बुजुर्ग परस्ती.... और तौहीद
सवालः क्या बुजुर्गो को पता है के दुनिया मे क्या चल रहा है
जवाबः नही, दलील निचे है
दलील नं. १
रसुलुल्लाह (ﷺ) हौजे कौसर से अपने उम्मतीयो को पानी पिला रहे होंगे और उन्हे रोक दिया जाएगा, इन को भी नबी (ﷺ) यही समझेंगे के ये तो मेरे फरमाबरदार उम्मती है लेकीन आप (ﷺ) को मुतला किया जाएगा (बताया जाएगा) के -एै नबी (ﷺ) आप नही जानते के इन्हो ने आप के जाने के बाद क्या कुछ किया, इन्हो ने आप के बाद दिन मे (शरीयत में) नयी-नयी चिजे निकाल ली थी-, तो आप (ﷺ) फरमाएंगे "इन के लिए (रहेमत से) दुरी हो! इन के लिए (रहेमत से) दुरी हो! जिन्हो ने मेरे बाद दिन को बदल डाला"[Sahih Bukhari, Vol।८, kitabur-Riqaaq, Hadith- ६५८४]
पता चला के जब आप (ﷺ) के दुनिया में क्या चल रहा है पता नही तो बुजुर्गो को कैसे पता चलेगा।
दलील नं. २
"(कयामत के दिन) फिर मेरे पैरोकारो को दाए (जन्नत की) तरफ ले जाया जाएगा, लेकीन बाûज को बाए (यानी जहान्नम की) तरफ घसीटा जाएगा। मै कहुंगा -एै मेरे रब! मेरे उम्मती!-, लेकीन मुझे (अल्लाह तआला की तरफ से) बताया जाएगा के -(एै नबी) आप नही जानते उन्हो ने आप के बाद क्या किया, जब आप इनसे जुदा हुए तो ये इस्लाम से फिर गए थे-। मैं उस वक्त वही कहुंगा जो (अल्लाह के) नेक बंदे ईसा-इब्ने-मरीयम ने कहा था के -मैं इन पर गवाह रहा जब तक इन में मौजुद रहा। फिर जब तु ने मुझको उठा लिया तो तु ही इन पर निगरान रहा। और तु हर चिज से खबरदार है"। [Sahih al-Bukhari ३४४७]
इस हदीस से साबीत होता है के अंबिया इकराम फौत होने पर इस दुनिया से बेखबर होते है तो बुजुर्ग को दुनिया की खबर कैसे हो सकती है
दलील नं. ३
Rasool-Allah Sallallahu Alaihi Wasallam ne farmaya Beshak Allah ke farishte zameen mein ghumte rahte hain aur meri Ummat ka salam mujh tak pahuchate hain (Sunan Nasai,Jild २, १२८५-Sahih ✦८)
इस हदीस से पता चला के अल्लाह के रसुल तक फरीश्तो के जरीए सलाम पहोचाया जाता है।
सवालः क्या बुजुर्ग के मुंह से निकली हुई बात पुरी हो कर रहती है
जवाबः नही, दलील निचे है
जंगे ओहद में जब आप (ﷺ) के दंदाने मुबारक शहीद हुए और आप जखमी हुए तो आप (ﷺ) ने फरमाया के, --ये गिरोह कैसे फलाह पाएगा जिस ने अपने पैगंबर से ये सुलुक किया जब के वो इन्हे खुदा की तरफ से दावत देता है--। इस बात पर अल्लाह तआला की तरफ से ये सुरे इमरान (३), आयत नं.१२८ नाûजील हुई और अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया के --किसी किस्म का इख्तीयार तुम्हे नही है मगर ये के खुदा चाहे के इन्हे माफ करे दे या सûजा दे क्युंके वो ûजालीम है--।
पता चला के नबी करीम (ﷺ) की ûजबाने मुबारक से जो जुमला निकले वो अल्लाह की मर्जी के बगैर पुरा नही हो सकता । जब के कुछ बद अकिदा मुसलमान कह देते है के हमारे वली ने जो कह दिया वही होता है।।।।माअजअल्लाह। इस तरहा से वली का दर्जा नबी से बडा कर दिया जाता है।
