वसीला क्या है और वसीले से मांगना कैसा है?.... आदम अलैहिस्सलाम की तौबा की हकीकत

 

वसीला क्या है और वसीले से मांगना कैसा है?


१।    इस्लामी शरीयत ने हमे अल्लाह के नाम और अपने नेक आमाल (काम) के जरीये से मांगने की इजाûजत दी है। और अगर कोई नेक इंसान जिंदा है तो उस से दुआ करवा सकते है लेकीन नेक लोग जो मर चुके हो उन का वसीला लगाकर दुआ मांगना गलत है। कुरआन और सुन्नत मे कही भी नही लिखा है के दुआ मे मरे हुए नेक लोगो का वसीला लगना चाहिए या मरे हुए नेक लोगो का वसीला लगाने से दुआ जल्दी कुबुल होती है। नबी () ने जितने भी दुआ हमे सिखाई उस में कही भी वसीला नही है।

२।    सहाबा इकराम नबी () से दुआ करवाते थे, लेकीन आप () हयात थे तब तक, आप के इंतेकाल के बाद किसीने अल्लाह के रसुल के वसीले से दुआ नही मांगी।

३।    हजरत उस्मान-बिन-हुनैफ (रजि) से रिवायत है के, एक नाबीना (अंधा) शख्स नबी () की बारगाह में हाजीर हुआ और बोला, आप मेरे लिए दुआ किजीए की अल्लाह मुझे शिफा अता फरमाए। तो आप () ने फरमाया, अगर तुम सब्र करो तो ये तुम्हारे लिए ज्यादा बहेतर होगा और अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारे लिए दुआ करूं। तो उस ने कहा आप दुआ किजीए। आप () ने फरमाया, जाओ, अच्छी तरहा वûजु करो और फिर २ रकात नमाûज पढो और फिर इस तरहा दुआ करो, --एै अल्लाह मैं तुझ से सवाल करता हुँ, और तेरी तरफ रुख करता हुँ और मुहंम्मद () नबी-ए-रहेमत के वसीले से तुझ से दुआ करता हुँ, एै मुहंम्मद () , मै ने अपनी हाजत के लिए आप के वसीले से अल्लाह की तरफ रुख किया, एै अल्लाह! ये वसीला कबुल फरमा। [Tirmidhi As-Sunan, Vol-०५, Page-५६९, Hadith-३५७८][Imam Hakim Al Mustadrak Vol ०१, Pg ३१३, Hadees ५१९]  [Ibn Majah As-Sunan, Volume-०१, Page-१९७, Kitabul Iqamat Al Salat Wa Sunnat, Hadith-१३८५] [Nasai - Amal Al Yawm Wal Layla Pg ४१७, Hadees -६५८,६५९]

इस हदीस से साबीत हुआ के वसीले के लिए ३ शर्ते जरुरी है। १) नबी का हयात होना, २) मांगने वाले के लिए अल्लाह के रसुल खुद दुआ करे और ३) मांगने वाला भी अल्लाह से अल्लाह के रसुल के वसीले से दुआ करे। आज कल लोग दुआ के आखीर में अल्लाह के रसुल का वास्ता दे कर दुआ करते है, ये अमल साबीत नही, ना सहाबा से, ना अल्लाह के रसुल ने हमे एैसा सिखाया और ना किसी इमाम और मोहदसीन ने एैसा किया।

४।    गैरुल्लाह से दुआ मांगना शिर्क है और गैरुल्लाह के वसीले से दुआ मांगना शिर्क के हुकूम में है।

५।    अल्लाह के रसुल () कयामत मे उन की शफाअत करेंगे जो शिर्क कर के नही मरेःहदीसः हजरत अबु हुरेरा (रजि) कहते है के, रसुलुल्लाह ()  ने फरमाया, हर नबी के लिए एक दुआ एैसी है जो जरूर कबुल होती है, तमाम नबीयो ने वो दुआ दुनिया मे ही मांग ली, लेकीन मै ने अपनी दुआ कयामत के दिन अपनी उम्मत की शफाअत के लिए महेफुज कर रखी है, मेरी शफाअत इन्शाअल्लाह हर उस शख्स के लिए होगी जो इस हाल में मरा के उस ने किसी को अल्लाह के साथ शरीक नही किया (सहीह मुस्लीम, किताबुल इमान, हदीस-३९९)

६।    "अनस-बिन-मालीक (रिûज) रिवायत करते है के, जब कभी हजरत उमर (रिûज) के जमाने मे कहत पडता तो उमर (रिûज) हजरत अब्बास-बिन-अब्दुल मुत्तालिब के वसीले से दुआ करते और फरमाते के एै अल्लाह पहेले हम तेरे पास अपने नबी-ए-करीम () का वसीला लाया करते थे तो तु पानी बरसाता था। अब हम अपने  नबी-ए-करीम () के चाचा को वसीला बनाते है तो तु हम पर पानी बरसा, अनस (रिûज) ने कहा के चनांचा बारीश खुब ही बरसी"(Saheeh Bukhari, Hadees १०१०)

