क्या नबी (ﷺ) मुख्तारे कुल है?

 

क्या नबी () मुख्तारे कुल है?

मुख्तारे कुल का मतलब होता है हर चिज पे इख्तीयार। बरेल्वी जमाअत का ये अकिदा है के, नबी ()  को कायनात की हर चिûज पर इख्तीयार आहे और नबी जो चाहे वो कर सकते है। रिûज्क देना, मदत करना, मुसीबत का दुर करना, जमीन की हिफाजत रखना, लोगो को मौत और जिंदगी देना, औलाद देना वगैरा। बरेलवी हजरात यहा पर ही नही रुके वो एक कदम और आगे बढ गए, बरेलवी हजरत पीर औलियो को भी मुख्तारे कुल मानते है।

 

बरेलवी अकिदा गलत है

हमारे नबी कयामत के दिन उम्मत की सिफारीश फरमाएेcगे, अगर आप () मुख्तारे कुल होते तो सिफारीश क्यु करते, डायरेक्ट हमें जन्नत में डाल देते। इसी तरहा से नबी () को दुनिया में बहोत सी मुसीबतो का सामना करना पडा और बहोत परेशानी उठानी पडी, अगर नबी () मुख्तारे कुल होते या आप को इल्मे गैब होता तो आप को कोई भी परेशानी नही उठानी पडती। नबी () भी दुआ करते थे, अगर आप () मुख्तारे कुल होते तो दुआ क्युं करते?

           

आईये हम कुरआन और हदीस की रौशनी में देखते है

१।    एक हदीस है के सुरे अल-इमरान (३), आयत - १२८, १२९

जंगे ओहद में जब आप ()  के दंदाने मुबारक शहीद हुए और आप जखमी हुए तो आप () ने फरमाया के, --ये गिरोह कैसे फलाह पाएगा जिस ने अपने पैगंबर से ये सुलुक किया जब के वो इन्हे खुदा की तरफ से दावत देता है--। इस बात पर अल्लाह तआला की तरफ से सुरे इमरान (३), आयत नं.१२८ नाजील हुई और अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया के --किसी किस्म का इख्तीयार तुम्हे नही है मगर ये के खुदा चाहे के इन्हे माफ करे दे या सûजा दे क्युंके वो ûजालीम है--।

२।    सुरे अल-एैराफ (७), आयत - १८७ से १८८ तक

तुम से कयामत को पुछते है के वो कब को ठहरी है, तुम फरमाओ के इस का इल्म तो मेरे रब के पास है, इसे वही इस के वक्त पर जाहीर करेगा, भारी पड रही है आस्मानो और जमीन में तुम पर ना आएगी मगर अचानक तुम से एैसा पुछते है गोया तुम ने इसे खुब तहकीक कर रखा है, तुम फरमाओ इस का इल्म तो अल्लाह ही के पास है लेकीन बहोत लोग जानते नही। तुम फरमाओ मैं अपनी जान के भले बुरे का खुद मुख्तार नही मगर जो अल्लाह चाहे और अगर मैं गैब जान लिया करता तो यु होता के मै ने बहोत भलाई जमा कर ली और मुझे कोई बुराई ना पहोंची, मैं तो यही डर और खुशी सुनाने वाला हुँ इन्हे जो इमान रखते है।

३।    सुरे तौबा (९), आयत - ८०, ८४, ११३

तुम इन की माफी चाहो या ना चाहो, अगर तुम ७० बार इन की माफी चाहोगे तो अल्लाह हरगीज इन्हे नही बख्शेगा, ये इसलिए के वो अल्लाह और इस के रसुल से मुन्कर हुए और अल्लाह फासीको को राह नही देता।

और इन में से किसी की मय्यत पर कभी नमाज ना पढना और ना इस की कबर पर खडे होना, बेशक वो अल्लाह और व रसुल से मुन्कर हुए और फिस्क ही में मर गए।

नबी और इमान वालो को लायक नही के मुशरीको की बख्शीश चाहे अगरचा वो रिश्तेदार हो जब के इन्हे खुल चुका के वो दोûजखी है।

४।    सुरे युनुस (१०), आयत - १५, १६

और जब इन पर हमारी रौशन आयते पढी जाती है वो कहने लगते है जिन्हे हम से मिलने की उमीद नही के इस के सिवा और कुरआन ले आईये या इसी को बदल दिजीए। तुम फरमाओ मुझे नही पहोंचता के मैं इसे पनी तरफ से बदल दुँ, मैं तो इसी का ताबे हुँ जे मेरी तरफ वही होती है, मैं अगर अपने रब की नाफरमानी करू तो मुझे बडे दिन के अûजाब का डर है।

तुम फरमाओ अगर अल्लाह चाहता तो मैं इसे तुम पर ना पढता वो तुम को इस से खबरदार करता तो मैं इस से पहेले तुम में अपनी एक उम्र गुûजार चुका हुँ तो क्या तुम्हे अकल नही।

५।    सुरे अल-कसस (२८), आयत - ५६

बेशक ये नही के तुम जिसे अपनी तरफ से चाहो हिदायत कर दो हा अल्लाह हिदायत फरमाता है जिसे चाहे और वो खुब जानता है हिदायत वालो को।

