इसाले सवाब की हकिकत
इसाले सवाब की हकिकत
मरहुमीन (मरे हुए लोग) को किन चिजो का सवाब मिलता है?
१। माली इबादत जैसे सदका, खैरात, हज्जे बदल का सवाब मरहुमीन को मिल सकता है।
२। मरहुम के नाम पर सदका-ए-जारीया वाले काम जैसे मस्जीद की तामीर, पानी का कुंआ खुदवा कर पानी देना, दिनी मदरसो की तामीर करवाना या तामीर मे हिस्सा लेना, पेड लगाना जिस के फलो, पत्तो और फुलो और साये का फादा इंसान व परिंदो को मिले, दिनी किताबो की तक्सीम कर के या अपनी जबान से दिन के इल्म को फैलाना, मुसाफीरो को ठहरने के लिए घर बनाना, यतीमो या गरीबो के लिए घर बनाना, नहर जारी करवाना वगैरा।
३। अपनी जिंदगी में कुछ माल सदके के लिए निकाल कर रख देना जायûज है।
४। किसी के नजर के रोजो (मन्नत के रोजे) बाकी है और वो मर गया तो उस के वारीस उस की तरफ से रोजे रख सकते है।
५। किसी पर कर्ज चुकाना बाकी था लेकीन व मर गया तो उस की तरफ से कोई भी (सिर्फ वारीस ही नही) उस के कर्ज की अदायगी कर सकता है।
६। हज व उमरा उस के वारीस कर सकते है और इस का सवाब मरहुम को मिलता है।
७। मरने वाले ने किसी को पैसे देने का वादा किया था या किसी पर खर्च करने का वादा किया था या कोई काम करने का वादा किया था तो उस की तरफ से खर्च किया जा सकता है और मरहुम के वादे को पुरा किया जा सकता है, तो उसे सवाब मिलेगा।
८। मरहुम की औलाद खर्च करे तो मुरहुम को सवाब मिलता है क्युंके औलाद उस की कमाई में से है।
९। अपने पिछे नेक औलाद छोड गया जो उस के लिए मगफीरत की दुआ करती है। नेक औलाद अपने मा बाप के लिए सब से बडी सवाबे जारीया होती है।
१०। मरहुम के रिश्तेदार, दोस्त, पडोसी वगैरा (जो वारीस नही है) उस के लिए सिर्फ दुआ कर सकते है, इसाले सवाब नही कर सकते है।
मरहुमीन (मरे हुए लोग) को किन चिजो का सवाब नही मिलता?
१। अकसर उलेमा की इस बात पर एक राय है के जिस्मानी इबादत (जैसे नमाज, रोजा वगैरा) के सवाब को किसी मरहुम के लिए इसाले सवाब नही किया जा सकता।
२। नमाज, जिक्र व अजकार, कलमे तय्यबा, दुरूद शरीफ का सवाब मरहुम को नही मिलता।
३। नबी-ए-करीम (ﷺ) ने और सहाबा ने किसी भी फौतशुदा (मरे हुए) को कुरआन पढ कर नही बख्शा यहा तक के एक सुरा भी पढ कर कभी नही बख्शा।
४। मय्यत के लिए खुद अस्तगफार कर सकते है, मय्यत को अस्तगफार का सवाब मिलता है। लेकीन अस्तगफार पढने के लिए लोगो को बुलाकर मजलीस बिठाना और सब को मिल कर बिजो (चियो) पर अस्तगफार पढना रसुलुल्लाह (ﷺ) या साहाबा से साबीत नही है लेहाजा मजलीस बुलाकर अस्तगफार पढवाना बिदअत है।
