आईम्मा-अरबा (फुकहा)... फिक... तकलीद... मुकल्लीद... जन्नत में जाने के चार रास्ते

 

आईम्मा-अरबा (फुकहा) कौन है?

चार बडे फुकहा/इमाम (fuqaha) हो गुजरे हैं। 

१।    इमाम अबु हनीफा (हनफी) (८० H - १५० H)

२।    इमाम शाफी (शाफई) (१५० H - २०४ H)

३।    इमाम अहमद इब्ने हंबल (हंबली) (१६४ H - २४१ H)

४।    इमाम मलीक (मलीकी) (९३ H - १७९ H)

 (H = हिजरी calendar)

इन चार इमामो को आईम्मा अरबा या फुकहा कहा जाता है। ताबयीन और तबे-ताबयीन के जमाने मे आईम्मा अरबा की मौजुदगी थी।

इन्हे फुकहा क्यु कहा जाता है

इन्हे फुकहा इसलिए कहा जाता है क्यु के इन्हो ने फिक की किताबे लिखी।

 

फिक की किताबे क्या होती है

जहा कुरआन और हदीस से किसी मसले पर हल ना मिले वहा लोगो के तरीके को देखा जाता है (जिसे इजमा कहते है) और इस से भी हल ना मिले तो अपनी राय अपनी सोच से मसले का हल निकाला जाता है (इसे इजतेहाद कहते है)।  इन चार फुकहा ने भी इजतेहाद किया। इन्हो ने अपनी राय, अपनी सोच (अपने फतवे) से की किताबे लिखी। इन किताबो की फिक की किताबे कहते है और इन चार इमामो को फुकहा कहते है।

 

तकलीद किसे कहते है

बगैर कुरआन और हदीस की दलील के फुकहा की बात को (राय को, फतवे को) मान लेना तकलीद कहलाता है। तकलीद के माने होते है गले में पट्टा डालना।

 

मुकल्लीद किसे कहते है

जो लोग इमामो की तकलीद करते है उन्हे मुकल्लीद कहा जाता है।

 

तकलीद शिर्क कब बन जाता है

कुरआन या हदीस में अगर किसी मसले का हल मौजुद हो फिर भी फुकहा की बात को मान्ना शिर्क है। फिक अगर कुरआन और हदीस से टकराए तो ना ली जाए।

 

तकलीद के बारे मे फुकहा ने क्या कहा

इन चारो इमामो ने खुद कहा है के अगर हमारी कोई बात कुरआन और हदीस से टकराए तो छोड दी जाए। और अगर सहीह हदीस आप को मिले तो हमारी बातो (राय, फतवो) को दिवार पर फेक कर मारो।

 

कुरआन और हदीस में सब मसले मिलने के बावजुद भी लोग फिर भी तकलीद क्यु करते है

पहेली वजह ये है के, लोगो ने उसुल बना दिया है के हमे किसी एक इमाम की तकलीद करना फर्ज है। जब के अल्लाह तआला ने बार बार फरमाया है के अल्लाह की और अल्लाह के रसुल की बात मानो।

दुसरी वजह ये है के, फिकाह हनफी के उसुल की किताब (उसुल अल-करखी) में लिखा है के --हर वो आयत जो हमारे असहाब के कौल के मुखालीफ आ जाए तो इस को मंसुख (reject) कीया जाएगा या फीर इस को मरजुह समझा जाएगा (यानी कुरआन और हदीस को छोड कर अपने उलमा के कौल को मानेंगे)--

ये उसुल इमाम (फुकहा) ने नही बनाए बल्के लोगो ने बनाए है। फुकहा का तो कहना था के अगर आप के सहीह हदीस मिल जाए तो हमारी बात को दिवार पर फेक कर मारो।

यही वजह है के ये अकल के अंधे लोग कुरआन और हदीस पर इमाम के फतवो को तरजीह देते है।

 

