में बैठने के बाद उंगली का हल्का बना कर बैठे और उंगली को उठा कर रखे।

नोटः "लाईलाहा" पर उंगली उठाना और इल-लल्लाह पर रख देना, किसी हदीस से साबित नही और फिकाह हनफी से भी साबीत नही है। इसके बरअक्स सहीह हदीसो से ये साबित है के पुरे तशहुद में हल्का बनाकर शहादत की उंगली लगातार उठाई जाए।

रसुलुल्लाह () आखरी तशहुद मे बाए पांव को दाए पांव के निचे से निकाल कर बाए कुल्हे पर बैठ जाते और दाए पांव का पंजा किबला रुख कर लेते (सहीह बुखारीः८२८)

                                     

नोटः पहेले और आखरी के तशहुद में एक जैसा नही बैठा जाता है (फोटो देख कर आप को पता चलेगा)। पहेले तशहुद में दोनो मांडीयो पर बैठे और आखरी तशहुद में बाया पैर सिधे पैर के निचे से निकाल कर उलटे पैर के कुल्हे पर बैठ।

 

नोटः आखरी तशहुद में उंगली का हल्का बना कर रखे और उंगली उठाए रखे, अत्तहियात और दुरूदे इब्राहीम पढे फिर दुआ पढते वक्त शहादत की उंगली को हलकी सी हरकत देते रहे और उंगली की तरफ देखते रहे।

 

रसुलुल्लाह () तशहुद के लिए ये दुरूद शरीफ (दुरुदे इब्राहीम) भी सिखाया करते (सहीह बुखारीः३३७०, सहीह मुस्लीमः९०८)

                                         

दुरुदे इब्राहीम पढने के बाद और दो दुआए रसुलुल्लाह () से पढना साबीत है लेकीन उन दो दुआओ के अलावा भी कोई और दुआ जो कुरआन व सुन्नत से साबित हो पढने की इजाûजत फरमाई है।

रसुलुल्लाह () सलाम फेर कर नमाज मुकम्मल फरमाते थे (सहीह बुखारीः८३८, सहीह मुस्लीमः१३१५, जामे तिरमीजीः२९५, सुनन अबी दाऊदः९९६, सुनन नसाईः१३२०, सुनन इब्ने माजाः९१४)

नोटः पहेले सिधी तरफ सलाम फेरे, सिधी तरफ सर मुकम्मील घुमाने के बाद "अस्सलामु अलैकुम व-रहेमतुल्लह" कहे। इसी तरहा से बायी तरफ सर को मुकम्मील घुमाने के बाद "अस्सलामु अलैकुम व-रहेमतुल्लह" कहे।

 

नोटः दुसरा सजदा करने के बाद फौरन ना उठे (जिस तरहा हनफी उठते है)। दुसरा सजदा करने के बाद दोनो मांडीयो पर बैठे बैठे (जैसा के पहेले तशहुद मे बताया गया है), फिर अपने दोनो हाथो को जमीन पर रखे, और हाथो पर जोर डालते हुए खडे हो जाए।।

नोट : पहेले तशहुद के बाद तिसरी रकात के लिए उठने पर -रफयुलदैन- करे। रफयुलदैन ताक रकातो में की जाती है।

                                

                           रफयुलदैन (तकबीर)

नोटः हर रकात में रुकु से पहेले और रुकु के बाद रफयुलदैन किया जाता है।

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