सदका.. सदका-ए-फितर.. जकात के मसाईल.. जकात निकालने का तरीका
सदका
अल्लाह तआला को खुश करने की नियत से गरीबो को या किसी अच्छे काम के लिए सदका दिया जाता है। सदका किसी भी मुसलमान पर फर्ज नही है लेकीन सदका देने को इस्लाम ने बहोत पसंद किया है। सदका माल को बढाता है। सदका किसी को भी, किसी भी वक्त और कितना भी दिया जा सकता है। अक्सर आई हुई मुसीबत या बिमारी को दुर करने की नियत से सदका दिया जाता है। बला सदके को फांद नही सकती इसलिए सदका करने में जल्दी किया करो (हदीस)।
सदका-ए-फितर / फितरा
इस्लाम ने सदका-ए-फितर या फितरा गरीबो के हक के तौर पर हम पर मुकर्रर किया गया है और रोजो मे जो कमी और कोताही रहे जाती है उस कमी को दुर कर देता है।
१। हम घर में जो भी आटा खाते है, २ किलो ५० ग्राम आटे की किंमत एक सदका-ए-फितर की मिकदार (quantity) है। ये एक शख्स के सदका-ए-फितर की मिकदार है।
२। सदका-ए-फितर हर वो शख्स दे सकता है जो देने की ताकत रखता हो, इस के लिए मालिके निसाब (साहिबे निसाब) होना जरूरी नही।
३। सदका-ए-फितर ईद से निकालने की कोशिश करे। नबी (ﷺ) ईद का चाँद देखने के बाद सदका-ए-फितर देते थे, इस से ये फायदा होता है के ईद के दिन कोई भुखा नही रहेगा और कोई भिक नही मांगेगा। उमर (रजि) ईद के दो दिन पहेले सदका-ए-फितर दिया करते थे।
४। सदका-ए-फितर ईद की नमाज के पहेले देना शर्त है। ईद के बाद सदका-ए-फितर देने पर फितरा देने का सवाब नही मिलेगा सिर्फ सदका देने का सवाब मिलेगा।
५। जो बच्चा अभी पेट में है और पैदा नही हुआ उस का भी सदका-ए-फितर देना होगा।
सदका-ए-फितर किसे दे सकते हैं?
१। फकीर को सदका-ए-फितर दे सकते हैं। (फकीर वो होता है जिस के पास कुछ हो मगर इतना ना हो के खुद सदका-ए-फितर देने के लायक हो। फकीर अगर आलीमे दिन है तो उसको जकात देना जाहील को देने से बहेतर है)।
२। मिस्कीन को सदका-ए-फितर दे सकते हैं। (मिस्कीन वो होता है जिस के पास कुछ ना हो, यहा तक के खाने और बदन छुपाने (कपडे) तक के लिए मोहताज हो।
३। जकात के जमा करने वालो को।
४। इस्लाम के लिए नरमगोशा रखने वाले गैर मुसलमानों को।
५। गारीम (यानी कर्जदार) को सदका-ए-फितर दे सकते हैं।
६। फि-सबी-लिल्लाह (यानी अल्लाह की राह मे खर्च करना)
o अगर कोई जिहाद के लिए जाना चाहता है लेकीन उस के पास सफर का खर्च नही, उसे सदका-ए-फितर दे सकते है।
o अगर कोई हज के लिए जाना चाहता है लेकीन उस के पास पैसा नही लेकीन उस के लिए मांगना जायûज नही है, तो उसे दे सकते है।
o तालीबे इल्म (student) को दिन की पढाई के लिए दे सकते है।
o एैसे ही हर नेक काम में पैसा खर्च करना ही फी सबी लिल्लाह है।
७। इब्नुस सबील (यानी मुसाफीर जिस के पास माल ना रहे सदका-ए-फितर ले सकता है)
८। करिबी रिश्तेदारे में देना अफजल है।
९। सय्यद को देना मना है।
जकात के मसाईल
१। जकात मालिके निसाब (साहिबे निसाब) पर फर्ज किया गया है। मालिकी निसाब बनने पर जकात देने मे देर ना लगाए। जकात चुकाने वाला गुनाहगार होंगा और अûजाब के मुस्तहिक होंगा।
२। नबी करीम (ﷺ) ने एक हदीस मे इरशाद फरमाया जिसे इमाम मुस्लीम (रहे।) ने मुस्लीम शरीफ मे नकल किया के "जो शख्स सोने और चांदी से अल्लाह तआला का हक अदा नही करता तो कयामत के दीन यही सोना और चांदी टुकडो की शकल मे लाया जाएगा और उसे जहान्नम की आग में गरम किया जाएगा, और फिर इन तुकडो से कयामत के दिन उस की पेशानी, उस की पीठ, और उस के सिने को दागा जाएगा। और ये अमल जहान्नम के अंदर नही बल्की तमाम लोगों के बिच होगा। यानी तमाम लोगो के बिच उस का तमाशा होगा। कयामत का १ दिन ५० हजार साल के बराबर होगा।
३। मालिके निसाब कोन होता है?