६।    सुरे अल-मुनाफिकुन (६३), आयत - ६

इन पर एक सा है तुम इन की माफी चाहो या ना चाहो अल्लाह इन्हे हरगीज ना बख्शेगा बेशक अल्लाह फासीको को राह नही देता।

७।    सुरे अल-जीन (७२), आयत - २१

तुम फरमाओ मै तुम्हारे किसी बुरे भले का मालीक नही।

८।    सुरे अनाम (६) की आयत नं.१७

और अगर तुझे अल्लाह बुराई पहोंचाए तो इस के सिवा इस का कोई दुर करने वाला नही और अगर तुझे भलाई पहोंचाए तो वो सब कुछ कर सकता है।

९।    सुरे अन्फाल (८), आयत - ६३

और उल्फत डाल दी उन के दिलो में, अगर तुम सब कुछ खर्च कर देते जो जमीन में है उन के दिलों में उल्फत न डाल सकते थे। लेकीन अल्लाह ने उन के दरमियान उल्फत डाल दी, बेशक वो गालीब हिकमत वाला है।

१०।   सुरे जुमर (३९), आयत - ६५

और यकीनन आप () की तरफ और आप () से पहेले की तरफ वही भेजी गई है, अगर तुम ने शिर्क किया तो तुम्हारे आमाल बिल्कुल अकारत जाएंगे और तुम जरूर खसारा पाने वालो में से होंगे।

११।   सुरे राअद (१३), आयत - ३८

और बेशक हम ने तुम से पहेले रसुल भेजे और इन के लिए बिवीयाँ और बच्चे किए और किसी रसुल का काम नही के कोई निशानी (आयत) ले आए मगर अल्लाह के हुकम से, हर वादे के लिए एक तहरीर है।

१२।   सुरे युसुफ (१२), आयत - १०७

आप () कह दे, एै लोगो ! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से हक पहोंच चुका, तो जिस ने हिदायत पाई सिर्फ अपनी जान के लिए हिदायत पाई, और जो गुमराह हुआ तो सिर्फ अपने बुरे को गुमराह हुआ, और मैं तुम पर मुख्तार नही हुँ।

१३।   कुरआने करीम सुरे अल-कसस (२८), आयत नं.५६

एै नबी आप हिदायत नही दे सकते जिसे आप पसंद करो बल्की ये अल्लाह ही है जिसे चाहे हिदायत दे। पता चला के अल्लाह तआला ने नबी () को हिदायत के लिए भेजा है लेकीन आप का किसी के दिल पर इख्तीयार नही।

१४।   सुरे अनाम (६) की आयत नं.८३ से ८६ में १८ अंबिया (नबी) का जिकर कर रहा है।

अल्लाह इरशाद फरमा रहा है के अगर ये १८ में से कोई नबी भी शिर्क कर लेता तो हम इन के सारे आमाल बरबाद कर देते। इसी तरहा से सुरे जुमर (३९) की आयत नं.६५ में अल्लाह तआला नबी-ए-करीम () को इरशाद फरमाता है के, "एै नबी हम ने आप की तरफ वही की और आप से पहेले भी वही करते रहे, एै नबी अगर तुम ने भी शिर्क किया तो तुम्हारे सारे आमाल बरबाद कर दुंगा और तुम खसारा उठाने वालो में से हो जाओगे"।

१५।    शहेद का वाकीया जिस में रसुलुल्लाह () की दो बिवीयो ने मंसुबा-बंदी की और उस के नतीजे में रसुलुल्लाह () ने अपने उपर शहेद हराम फरमा लिया, फिर अल्लाह तआला ने आयत नाजील की, (सुरे तेहरीम (६६), आयत :१-४)

एै नबी () अल्लाह ने जो तुम्हारे लिए हलाल किया है तुम उसे क्यु हराम ठहराते हो? अपनी बिवीयों की खुशनुदी चाहते हुए, और अल्लाह बख्शने वाला महेरबान है।

(सहीह बुखारी, किताबुल तफसीर, हदीस-४९१२, ५२६७, ५२६८, Bukhari Volume , Book ६०, Number ४३४)

१६।   नबी-ए-करीम () ने फरमाया, एै अब्द मुनाफ के बेटो ! अपनी जानो को अल्लाह से खरीद लो (यानी नेक काम कर के इन्हे अल्लाह के अûजाब से बचा लो), एै अब्दुल मुतालीब के बेटो! अपनी जानो को अल्लाह तआला से खरीद लो, एै जुबेर-बीन-अवाम की वालिदा! रसुलुल्लाह () की फुफी, एै फातिमा बिनते मुहंम्मद! तुम दोनो अपनी जानो को अल्लाह से बचा लो। मैं तुम्हारे लिए अल्लाह की बारगाह मे कुछ इख्तीयार नही रखता। तुम दोनो मेरे माल में जितना चाहो मांग सकती हो। (सहीह बुखारी - ३५२७, बुक-६१, हदीस-३७)

इन आयतो से पता चला के सिर्फ अल्लाह तआला ही मुख्तारे कुल है।

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