आज कौन से फिरके मुकल्लीद है

बरेलवी (सुन्नी) और देवबंदी (तबलीगी) तकलीद करते है। उन्हो ने नबी () के होते हुए उम्मती को (आईम्मा अरबा को) अपना इमाम बना लिया है।

 

अंधी तकलीद क्या है

कुरआन और हदीस मे मसले का हल मौजुद होने के बावजुद भी कोई इंसान कुरआन और हदीस की बात को रद कर के फीका की ही बात को ही मानता है तो वो शख्स अंधी तकलीद कर रहा है। अंधी तकलीद करने का मतलब दुसरे को रब बनाना है, इसलिए उलेमाओ के नजदीक अंधी तकलीद करना भी शीर्क है।

 

फुकहाओ के कौल/फतवो में टकराव की वजह क्या है?

ये चारो भी फुकहा सहीह हदीस की कीताबे (books) आने से पहले मौजुद थे। इन फुकहाओ के जमाने में लाखो हदीसे मौजुद थी लेकीन मिलावट वाली थी। जिस हदीस में मिलावट हो वो कुरआन और सहीह हदीस से टकराती है। फुकहा की आदत थी के जब कुरआन और हदीस से मसला समझ में ना आए तो अपनी सोच से मसले का हल निकाले। इन फुकहानो इन हदीसो से और कुरआन से नतीजा निकालना शुरू किया जिसे हम इमामो के कौल (फतवे) कहते है। इन्होने अपनी-अपनी इल्मी सोच से दीन के उसुल बनाए। पहले जो फुकहा आए (अबु हनिफा) इन के पास मिलावट वाली हदीसे ज्यादा थी। बाद में जो फुकहा आए उन के पास सहीह हदीसे भी आई। जैसे जैसे सहीह हदीस मलिती गई फुकहा के फतवे एक-दुसरे से टकराते गए। यही वजह है के चारो फुकहा के कौल (फतवे) एक दुसरे से कुछ मामलो में एक जैसे है और कुछ मामलो में बहोत अलग है।


 

कैसे पता चला के फुकहा के फतवे कुरआन और हदीस से टकराते है

वैसे फुकहा के दौर में मिलावट वाली हदीसो की तादाद लाखो में थी। आज जो मिलावट वाली हदीस या जईफ हदीस साबीत हो चुकी है वो हो सकता है उन के नजदीक सहीह हो। इन्ही हदीसो के बेस पर फुकहा ने फतवे दिए।

इमाम बुखारी के दौर से मलिावट (milawat) वाली तमाम हदीसे अलग की गई और सहीह हदीस का दौर शुरू हुआ। आज हर मसले पर हुजुर की सहीह हदीस मिल जाने के बाद पता चला के इन फुककहाओ के बहोत सारे कौल (फतवे) कुरआन और हदीस से टकराते है, क्युं के वो फतवे जईफ और मिलावट वाली हदीसो की बुनियाद पर थे।

 

चारो फुकहा की बाते भी आपस में क्यु टकराती है

इन चार फुकहा के फतवे आपस में भी टकराते है। इस की वजह ये है के जैसे जैसे फुकहा का दौर आगे बढता गया, सहीह हदीसे मिलती गई। इसलिए बाद में आने वाले फुकहा ने उन के पास मौजुद सहीह हदीसो को नजर में रखते हुए फतवे दिये। यही वजह रही के इन फुकहा में इख्तेलाफ आते गया।

 

इमाम अबु हनिफा के दो शागिर्द/student ने अपने उस्ताद अबु इख्तेलाफ क्यु से हनिफाकिया

इमाम अबु हनिफा के को दो शागिर्द (student) १) इमाम अबु युसुफ और २) इमाम मोहंमद ने २/३ मसले में (याही ६६% मसलो में) अपने उस्ताद इमाम अबु हनिफा से इख्तेलाफ किया है।

इन को इमाम अबु हनिफा के कुछ बाते एैसी दिखाई दी जो कुरआन और सुन्नत से टकराती है, उन बातो में उन्हो ने इमाम अबु हनिफा के कौल को छोडा और दलील को लिया।

