रसुलुल्लाह (ﷺ) हाजीर व नाजीर है या नही?

 

रसुलुल्लाह () हाजीर व नाजीर है या नही?


हाजीर व नाजीर का मतलब ये है के हुजुर (ﷺ) अपने कब्र मुबारक से सब देख रहे है और जहा चाहे वहा हाजीर हो सकते है

१।    चारो उलेमा (हनफी, शाफई, मालीकी और हंबली) से भी ये हाजीर व नाजीर का अकिदा साबीत नही है।

२।    हदीस शरीफ हैः "(कयामत के दिन) फिर मेरे पैरोकारो को दाए (जन्नत की) तरफ ले जाया जाएगा, लेकीन बाûज को बाए (यानी जहान्नम की) तरफ घसीटा जाएगा। मै कहुंगा -एै मेरे रब! मेरे उम्मती!-, लेकीन मुझे (अल्लाह तआला की तरफ से) बताया जाएगा के -(एै नबी) आप नही जानते उन्हो ने आप के बाद क्या किया, जब आप इनसे जुदा हुए तो ये इस्लाम से फिर गए थे-। मैं उस वक्त वही कहुंगा जो (अल्लाह के) नेक बंदे ईसा-इब्ने-मरीयम ने कहा था के -मैं इन पर गवाह रहा जब तक इन में मौजुद रहा। फिर जब तु ने मुझको उठा लिया तो तु ही इन पर निगरान रहा। और तु हर चिज से खबरदार है"। [Sahih al-Bukhari ३४४७]

इस हदीस से साबीत होता है के अंबिया इकराम फौत होने पर इस दुनिया से बेखबर होते है।

३।    हदीस शरीफ हैः रसुलुल्लाह () हौजे कौसर से अपने उम्मतीयो को पानी पिला रहे होंगे और उन्हे रोक दिया जाएगा, इन को भी नबी () यही समझेंगे के ये तो मेरे फरमाबरदार उम्मती है लेकीन आप () को मुतला किया जाएगा (बताया जाएगा) के -एै नबी () आप नही जानते के इन्हो ने आप के जाने के बाद क्या कुछ किया, इन्हो ने आप के बाद दिन मे नयी-नयी चिजे निकाल ली थी-, तो आप () फरमाएंगे "इन के लिए (रहेमत से) दुरी हो! इन के लिए (रहेमत से) दुरी हो! जिन्हो ने मेरे बाद दिन को बदल डाला" [Sahih Bukhari ६५८४]

इस हदीस से मालुम हुआ के नबी-ए-करीम () भी नही जानते के उन के उम्मती ने उन के इंतेकाल के बाद दिन मे क्या-क्या बिदअते इजाद की।   

४।    "बेशक अल्लाह जिसे चाहता है सुना देता है, और तुम (नबी) उन लोगो को नही सुना सकते जो कबरो में है" [surah Al-Faatir (३५), Ayat-२२]

पता चला के वफात के बाद कबर वाले बे-खबर होते है।

५।    "ये गैब की खबरे है जो हम तुम पर वही करते हैं, हालाके तुम उस वक्त उन के पास मौजुद ना थे जब वो अपने कलम डाल रहे थे के मरीयम (अलैहिस्सलाम) की किफालत कौन करेगा, और ना तुम उस वक्त इन के पास थे जब वो झगड रहे थे" [surah Imran (३), Ayat-४४]

६।    हजरत जुनदुब-बिन-अब्दुल्लाह (रिûज) से रिवायत है के मैने रसुलुल्लाह () को इन के वफात से पाच रोज पहेले ये फरमाते हुए सुना के "तुम से पहेले लोग अंबिया और नेक लोगो की कबरो को इबादतगाह बना लिया करते थे। खबरदार! तुम कबरो को इबादतगाह ना बना लेना, मैं तुम्हे इस तरजे अमल से मना करता हुँ। [sahih Muslim, ५३२]

७।    "और ये इबादत करते है अल्लाह के सिवा उन की जो ना नुकसान पहोचा सकते है उन्हे और ना नफा दे सकते है और कहते है के ये (जिन को पुजते है हम) हमारी सिफारीश करने वाले है। अल्लाह के हुजुर कह दो! क्या खबर देते हो तुम अल्लाह को एैसी बात की जो नही जानता वो आस्मानो में ना जमीन मे। पाक है उस की जात और बुलंद है वो इस शिर्क से जो ये करते है।" (Surah Yunus (१०), ayat-१८)

८।    "जान लो अल्लाह ही का हक है खालीस इबादत व इताअत और वो लोग जिन्हो ने बना रखे है उस के सिवा दुसरे सरपरस्त (और कहते है) के नही इबादत करते हम इन की मगर इस गûर्ज से के पहोचा दे वो हमे करीब अल्लाह के किसी दर्जे में बेशक अल्लाह फैसला करेगा इन के दरमियान इन सब बातो का जिन मे वो इख्तीलाफ कर रहे है। बिला-शुबा अल्लाह नही राह दिखाता एैसे शख्स को जो हो झुठा और मुंकीरे हक" (Surah Zumar (३९), ayat-३)