सवालः क्या बुजुर्ग सब की फरीयाद सुनते है और मुराद पुरी करते है
जवाबः जब बुजुर्ग दुनिया से बेखबर है तो कैसे किसी की फरीयाद सुन सकते है। और किसी की फरीयाद सुन्ना और उस को पुरा करना अल्लाह तआला का काम है ना के बुजुर्ग का।
दलीलेः
वाकई, तुम अल्लाह को छोड कर जिन को पुकारते हो वो भी तुम्हारी तरहा अल्लाह के बंदे है, सो तुम इन को पुकारो! फिर इन्हे भी चाहिए के तुम्हारा जवाब दे, अगर तुम सच्चे हो। (सुरे ऐराफ (७), आयत-१९४)
एै नबी (ﷺ) कहे दिजीए इंसानो से के तुम्हारा नफा और नुकसान का इख्तीयार सिर्फ अल्लाह के पास है। (सुराह जिन (७२), आयत-२१)
और तुम्हारे रब का फरमान है की मुझ से मांगो मै तुम्हारी दुआओ को कबुल करूंगा (सुराह मोमिन (४०), आयत-६०)
भला बताओ तो अल्लाह के अलावा तुम जिन को पुकारते हो अगर अल्लाह मुझे कोई तकलीफ पहोंचाना चाहे तो क्या ये उस की दी हुई तकलीफ को दुर कर सकते है या अल्लाह मुझ पर इनायत करना चाहे तो ये उस की इनायत को रोक सकते है (सुराह जुमर (३९), आयत-३८)
कह दिजीए की तो क्या तुम ने (फिर भी) उस के अलावा और कारसाज करार दे दिए है तो अपनी ही जात के लिए नफा और नुकसान का इख्तियार नही रखते (सुराह राअद (१३), आयत-१६)
और उस से बढकर गुमराह कौन होगा जो अल्लाह के अलावा औरो को पुकारे जो कयामत तक भी उस की बात ना सुने बल्की उन के पुकारने की खबर तक ना हो (सुराह अहकाफ (४६), आयत-५)
"जिन को तुम उसके सिवा पुकार रहे हो वो तो खजुर की गुठली के छिलके के भी मालीक नही है, अगर तुम उन को पुकारो तो वो तुम्हारी पुकार सुनते ही नही और अगर (मान लो) सुन भी ली तो तुम्हारी फर्याद पुरी नही करेंगे, बल्की कयामत के दिन तुम्हारे इस शिर्क का साफ इंकार कर देंगे" (Sure Fatir (३५), Ayat-१३,१४)
"एै लोगो बयान की जाती है एक मिसाल तो गौर से सुनो उसे यकीनन वो जिन को पुकारते हो तुम अल्लाह के सिवा हरगीज नही पैदा कर सकते वो एक मक्खी भी अगरचा जमा हो जाए वो सब इस काम के लिए और अगर छिन ले जाए इन से मक्खी कोई चिज तो नही छुडा सकते इस को इस से, कमजोर है (मदत) मांगने वाला भी और वो भी जिन से (मदत) मांगी जाती है। नही पहेचान सके ये अल्लाह को जैसा के हक है इस को पहेचानने का, यकीनन अल्लाह ताकतवर और गालीब है"। (सुरे हज (२२), आयत-७३,७४)
और बराबर नही है जिंदे और मुर्दे बेशक अल्लाह सुनाता है जिसे चाहे, और तुम नही सुनाने वाले इन्हे जो कबरो में पडे है। (सुरे फातीर (३५), आयत-२२)
और तुम्हारा अल्लाह के अलावा कोई भी ना कारसाज है और ना मदतगार (सुराह अश-शुरा (४२), आयत-३१)
और अल्लाह तआला पर जो भरोसा रखता है इस के लिए अल्लाह काफी है (सुराह तलाक (६५), आयत-३)
एै लोगो! तुम सिर्फ मेरे दर के फकीर हो (सुराह फातीर (३५), आयत-१५)
सवाल: Ghause Aazam - jo apne murido k bare me irshad farmate hai k jab tuk har aek mera murid jannat me na chala jaye tub tuk ABDUL QADIR Jannat me nahi jaayega. ...?
