लफ्ज़ -आशिके रसुल- इस्तेमाल करना हुजुर की तौहीन है
लफ्ज़ -आशिके रसुल- इस्तेमाल करना हुजुर की तौहीन है
बरेलवी हजरात अपने आप को आशिके कहते है। लफ्ज़ -इश्क- से बना है -आशिक-। इश्क लफ्ज़ मे शहवत (गंदी ख्वाहीश) होती है। जब के लफ्ज़ -मोहब्बत- पाकीजा लफ्ज़ है। लफ्ज़ -इश्क- का इस्तेमाल ना कुरआन मे आया है और ना ही हदीस में।
क्या ये कहना दुरूस्त है के, --मै अपनी माँ का आशिक हुँ, मैं अपनी बहेन या बाप का आशिक हुँ--। नही, तो सही लफ्ज़ ये है के --मैं अपनी मां से मोहब्बत करता हुँ--। जब आप अपनी माँ और बहेन के लिए इश्क का लफ्ज़ इस्तेमाल नही कर सकते तो कायनात की सब से पाकीजा जात हुजुर (ﷺ) के लिए नापाक लफ्ज़ का इस्तेमाल कैसे कर सकते है जैसे --मैं आशिके रसुल हुँ--
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