इस आयत से मालुम हुआ के पिछली उम्मत कबरो को सजदागाह बना लेती थी, यानी उन्हे हाजत रवाई और मुश्कील कुशाई के लिए पुकारते और उन्हे अल्लाह तक पहोचाने का वसीला बनाते थे। इस पर अल्लाह ने फरमाया _"मसीह इब्ने मरीयम (अलैहिस्सलाम) सिवाय (अल्लाह के) रसुल होने के और कुछ भी नही, इन से पहेले भी बहोत से रसुल आ चुके है और इन की वालीदा (मां) एक रास्त बाज (सच्ची) औरत थी। और वो दोनो खाना खाते थे, आप देखे किस तरहा हम ने इन के सामने दलाईल रखे है, फिर गौर किजीए किस तरहा वो उलटे फिराए जाते है। आप कह दिजीए -क्या तुम अल्लाह के सिवा उन की इबादत करते हो जो ना तुम्हारे किसी नुकसान के मालकी है और ना किसी नफा के, (बल्की) अल्लाह ही खुब सुन्ने और जानने वाला है (surah Al-Maidah (५), Ayat:७५-७६)_

खुलासा ये हुआ के चाहे वो हजरत मरीयम (अलैहिस्सलाम) हो या कोई रसुल हो, वो ना तो हमें नफा पहोचा सकता है और ना नुकसान (अगर हम उसे पुकारे), क्युंकी वो पुकारने वालो की पुकार से बेखबर है, और सिर्फ अल्लाह ही सब कुछ सुन्ने और जान्ने वाला है।

९।    "और उस से बढकर कौन गुमराह हो सकता है जो अल्लाह के सिवा किसी दुसरे को पुकारे, जो कयामत तक उस की पुकार का जवाब ना दे सके, बल्की उस के पुकारने से भी गाफील हो। फिर जब लोग रोजे आखेरत इखट्टे किये जाएंगे तो वही पुकारेंगे लोग इन पुकारने वालो के दुश्मन बन जाएंगे, और इन की परस्तीश से साफ इन्कार कर देंगे" [Surah Al-Ahqaf (४६), Ayat ५-६]

१०।   "अपने घरो को कबरे ना बनाओ (इन मे नवाफील पढा करो) और मेरी कबर को जश्न्-इज्तेमा (बार बार आने की जगह) ना बनाओ और मुझ पर दुरूद पढा करो, क्युंकी तुम्हारा दुरूद मुझ पर पहोचा दिया जाता है जहा कही भी तुम हो" [Sunan Abu dawud, Book #१०, Hadith #२०३७]

मालुम हुआ के नबी-ए-करीम () के पास दुरुद व सलाम फरीश्तो के जरीए पहोचाया जाता है। अगर आप हाजीर व नाजीर होते तो फरीश्तो के जरीए दुरूद व सलाम पहोचाने की कोई जरूरत नही होती।

११।   "भला कौन है जो मजबुर की पुकार को कुबुल करता है जब वो उसे पुकारता है, और तकलीफ को दुर करता है? (इलावा अल्लाह के) और तुम को जमीन पर खलीफा बनाता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और माबुद भी है? (हरगीज नही) बल्की तुम बहोत कम ही सोचते समझते हो"। [Surah An-Naml (२७),  Ayat-६२]

मालुम हुआ के तुम ये क्यु नही समझते के सिर्फ अल्लाह ही पुकार सुनता है और तकलीफ दुर करता है और अल्लाह की सिफात मे कोई शरीक नही है।

१२।   "उस जैसी कोई चिज नही, और वो सब कुछ सुन्ने और देखने वाला है" [surah Shuraa (४२), ayat ११]

१३।   "औैर ना पुकारो तुम अल्लाह के सिवा किसी को जो तुम को नफा दे सके और ना नुकसान पहोंचा सके, अगर एैसा करोगे तो जालीमो में से हो जाओगे (गुनाह करोगे)"। [surah Younus (१०), Ayat-१०६]

१४।   एै सुन्ने वाले क्या तुने ना देखा के अल्लाह जानता है जो कुछ आस्मानो में है और जो कुछ जमीन में जहा कही तीन शख्सो की सरगोशी (बातचीत) हो तो चौथा वो (अल्लाह) मौजुद है और पांच की तो छटा वो (अल्लाह) और ना इस से कम और ना इस से ज्यादा मगर ये के वो इन के साथ है जहा कही हो फिर फिर इन्हे कयामत के दिन बता देगा जो कुछ इन्हो ने किया बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है। (सुरे मुजादिला (५८), आयत-७)

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