इमाम मोहंमद ने अपनी किताब -मोअत्ता- में पहले ही मसले में नमाज के औकात मसले पर अपने उस्ताद के इख्तेलाफ किया है।

 

किस फुकहा के फतवे कुरआन और हदीस से ज्यादा करीब है

इमाम अबु हनिफा पहेले फुकहा थे इसलिए इन के फतवे बाकी फुकहा से ज्यादा अलग है क्युं के उन के दौर में लाखो की तादाद में मिलावट वाली हदीसे मौजुद थी। इसी तरहा से आखरी फुकहा इमाम हंबल को ज्यादा तादाद में सहीह हदीसे मिली, इसलिए इमाम हंबल के फतवे कुरआन और सुन्नत के बहोत करीब माने जाते है।


 

क्या हदीस की किताब लिखने वाले इमाम भी मुकल्लीद थे

उल्माए हदीस इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम जैसे कई बडे मोहदसीन मुकल्लीद नही थे बल्के वो मुत्तबे थे। मुत्तबे का मतलब होता है रसुल की बात मानने वाले (कुरआन और हदीस पर चलने वाला)। जो हजरात तकलीद नही करते उन्हे गैरमुकल्लीद कह दिया जाता है। लेकीन जो रसुल के अलावा किसी दुसरे की बात नही मानता वो मुत्तबे होता है ना के गैर-मुकल्लीद।

 

 

तकलीद करना गुमराही है

सुरे बकराह (२), अयात नं.१११ मे अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है के, --और एहले किताब बोले हरगीज जन्नत में ना जाएगा मगर वो जो यहुदी या नसरानी हो, ये इन का खयाल बंदीया है, तुम फरमाओ लाओ अपनी दलील अगर सच्चे हो--

इस आयते करीमा मे अल्लाह तआला फरमाता है के, यहुदी और नसरानी का ये दावा है के वो ही जन्नत में जाएंगे ये खयाल बंदीया (बकवास) है।

आगे अल्लाह तआला आप () से इरशाद फरमाता है के उन से पुछो के अगर तुम (यहुदी/नसारा) सच्चे हो तो कोई दलील ले कर आओ यानी साबीत करो के तुम ही जन्नत में जाओगे। (Surah Baqarah Aayat १११)

जिस तरहा यहुदी और नसरानी बगैर दलील के जन्नत मे जाने का दावा करते है उसी तरहा तकलीद करने वाले लोग भी बगैर दलील के जन्नत में जाने का दावा करते है और उन का ये दावा बेबुनियाद है।

 

आज तकलीद की जरूरत क्यु नही है?

आईम्मा-अरबा के जमाने से तकलीद का रिवाज शुरू हुआ। ये जमाना ताबयीन और तबे-ताबयीन का था। उस वक्त हदीसो मे मिलावटे आम थी। सहीह हदीसो को अलग नही किया गया था। लोग नही जानते थे के जो हदीस उन के पास है वो हुजुर से साबीत है या नही और उस वक्त इमामो के फतवो पर आँख बंद कर के भरोसा कर लिया जाता था। इसी को तकलीद कहते है।

लेकीन आईम्मा-अरबा के दौर के बाद हदीस जमा करने वाले बडे बडे इमामो का दौर शुरू हुआ। जिन्हो ने हदीसे जमा करने के साथ साथ हदीसो से झुठ को भी अलग किया। इमाम बुखारी की सहीह बुखारी इस की मिसाल है।

सहीह हदीस आने के बाद पता चलता है के आईम्मा-अरबा के कई फतवे कुरआन हदीस से टकराते है। आज हमारे पास सहीह हदीसे मौजुद है इसलिए हमे अब तकलीद की कोई जरूरत नही।

नोटः अगर तकलीद जरुरी होती तो इमाम बुखारी, इमाम मुस्लीम और बडे बडे हदीस लिखने वाले इमाम भी तकलीद करते, हदीसे जमा ना करते। हदीस की बजाए वो भी आईम्मा-अरबा के फतवो को अपनी किताब मे नकल करते नजर आते। आज सहीह बुखारी को कुरआन के बाद का दर्जा दिया जाता है और हर फिरका इसको इसी दर्जे पर मानता है। 

 

तकलीद कब जायज है?