इस हदीस से ये मालुम हुआ के रसुलुल्लाह () के दुनियासे जाने के बाद आप के कबरे अन्वर पर जमा होकर बारीश के लिए दुआ नही मांगी जाती थी और दुआ मे आप का वसीला नही लिया जाता था बल्की की आप के चाचा हजरत अब्बास (रिûज) के वसीले से करवाई जाती थी जो की हयात थे।

7    अल्लाह पाक फरमाता हैः "हा खालीस अल्लाह ही की बंदगी है और जिन्हो ने इस के सिवा और वली बना लिए कहते है हम तो इन्हे सिर्फ इतनी बात के लिए पुजते है के ये हमे अल्लाह के पास नûजदीक कर दे अल्लाह इन में फैसला कर देगा इस बात का जिस मे इख्तेलाफ कर रहे है बेशक अल्लाह राह नही देता इसे जो झुठा बडा ना शुक्र हो" (Surah az zumar (३९), ayat ३)

8    अल्लाह पाक फरमाता हैः "और ये लोग अल्लाह के सिवा एैसी चिज को पुजते है जो इन का कुछ भला ना करे और कहते है के ये अल्लाह के यहा हमारे सिफारशी है तुम (नबी) फरमाओ क्या अल्लाह को वो बाते जताते हो जो इस के इल्म में ना हो आस्मानो में है ना जमीन में इसे पाकी और बरतरी है इन के शिर्क से" (Surah Yunus (१०), ayat-१८)

9    अल्लाह पाक फरमाता हैः "ये इस पर हुआ के जब एक अल्लाह पुकारा जाता तो तुम कुफ्र करते (इंकार करते, नही मानते) और इस का शरीक ठहराया जाता तो तुम मान लेते तो हुक्म अल्लाह के लिए है जो सब से बुलंद बडा" (Surah-Momin-(Fussilat) (४०), ayat-१२)

ये आयते साफ तौर पर मुशरीकीने मक्का की हालत बयान करती है पर अफसोस है के आज के कुछ मुसलमान एैसे ही अकिदे के है।

10   (एै नबी सलल्लाहु अलैहि व-सल्लम) जब मेरे बंदे मेरे बारे में सवाल करे तो आप कहे दिजीए के मैं बहोत करीब हुँ, हर पुकार करने वाले की पुकार को जब कभी वो मुझे पुकारे कबुल करता हुँ, इसलिए लोगो को भी चाहिए के वो मेरी बात मान लिया करे और मुझ पर इमान रखे, यही इन की भलाई का जरीया है। (सुरे बकराह (२), आयत-१८६)

पता चला के दुआ अल्लाह से बगैर वसीले के दुआ मांगी तो भी सुनी जाती है।

11   क्या इन लोगो ने अल्लाह तआला के सिवा औरो को सिफारीश करने वाला मुकर्रर कर रखा है, तो कह दे के क्या उस सुरत में भी जब को वो किसी चिज के मालीक नही और ना ही कोई अकल रखता है? कह दे के तमाम सिफारीश का मुख्तार अल्लाह तआला ही है, आस्मान और जमीन की बादशाही उसी की है, फिर उस की तरफ तुम सब (मरने के बाद) लौट जाओगे। (सुरे जुमर (३९), आयत-४३,४४)

2   कौन है जो इस की जनाब मे इस की इजाûजत के बगैर सिफारीश कर सके (सुरे बकरा(२), आयत-२५५)

3   और वो अपने हुकुम मे किसी और को शरीक नही करता (सुरे कहफ (१८), आयत-२६)

4   और अल्लाह जैसा चाहता है हुकुम करता है कोई इस के हुकुम को रद करने वाला नही (सुरे राअद (१३), आयत-४१)

5   हदीस शरीफ हैः बुखारी शरीफ की हदीस (हदीसे कुदसी) है हुजुर () इरशाद फरमाते है के अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया "और मेरा बंदा जिन जिन इबादतो से मेरा कुर्ब हासील करता है (यानी मेरे करीब आता है) कोई इबादत मुझ को उस से ज्यादा पसंद नही है जो मैने उस पर फर्ज की है। और मेरा बंदा फर्ज अदा करने के बाद नवाफील इबादत कर के मुझ से इतना ज्यादा नजदीक हो जाता है के मैं उस से मोहब्बत करने लगता हुँ, फिर जब मैं उस से मोहब्बत करने लगता हुँ तो मैं उस का कान बन जाता हुँ जिस से वो सुनता है, उस की आँख बन जाता हुँ जिस से वो देखता है, उस का हाथ बन जाता हुँ जिस से वो पकडता है, उस का पाव बन जाता हुँ जिस से वो चलता है। और अगर मुझ से मांगता है तो मैं उसे देता हुँ, अगर वो किसी दुश्मन या शैतान से मेरी पनाह का तालीब होता है तो मैं उस को महेफुज रखता हुँ और मैं जो काम करना चाहता हुँ उस में मुझे इतना तरददुद (हिचकिचाहट) नही होता जितना की अपने मोमीन बंदे की जान निकालने में होता है वो तो मौत को पसंद नही करता और मुझे भी उस को तकलीफ देना अच्छा नही लगता (Hadees-E-Qudsi Hadees २५, Sahih al-Bukhari Hadees ६५०२, Book ref। ८१, Hadees ९१, Eng refVol। ८, Book ७६, Hadees ५०९)