मालिके निसाब वो होता है जिस के पास ८५ ग्राम सोना हो और उस पर पुरा साल गुजरा हो, इस सोने पर 2.5% जकात निकालनी होगी।
या साडे बावन्न ५९५ ग्राम (५2.5) तोले चांदी हो और उस पर पुरा साल गुजरा हो, इस चांदी पर 2.5% जकात निकालनी होगी।
अगर दफनशुदा खजाने मिले तो उस में ५ वा हिस्सा जकात निकाला जाएगा।
या माले तिजारत (कारोबार का माल) हो जिसे बेचने की नियत से ही खरीदा था और वो माले तिजारत ८५ ग्राम सेने के बराबर है और उस पर पुरा साल गुजर चुका है तो उस में भी 2.5% जकात निकाली जाएगी।
अगर हमारे पास गल्ले होते है, वो गल्ले गेहु है, चावल है, दाल है, जौ है, खजुर है, अंगुर है, इस पर साल जरुरी नही है बल्की जिस वक्त ये तय्यार हो कर काटा जाए उस पर जका है। लेकीन हमारे पास ये ७५० किलो हो जाए तब जकात फर्ज होगी। अगर ७५० किलो या इस ज्यादा गल्ला बरीश के जरीए हासील हुआ तो हमे इस का १० वा हिस्सा निकालना है और अगर ७५० किलो या इस से ज्यादा गल्ला बारीश के जरीए हासील नही हुआ तो हमे इस का २० वा हिस्सा निकलना होगा। ७५० किलो का १० वा हिस्सा ७५ किलो है और ७५० किलो का २० वा हिस्सा ३७।५ किलो है।
जिस दिन हम मालिके निसाब बने उस दिन की उर्दु तारीख को याद रखें और अगले साल उसी तारीख को वो अब भी मालिके निसाब है तो उसे मालिके निसाब या साहिबे निसाब कहा जाएगा और उस पर जकात फर्ज हो जाएगी। उसको अपने माल की अडाई फिसद (2.5 %) जकात देनी होगी। इस १ साल के दौरान अगर माल बढता है या कम होता है तो कुछ फरक नही पडेगा, शर्त सिर्फ इतनी होती है के साल के शुरू में और आखीर में मालिके निसाब हो। मिसाल के तौर पे - अगर कोई शख्स मोहरम के महिने मे १०० ग्राम सोना खरीदे और उस सोने पर पुरा एक साल गुजर जाए तो इस को कहते है एक साल गुजरना। अब इस सोने पर जकात वाजीब हो गई। यानी वो शख्स अगले मोहरम में १०० ग्राम सोने के 2.5% बाजार के भाव के हिसाब से जकात निकालेगा। इस बात से ये मालुम हुआ के जिस चिûज पर एक साल पुरा हो तो उसी वक्त उस की जकात निकाली जाए। बगैर किसी शरई उज्र के रमजान के महिने का इंतेजार ना किया जाए। जितने महिने वो इंतेजार करेगा उतना ही वो गुनाहगार होगा।
जकात के फिकी उसुलः
१। अगर किसी वजह से उस की दौलत खत्म गई और बाद में फिर से वो साहिबे निसाब बन गया तब उस की साहिबे निसाब बन्ने की नयी तारीख याद रखे और वहा से उस का साल शुरू होगा।
२। एक या एक से ûज्यादा लोगो को जकात दी जा सकती है।
३। बीवी के पास ९ तोले सोना है और शोहर गरीब है। चुंकी बीवी सोने की मालीक है और बीवी के कब्जे में माल (सोना) है इसलिए शोहर पे जकात लाûजीम नही होगी बल्के बीवी पर जकात लाûजीम होगी। माल (सोना) बीवी के कब्जे में (मिल्क में) होना जरूरी है।
४। अगर बीवी मालीक है लेकीन उस के पास माल नही तो जब तक माल उस के कब्जे में नही इतने अर्से की जकात लाûजीम नही होगी। मिसाल के तौर पर - अगर सोना चोरी हो जाए तो एैसी सुरत मे बीवी मालीक तो है लेकीन सोना उस के कब्जे मे नही है और २ साल बाद सोना वापस मिल गया तो इन २ सालो की जकात लाûजीम नही होगी। सोना मिलने के बाद उस का साल शुरू होगा।
५। अगर किसी औरत पर जकात निकालना वाजीब हो जाए और उस के पास सोना तो है लेकीन जकात अदा करने के लिए रोख (वùŠश) पैसे नही है तब वो अपने शोहर या बेटे को कहेकर उस की तरफ से जकात देने के लिए कहे सकती है। अगर उन्होने देने से इन्कार किया तो "मै पैसे आने पर आप के पैसे वापस लौटा दुंगी" इस वादे पर शोहर या बेटे से कहेकर जकात दे सकती है। अगर एैसा भी ना कर पाए तब औरत को सोना बेचकर जकात अदा करना जरूरी है। वो ûजेवर जो औरत की मिलकीयत है उस की जकात हरगीज शोहर के जिम्मे नही। अगर शोहर औरत के ûजेवरो की जकात ना दे तो वो गुनाहगार नही होंगा।