५। मय्यत को सवाब पहोचाने के लिए खाना खिलाने का खास दिन मुकर्रर कर देना बिदअत है। जैसे-पहेले दिन, तिसरे दिन, दसवे दिन, बिसवे दिन, तिसवे दिन और चालीसवे दिन, जुमेरात के ही दिन और साल होने पर खाना करना और खास सदके देना बिदआत है। सदका कभी भी दिया जा सकता, सदका देना बिदअत नही है लेकीन उस के लिए खास दिन मुकर्रर कर देना बिदअत है। इसीतरहा से खाना कभी भी खिलाया जा सकता है, खाना खिलाना बिदअत नही है लेकीन उस के लिए खास दिन मुकर्रर कर देना बिदअत है। खाना खिलाना सदका है और इस का सवाब मय्यत को मिलता है।
६। कुल की मजलीस करना और अल्लाहु समद की मजलीस करना साबित नही है इसलिए बिदअत है। इस का कोई सवाब मय्यत को नही मिलता।
७। आयते करीमा की मजलीस और लाईलाहा इललल्लाह की मजलीस बिजो (चियो) या मोतीयो पर करना बिदअत है इस का सवाब मय्यत को नही मिलता।
८। कुरआन ख्वानी का सवाब मय्यत को नही मिलता। आज लोग मदरसो के बच्चो को या रिश्तोदारो को या पडोसीयो को बुलाकर मय्यत के सवाब के लिए कुरआन ख्वानी करते है ये सहाबा से या हुजुर (ﷺ) से साबित नही है इसलिए बिदअत है। इस के अलावा कुरआन खरीद कर किसी को पढने देना सदका है क्यांके सवाब के लिए पैसा खर्च करना सदका है।
९। नमाज और कुरआन पढ कर मुर्दे के सवाब देने से मुर्दे को सवाब नही मिलता क्युंके इस की कोई दलील साबीत नही है। क्युंके नमाज और कुरआन पढना बदनी इबादत है जो जिंदगी मे मय्यत को खुद करनी थी।
कुरआन का सवाब पहोचाने मे उलेमा की एक राय नही है। कुछ उलेमा फरमाते है के कुरआन का सवाब मुर्दे को पहोचाया जा सकता है और बाज का कहेना है के नही पहोचाया जा सकता। जो उलेमा कहते है के नही पहोचा सकते उन मे इमाम शाफई (रहे) भी है। लेकीन हमे हुजुर से कोई हदीस नही मिलती। लेहाजा ये हुजुर का तरीका नही।
१०। चालीसवे दिन या बरसी के दिन मय्यत की पसंदीदा मिठाई और फल वगैरा लाकर लोगो को खिलाना बिदअत है इस से मय्यत को सवाब नही मिलता।
११। बिस्मील्लाह का कुरआन पढना और कुरआन की हर लाईन पर बिस्मील्लाह पढने का सवाब मय्यत को नही मिलता, ये बिदअत है।
१२। कबरो पर फुल डालना और कबर को पास झाड लगाना साबीत नही है इस से मय्यत को सवाब नही मिलता। हुजुर (ﷺ) ने दो कबरो पर खजुर की टहनी गाढाè थी तो ये चिज आप (ﷺ) को वही के जरीये मालुम हुई थी के दो कबरो पर अजाब हो रहा है। क्या आप अपने मुर्दे के बारे मे ये सोचते है के उसे भी अजाब हो रहा है। मुर्दे के साथ बदगुमानी (बुरी सोच) रखना शरीयतन जायûज नही है। दुसरी बात आप (ﷺ) ने खजुर की टहनी लगाई थी फुल नही डाला था।
१३। सवाब की नियत से मयत की कबर मे अहदनामा रखना, कुरआन रखना, मय्यत के सिने पर या पेशानी पर कुछ लिखना ये चिजे दुरुस्त नही है।
१४। मय्यत के इसाले सवाब के लिए ४० रोज किसी मर्द या औरत को खाना दिया जाता है। खाना खिलाना सदका है, खाना कभी भी खिलाया जा सकता है, कितने भी दिन खिलाया जा सकता है और इस का सवाब मय्यत को मिलता है लेकीन ये अमल ४० दिन के लिए खास कर देना बिदअत है क्युंके ये सहाबा से साबीत नही है।
