हलाला (शरई तरीके से)
हलाला (शरई तरीके से)
१। हलालाः अगर कोई शख्स अपनी बीवी को तीन तलाक दे दे। तो पहेले इस की बीवी इस शख्स की इदत गुजारेगी। इदत गुजारने के बाद वो चाहे तो किसी से भी निकाह कर सकती है। शादी के बाद उस मर्द की मर्जी पर है के वो तलाक देगा या नही देगा। तलाक दिलवाने के लिए उस से जबरदस्ती नही की जा सकती या कोई लालच नही दिया जा सकता। वो जब तक जिंदा है ये औरत उस की बीवी रहेगी। उस के मरने के बाद वो औरत पहेले शोहर से निकाह कर सकती है। या अगर उन दोनो मे किसी वजह से तलाक हो जाए तो वो औरत अपने पहेले शोहर से निकाह कर सकती है। ये है असली शरीयत। लेकीन आज लोगो ने हलाला को मजाक बना कर रखा है, आज कल लोग किसी मर्द को पैसा दे कर उस के साथ एक दिन के निकाह का काँट्रक्ट करते है और काँट्रक्ट के मुताबीक तलाक लिया जाता है तो ये इस्लाम के खिलाफ है और बेदीनी है।
२। जब तक दुसरे शोहर के साथ जिस्मानी तालुक या मुबाशेरत नही होग, सिर्फ निकाह करने से औरत पहेले शोहर के लिए हलाल नही होगी।
बुखारी शरीफ की रिवायत है, हदीस नं. ४८५७ है, सय्यदा आयशा सिदीकी रजि. उस के रावीया है, ये कहती है के "एक शख्स ने अपनी बीवी को ३ तलाके दे दी, फिर इस औरत ने दुसरे शख्स से निकाह कर लिया, फिर दुसरे शख्स ने भी उस को तलाक दे दी"। दुसरे शोहर ने उस औरत से जिसमानी तालुक कायम नही किया था। तो नबी-ए-करीम (ﷺ) से पुछा के "क्या वो पहेले वाले के लिए हलाल हो गई"। सरकार ने फरमाया "नही"। फिर सरकार ने फरमाया "ये पहेले वाले के लिए हलाल नही होगी जब तक के दुसरा शोहर उस का उसी तरहा कुछ शहेद ना चख ले जैसे पहेले शोहर न चखा है"। सरकार ने शर्म व हया के साथ इस चिज को शहेद से ताबीर किया। इस का मतलब ये है के, "जब तक दोनो मे जिस्मानी तालुक कायम नही होगा, सिर्फ निकाह करने से औरत पहेले शोहर के लिए हलाल नही होगी।
Comments
Post a Comment