६। अगर शोहर या घर के लोग सोना बेचना से मना कर दे या जकात देने से औरत को रोके, उस वक्त औरत दिल में इरादा (नियत) रखे की मैं बाद मे जकात अदा करूंगी। एैसी सुरत में जकात देने से रोकने वाले अल्लाह के गुनहगार होंगे।
७। अगर हमने किसी के पास अपनी अमानत रखवाई और भुल गए और २ साल बाद याद आया तब २ साल की जकात लाûजीम नही होगी।
८। अगर हमने किसी के पास अमानत रखवाई या कûर्जा दिया और उसने हमारी अमानत या कûर्जा वापस देने से इन्कार कर दिया तब हम पर जकात लाûजीम नही होगी।
९। अगर हमने किसी के पास अमानत रखवाई या कûर्जा दिया और उस ने हमारी अमानत या कर्जा देने से इन्कार नही किया और ३/४ साल तक अमानत उसी के पास है तब इन ३/४ साल तक उस माल की जकात बनती रहेगी और जब माल हमारे कब्जे मे आ जाएगा तो उस माल के जकात की अदाईगी लाûजीम होगी।
१०। अगर आपके पास साडे सात तोले सोना नही है। तो इस का मतलब ये नही है के आप पर जकात नही बनेगी। इस सुरत मे सोने के साथ कोई दुसरी चिûज (चांदी, रुपया या माले तिजारत) जोड दी जाएगी और देखा जाएगा के आप निसाब की मिकदार तक पहोंचते है या नही (यानी सब मिलाकर आप ५2.5 तोले चांदी खरीदने की हैसियत होती है या नही)। अगर मालिके निसाब की मिकदार तक पहोंच गए तो आप का साल शुरू हो जाएगा और साल खत्म होने के बाद पुरे माल का जितना वùŠश बनेगा उस का 2.5% हिस्सा जकात देना होगा। ११। सोना और चांदी की मैजुदा किंमत पर जकात निकाली जाए।
१२। जकात अदा करते वक्त दिल मे जकात की नियत होना जरूरी है या फिर जकात का पैसा अलग करते वक्त जकात की नियत होना जरुरी है। दोनो मे से एक वक्त नियत करना जरूरी है।
१३। घर में जो भी मालिक निसाब बनता है उस पर साल गुजरने के बाद जकात लाûजीम होती है।
१४। साल भर खैरात करता रहा और बाद मे नियत की के जो दिया वो जकात है तो इस तरहा जका अदा नाही हुई।
जकात निकालने का तरीका
फर्ज किजीए एक तोला चांदी की किंमत ३५०/- रु। है। और एक तोला सोने की किंमत ३०,०००/- रुपये है। फर्ज किजीए आपके पास २ तोले सोना है, ५ तोले चांदी है और ५,०००/- रुपये नकद (cash) है। २ तोले सोना की किंमत = २ x ३०००० = ६०,०००/- रुपये
५ तोले चांदी की किंमत = ५ x ३५० = १७५०/- रुपये
नकद (cash) रुपये = ५०००/- रुपये
कुल (एकूण) = ६००००+१७५०+५००० = ६६७५०/- रुपये
इस तरहा से आपके पास कुल ६६,७५०/- रुपये है। चुंके साहिबे निसाब होने की शर्त ये है के, आप के पास इतनी रकम हो जिस से आप ५२.५ (साडे बावन) तोले चांदी खरीद सके, लेहाजा इस रकम से आप ५२.५ तोले चांदी खरीद सकते है । साहिबे निसाब होने के बाद आप का साल शुरू हो जाएगा । अगले साल इसी दिन अगर आप अब भी साहिबे निसाब है तो आप को उपर दिए हुए तरीके से फिर से कुल रकम निकालनी होगी और कुल रकम जो भी आएगी उस में से २.५% (अडाई टक्के) रकम अलग कर के जकात देनी होगी। मिसाल के तौर पर अगर कुल रकम ७०,०००/- आई तो २.५x७०००० = १७५० तो आपकी जकात की रकम १७५०/- रुपये होगी। १००
(नोटः इंटरनेट पर जकात वùŠलक्युलेटर होते है, इस का भी इस्तेमाल जकात मालुम करने के लिए किया जा सकता है)
जकात किसे दी जाए?
जिन जगहो पर सदका-ए-फितर दे सकते है उन जगहो पर जकात दे सकते है और जिन जगहो पर सदका-ए-फितर नही दे सकते उन जगहो पर जकात नही दे सकते।
(Note : ज्यादा मालुमात के लिए सदका-ए-फितर का टापीक पढे)
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