क्या जईफ हदीस पर अमल किया जा सकता है?

 

क्या जईफ हदीस पर अमल किया जा सकता है?

 

जईफ हदीस मे ये शक होता है की, शायद वो साबीत ना हो। मतलब हमे ये पक्का नही पता की ये बात रसुलुल्लाह () से साबीत है की नही।

 

अल्लाह तआला कुरआन मजीद में फरमाता है "जिस बात का तुम्हे इल्म ही ना हो उस के पिछे मत पडो क्युंकी तुम्हारे कान और आँख और दिल में से हर एक से पुछ-ताछ की जानेवाली है।"

[Sure Isra (१७), ayat-३६]

 

रसुलुल्लाह () ने फरमाया, "जो चिज हलाल है वो बता दिया गया है और जो चिज हराम है वो बता दिया गया है, और उन दोनो के बिच चिज है जिन पर शक है जो बहोत से लोग नही जानते। जो आदमी अपने आप को एैसी चिजो से बचाता है जो शक और शुबात पैदा करे वो अपनी दिन की हिफाजत करता है और अपने आप की हिफाजत करता है, और जो शक और शुभे वाली चिज पर अमल पैरा होता है वो हराम की तरफ चला जाता है उसी तरहा जिस तरहा एक चरवाहा अपने जानवरो को चराता है किसी की और की जमीन के पास ये लाजीम है के वो उस में पड जाए"

(सहीह मुस्लीम :किताब-१०, हदीस-३८८२)

 

इमाम मुस्लीम (रहे) फरमाते है के - जाईफ हदीस बिल्कु नही ली जाए यहा तक के फजाईल के मामले में भी नही ।

 

कुछ उलेमा सिर्फ फजाईल (फजीलत) के मामले में (ना के हलाल और हराम के मामले में) जईफ हदीस कुबुल कर लेते है, लेकीन निचे लिखी हुई शर्तो के साथः

 

पहेली शर्तः

वो बहोत कमजोर नही होनी चाहिए, वो झुटो घडने वालो और बहोत बडी गलती करने वालो की रिवायत नही होनी चाहिए।

दुसरी शर्तः

ये आम तौर पर सबुत के मुताबीक होनी चाहिए।

तिसरी शर्तः

उस पे अमल करते वक्त ये यकीन नही करना चाहिए के ये अमल अच्छी तरहा से कायम या साबीत है।

चौथी शर्तः

जो उस पर अमल करता है उस को ये यकीन करना चाहिए के ये जईफ हदीस है।

पांचवी शर्तः

जईफ हदीस को एक अच्छे अमल का जिक्र करना चाहिए जो की शरीयत के बुनियाद में से हो।

छटी शर्तः

वो जईफ हदीस किसी सहीह हदीस की वûजाहत के लिए शुमार नही करना चाहिए।

 

अक्सर जईफ हदीसे कुरआन और सहीह हदीस से टकराती है। जईफ हदीस बयान करते वक्त उलेमा को चाहिए के लोगो के बता दे के ये जईफ हदीस है। लेकीन उलेमा ये बात आम लोगो को नही बताते और आम लोग इसे सहीह समझ कर अमल करने में लग जाते है। चुंके इन हदीसो का सहीह हदीस और कुरआन से टकराव अक्सर होता है इस वजह से फितने पैदा हो जाते है, कुछ जईफ हदीसे एैसी है जिस से इमान जाने का डर है। इसी तरहा से बुखारी और मुस्लीम की सहीह हदीसो में जिंदगी के ९९% उसुल मिल जाते है इसलिए इमाम मुस्लिम फरमाते है के जईफ हदीस की जरूरत ही बाकी नही रहती। तो नतीजा ये निकला के जईफ हदीसो को छोडना ही बहेतर है।

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