इमाम की बात को बगैर दलिल के मान लेना तकलीद कहलाता है। हनफी फिका के मानने वाले को एहनाफ कहते है।

1) जिन मसलो पर कुरआन और हदीस में साफ तौर पर हुकुम है उन मसलो में फिक की बात मान्ना शिर्क है।

2) अगर फिक की बात कुरआन और हदीस से नही टकराती तो फिक की बात मान सकते है यानी तकलीद कर सकते है। 

हम किसी भी बुजुर्ग को रसुलुल्लाह के दर्जे पर नही ले जा सकते। चारो में से किसी इमाम ने नही कहा के हमारी तकलीद करो। हुजुर () नमाज में रफयुलदैन करते थे। और चारो में से इमाम अबु हनिफा (रहे) को छोड कर तिनो इमाम (शाफई, हंबली, मलीकी) रफयुलदैन करथे थे। इसलिए ये कहना दुरूस्त नही है के मै रफयुलदैन इसलिए करता हुँ क्युंके इमाम शाफईA रफयुलदैन करते थे। कयामत वाले दिन हमे ये नही पुछा जाने वाला के आप कौन से इमाम के पिछे चले थे, हमे सिर्फ रसुलुल्लाह ()  की इताअत (पैरवी) के बारे में पुछा जाएगा।  

हदीस - और जिस ने रसुलुल्लाह () की बात मानी उस ने अल्लाह की बात मानी, और जिसने रसुलुल्लाह () की नाफरमानी की उसने अल्लाह की नाफरमानी की। मुहंम्मद () लोगो मे हक और बातील के दरम्यान फर्क है (सहीह बुखारीः हदीस-७२८१)

 

 

जन्नत चाहते हो तो तकलीद छोडो हुजुर का रास्ता अपना लो

तकलिद करने वाले हजरात का ये मान्ना है के चारो मसलक जन्नत में जाने के चार दरवाजे है और इन की पैरवी करने वाले जन्नत में किसी भी दरवाजे से जा सकते है (यानी किसी एक इमाम की पैरवी कर के जन्नत में दाखील हो सकते है)। तो उन को हम ये बताना चाहते है के, ये चारो इमाम तो बहोत बाद में आए उन से पहेले जो लोग थे (यानी सहाबा इकराम) वो जिस दरवाजे से जन्नत जाएंगे हम वही दरवाजे से जन्नात जाना चाहते है और वो दरवाजा है इमामे आûजम हजरत मुंहम्मद मुस्तफा () की पैरवी। जिन्हे रसुलुल्लाह () का दरवाजा मिल जाए उन्हे किसी और दरवाजे की जरूरत नही क्युंके सुरज के निकलने के बाद दिये की जरूरत नही होती। हमारी कामयाबी रसुलुल्लाह () के सुन्नत पर अमल करने में है (यानी रसुल की इत्तेबा में) ना के तकलीद में, क्युं के हमारे आका रसुलुल्लाह () की बात अल्लाह की बात है जबके तकलीद एक नबी की बात नही है बल्की ये उम्मती की राय (सोच) है।

नफाई कबीर, सफा नं.१६ में मौलाना अब्दुल हई फरमाते है के, --हमारा अबु हनिफा (रहे) के बारे में ये अकिदा है के, अगर वो जिंदा रहते हदिसो के जमा होने तक तो हदीस को ले लेते और तमाम कयासो (राय) को छोड देते--

 

 