कुरआन और हदीसे पाक की रौशनी मे कुछ दलीले निचे दी गई हैः
१। हजरत अबु हुरेरा (रजि) से मरवी है के, हुजुर (ﷺ) ने इरशाद फरमाया "जब किसी इंसान का इंतेकाल हो जाता है तो उस के अमल का सिलसिला रुक जाता है सिवाय तिन चिûजो के १) सवाबे जारीया (जारी रहने वाला सवाब), मिसाल- कुंवा बनवा देना, नहेर खुदवा देना, मस्जीद बनवा देना वगैरा, २) वो इल्म जिस से फायदा उठाया जाता रहे, ३) नेक औलाद (बेटा) जो अपने वालेदैन के लिए दुआ करती है।
(Sahi Muslim Page १२५५, Hadees १६३१) (Sunan Abu Dawood, Hadees २८८०)
इस हदीस से मालुम हुआ के मरने के बाद इंसान का आमालनामा बंद हो जाता है सिवाय तिन चिजो के १) सवाबे जारीया, २) वो इल्म जिस से फायदा उठाया जाता रहे, ३) नेक औलाद। अब कोई इसाले सवाब कर के उस के आमाल नामे मे सवाब डालने की कोशीश करे तो सवाब कैसे पहोचेगा? लेहाजा पता चला के उपर दी गई तिन चिजे ही मुर्दे के काम आ सकती है।
२। हुजुर (ﷺ) ने इरशाद फरमाया "एक शख्स के जन्नत मे दर्जे बुलंद होंगे, फिर वो पुछेगा की ये कैसे हुआ, फिर उस से कहा जाएगा तुम्हारे औलाद (बेटा) की मगफीरत की दुआओ की वजह से जो वो तुम्हारे लिए करते है। (इब्ने माजा नं.३६६०)
३। हुजुर (ﷺ) ने इरशाद फरमाया "बेशक सब से पाकीजा जो इंसान खाता है वो उस के हाथो की कमाई है और उस की औलाद भी उस की कमाई है।" (सुनान अबु-दाऊद, हदीस-३५२८)
४। एक शख्स ने हुजुर (ﷺ) से कहा "मेरी वालेदा (मां) का इंतेकाल हो गया है, और अगर वो बोल पाती तो उन्हो ने कुछ सदका किया होता। तो अगर मै उन की तरफ से कुछ सदके मे दे दुं तो क्या उन्हे सवाब मिलेगा?" हुजुर (ﷺ) ने फरमाया "हां"। (सहीह बुखारी, fath -१३८८)
५। हजरत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रजि) से रिवायत है के, एक शख्स ने बारगाहे रिसालत (ﷺ) से अरज किया, "या रसुलुल्लाह (ﷺ) मेरी वालेदा (मां) फौत (मर) हो चुकी है, अगर मैं उनकी तरफ से सदका दुं तो क्या वो उसे कोई नफा देगा?" आप (ﷺ) ने फरमाया "हां"। उस ने अरज किया "मेरे पास एक बाग (गार्डन) है आप गवाह रहें मै ने उस की तरफ से सदका कर दिया"। -ये हदीस सहीह है
(Sunan Tirmizi, Hadees ६६९) (Sunan Abu Dawood, Hadees २८८२) (Sunan Nasai Hadees ३६५५) (Imam Nasai Sunan Hadees ६४८२)
६। हजरत अब्दुल्लाह-इब्ने-अब्बास (रजि) से रिवायत है के, कबीला जुहेना की एक खातुन (औरत) ने हुजुर (ﷺ) की बारगाह मे हाजीर हो कर अरज किया "मेरी मां ने हज की मन्नत मांगी थी लेकीन वो हज ना कर सकी यहा तक की फौत (मर) हो गई, क्या मैं उन की तरफ से हज करू"। हुजुर (ﷺ) ने फरमाया "हा तुम उस की तरफ से हज करो, भला बताओ क्या तुम्हारी मां पर कर्ज होता तो क्या तुम अदा ना करती? फिर अल्लाह अûजवजल का हक अदा करो वो ज्यादा हकदार है के उसका हक अदा किया जाए।"