इस हदीस से मालुम हुआ के अल्लाह का कुर्ब (करीब आना) कुछ अमल करने से हासील होता है ना के वसीले से।

 

 

वसीला साबीत करने के लिए वकील और जज की मिसाल दे कर अल्लाह की गुस्ताखीः

बहोत से भाई वसीले को साबीत करने के लिए वकील और जज की दुनियावी मिसाल देते है के, जज तक जाने के लिए वकील की जरूरत पडती है। तो इन लोगो से हमारा सवाल है के, क्या मेरा रब भी जज जैसा है? जज को केस के बारे में पता नही होता, उसे केस की गहराई का इल्म नही होता इसलिए वकील की जरूरत पडती है, क्या अल्लाह को भी जज की तरहा इल्म नही है? क्या अल्लाह को भी किसी की जरूरत है के कोई उस तक बाते पहोचाए? एैसी बाते अल्लाह की शान के खिलाफ है और आदमी को कुफ्र तक ले जाती है।

 

 

कुरआन में वसीले का लफ्ज़ २ बार आया है, आईये इस का क्या मतलब है देखेः

वसीले के मतलब उर्दु में -जरीया- होता है और अरबी में -कुर्ब- होता है। अरबी में कुछ लफ्ज़ एैसे है जिन के मायनी उर्दु से बिल्कुल अलग है और कुछ के मायनी में थोडा थोडा फरक है। मिसाल के तौर पे - जलील लफ्ज़ के मायनी उर्दु में -कमीने- के होते है और अरबी में -कमजोर-। इसी तरहा से जाहील के उर्दु में मायनी -अनपड- के होते है और अरबी में -जबाती होना- के होते है। कुरआन मजीद में वसीला २ जगहो पर आया है -

१।    अल्लाह तआला से डरते रहो और उस का कुर्ब (नजदीकी) तलाश करो और उस की राह में जेहाद करो ताके तुम कामयाब हो। (सुरे माएदा (५), आयत-३५)

यानी अल्लाह का कुर्ब हासील करने के लिए जेहाद करो। जेहाद के मायनी है कोशिश करना।

२।     वो मकबुल बंदे जिन्हे ये काफीर पुजते है वो आप ही अपने रब की तरफ कुर्ब हासील करते है के इन में कौन ज्यादा मुकर्रब है, इस की रहेमत की उमीद रखते और इस के अजाब से डरते है, बेशक तुम्हारे रब का आजाब डर की चिज है (सुरे अल-इसरा (१७), आयत-५७) -

 

पती चला के गैरुल्लाह को (नेक बंदो को) पुकार के लोग कुफ्र करते है, लेकीन लोग जिन्हे पुकारते है वो खुद अल्लाह से रहेमत की उमीद रखते है और इस के अजाब से डरते है।

 

आदम अलैहिस्सलाम ने क्या सच में वसीले से दुआ मांगी थी?

 

आदम अलैहिस्सलाम के तौबा पर जईफ हदीसः

आदम अलैहिस्सलाम ने आस्मान में हुजुर का नाम देखा था तो हुजुर के वसीले से दुआ की तो उन की तौबा कबुल हुई। (मुस्तदरक हाकीम, २/४८६ छ ४२२८, तिबरानी ओसत-६/३१३ छ ६५०२, वगैरा)

ये हदीस कितोबो में अधुरी सनद के साथ नकल की गई है। इस का रावी रहेमान बिन जईद बिन असलम अपने वालीद से मैजु (झुठी) हदीसे बयान करता था। ये रिवायत कुरआन की आयतो और सहीह हदीसे से टकराती है।

 

 

आदम अलैहिस्सलाम की तौबा की हकीकत कुरआन में मौजुद है

(सुरे अल-बकरा (२), आयत-३७) आदम (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब से चंद बाते सिख ली और अल्लाह तआला ने उन की तौबा कबुल फरमाई, बेशक वही (अल्लाह) तौबा कबुल करने वाला और रहेम करने वाला है।

 

(सुरे ऐराफ (७), आयत-२३) दोनो ने कहा एै हमारे रब ! हम ने अपना बडा नुकसान किया और अगर तु हमारी मगफीरत ना करेगा हम पर रहेम ना करेगा तो वाकई हम नुकसान पाने वालो में से हो जाएंगे।

 

(सुरे जारीयात (५१), आयत-५६) अल्लाह ने नही पैदा किया, जिनो और इंसानो को मगर अपनी बंदगी के लिए।

 

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