क्या जन्नत में जाने के चार रास्ते है

अक्सर तकलीद करने वाले लोग कहते है के जन्नत में जाने के चार रास्ते है, कामयाब होने के लिए किसी भी एक इमाम की तकलीद कर लो।

 

आईए कुरआन से पुछते है -

हजरत अब्दुल्लाह-बिन-मसुद (रजि) बयान करते है के, रसुलुल्लाह () ने एक सिधी लकीर खिंच कर फरमाया, ये अल्लाह तआला का रस्ता है। फिर आप ने दाए और बाए चंद लकीरे खिंच कर फरमाया, ये बहोत से रास्ते जो है इन में से हर एक रास्ते पर शैतान बैठा है, जो अपनी तरफ दावत देता है और आप () ये आयत तिलावत फरमाई - --और ये के ये है मेरा सिधा रास्ता तो इस रास्ते पर चलो, और राहे ना चलो के तुम्हे इस की राह से जुदा कर देगी....-- (सुरे अनम (६), आयत-१५३)

पता चला के जन्नत में जाने का एक ही रास्ता है और वो है हुजुर का रास्ता (कुरआन और हदीस)

 

 

हुजुर () ही हमारे इमाम है और उन्ही के रास्ते पर चलना कामयाबी है

एक बार उमर-ए-फारूक (रजि) हाथ में तौरात ले कर पढ रहे थे, प्यारे नबी () का चेहरा मुबारक गुस्से से तबदील हो रहा था। सय्यदना अबुबकर (रजि) आप () के चेहरे मुबारक को देखते है और उमर-ए-फारुक (रजि) से कहते है के, आप मेरे आका को चेहरे को नही देख रहे, उमर (रजि) ने आप () के चेहरे मुबारक को देखा के आप गुस्से में है तो फौरन तौरात को निचे रख दिया और कहा के, मै अल्लाह के रब होने पर राजी, मुंहम्मद रसुलुल्लाह () के नबी होने पर राजी, इस्लाम के दिन होने पर राजी। आप () ने फरमाया, --एै उमर आज तो तुम तौरात पढ रहे हो अगर मुसा भी जिंदा हो कर आ जाए और उस ने निजात पा ली हो तो उसे भी मुंहम्मद के पिछे चलना पडेगा, तुम मुझे छोड दो मुसा के पिछे चल पडो तो राहे मुस्तकीम से (सिधे रास्ते से) गुमराह हो जाओगे--

पता चला के, मुसा (अलैहिस्सलाम) एक नबी है लेकीन रसुलुल्लाह () की बात को छोड कर मुसा (अलैहिस्सलाम) की बात मानी जाने से आदमी गुमराह हो जाएगा तो सोचो के फिरके के बुजुर्ग की, मस्लक की (तकलीद), गुमराह पिर की और गुमराह मुल्लाओ की बात मान कर हमारा क्या अंजाम होगा।

 

सुरे बनी इस्त्राईल (१७) आयत नं.७१ में अल्लाह तआला इरशाद फरमा रहा है के, --जिस दिन हम हर जमाअत को इस के पेशवा (इमाम) समेत बुलाएंगे, फिर जिन का भी अमाल नामा दाए (सिधे) हाथ दे दिया गया वो तो शौक से अपना अमल नामा पढने लगेंगे और एक धागे के बराबर भी जुल्म ना किया जाएगा। और जो कोई इस जहा में अंधा रहा वो आखेरत में भी अंधा और रास्ते से बहोत ही भटका हुआ रहेगा--

 

हाफीज इब्ने कसीर (वफात ७७४ हिजरी) तफसीर इब्ने कसीर में लिखते है के, यहा पेशवा (इमाम) से मुराद नबी है, हर उम्मत कयामत के दिन अपने नबी (अलैहिस्सलाम) के साथ बुलाई जाएगी जैसे के कुरआन की एक आयत में है --हर उम्मत का रसुल है, फिर जब इन के रसुल आएंगे तो इन के दरमियान अदल के साथ हिसाब किया जाएगा--

 

 

 

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