(Sunan Nasai, Hadees २६३२) (Sunan Al Kubra Hadees ३६१२) (Imam Tabrani Hadees १२४४३)
७। हजरत अबु हुरेरा (रजि) से रिवायत है के नबी-ए-अकरम (ﷺ) की खिदमत में एक शख्स ने अरज किया "या रसुलुल्लाह (ﷺ) मेरा बाप फौत (मर) हो गया है और उस ने माल छोडा है और वसीयत भी नही की, अगर मैं उसके तरफ से सदका करू तो क्या ये सदका उस के गुनाहो का कप‹फारा हो जाएगा? आप (ﷺ) ने फरमाया "हां"।
(Sahi Muslim Hadees १६३०) (Sunan Nasai, Hadees ३६२५) (Sunan Ibne Majah, Hadees २७१६)
८। हजरत आयशा सिद्दीका ताहिरा (रजि) से रिवायत है के "एक शख्स नबी-ए-करीम (ﷺ) की बारगाह मे हाजीर हुआ और अरज किया "मेरी वालेदा (मां) अचानक फौत (मर) हो गई है और मेरा खयाल है की अगर वो (मरते वक्त) गुप‹तगु कर सकती तो सदके (की अदायगी का हुकुम) करती, अगर मैं उस की तरफ से खैरात करू तो क्या उसे सवाब पहोचेगा? नबी-ए-करीम (ﷺ) ने फरमाया "हां"।-ये हदीस सहीह है
(Sahi Bukhari २७६०) (Sahi Muslim १००४) (Sunan Abu Dawood, २८८१) (Imam Nasai ६४७६)
९। हजरत साद-बिन-उबादा (रजि) अरज करते है "या रसुलुल्लाह (ﷺ) मेरी मां विसाल (इंतेकाल) कर गई, मैं उन की तरफ से सदका करना चाहता हुँ, कौन सा सदका अफजल रहेगा"। हुजुर (ﷺ) ने फरमाया "पानी"। चुनांचे उन्हो ने एक कुंवा खुदवाया और कहा "ये उम्मे साद के लिए"। -ये हदीस हसन है
(Sunan Abu Dawood १६८१) (Mishkat १९१२)
ये बात गौर के काबील है के, उपर जो हदिसे दी गई है वो सिर्फ औलाद का जिक्र करती है इसलिए के सिर्फ वालेदैन को औलाद के आमाल काम आएंगे, किसी पैसे दिए हुए मौलवी, पडोसी, मदरसे के बच्चे, यतीम खाने के बच्चे, या रिश्तेदार के आमाल नही। दुसरी बात ये है के मुर्दे को उस के वारीसो के नेक आमाल का सवाब खुद-ब-खुद मिल जाता है इस के लिए फातेहा देने की कोई जरूरत नही। फातेहा देना दिन मे बाद मे शुरू हुआ और जो काम दिन मे बाद मे शुरु हुआ उसे बिदअत कहते है।
कुरआन की आयते जो हमे सिखाती है के हम किसी भी शख्स के लिए दुआ कर सकते हैः
१। एै हमारे रब मुझे बख्श दे और मेरे मां-बाप को और सब मुसलमानो को जिस दिन हिसाब कायम होगा" (Sura Ibrahim (१४), Ayat#४१)
२। और वो जो इन के बाद आए, अरज करते है एै रब हमे बख्श दे और हमारे भाईयो को जो हम से पहेले इमान लाए और हमारे दिल में इमान वालो की तरफ से किना ना रख, एै हमारे रब तु ही निहायत महेरबान रहेम वाला है। (Sura e Hashar (५९), Ayat#१०)
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