जवाबः ये दावा करना भी कुफ्र है, आप कैसे कह सकते है के आप को सिफारीश का मौका मिलेगा, मौका मिल भी गया तो आप की हर बात सुनी जाएंगी और अगर आप के मुरीद शिर्क पर मरते है तो दावे का क्या?
बहेरहाल हमारा मानना है के, ये दावा अब्दुल कादीरशाह जिलानी नही कर सकते, ये उन के उपर किसी ने मंसुख किया गया है।
दावा बेबुनियाद है
उसकी कुर्सी सब आसमानॊं और ज़मीनों को घेरे हुये है और उन दोनों आसमान व ज़मीन की निगरानी कुछ भी मुश्किल नहीं है और वो आलिशान बुज़ुर्ग मर्तबा है
(सुरे बकराह (२), आयत-२५५)
और इस वह़्यी के द्वारा उन्हें सचेत करो, जो इस बात से डरते हों कि वे अपने पालनहार के पास प्रलय के दिन एकत्र किये जायेंगे, इस दशा में कि अल्लाह के सिवा कोई सहायक तथा अनुशंसक सिफ़ारिशी न होगा, संभवतः वे आज्ञाकारी हो जायेँ।
(सुरे अनाम (६), आयत-५१)
तथा (अल्लाह) कहेगाः तुम मेरे सामने उसी प्रकार अकेले आ गये, जैसे तुम्हें प्रथम बार हमने पैदा किया था तथा हमने जो कुछ दिया था, अपने पीछे संसार ही में छोड़ आये और आज हम तुम्हारे साथ, तुम्हारे अभिस्तावकों सिफ़ारिशियों को नहीं देख रहे हैं, जिनके बारे में तुम्हारा भ्रम था कि तुम्हारे कामों में वे अल्लाह के साझी हैं? निश्चय तुम्हारे बीच के संबंध भंग हो गये हैं और तुम्हारा सब भ्रम खो गया है।
(सुरे अनाम (६), आयत-९४)
वास्तव में, तुम्हारा पालनहार वही अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छः दिनों में उत्पन्न किया, फिर अर्श राज सिंहासन पर स्थिर हो गया। वही विश्व की व्यवस्था कर रहा है। कोई उसके पास अनुशंसा सिफ़ारिश नहीं कर सकता, परन्तु उसकी अनुमति के पश्चात्। वही अल्लाह तुम्हारा पालनहार है, अतः उसी की ईबादत वंदना[1] करो। क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते?
(सुरे युनुस (१०), आयत-३)
सवालः क्यु बुजुर्ग की नजरे करम से इमान हासील हो सकता है
जवाबः नही, एक गैस पाक का मनघडत किस्सा बयान किया जाता है। के उन के घर चोर घुस आया। आप ने उसे एैसी देखा के उसे हिदायत मिल गई और वो अबदाल बन गया।
अल्लाह तआला फरमाता है के, "एै नबी आप हिदायत नही दे सकते जिसे आप पसंद करो बल्की ये अल्लाह ही है जिसे चाहे हिदायत दे"। (सुरे अल-कसस (२८), आयत नं.५६)
अल्लाह तआला ने नबी (ﷺ) को हिदायत के लिए भेजा है लेकीन आप का किसी के दिल पर इख्तीयार नही।
"और मुझे जो कुछ भी तौफीक (सद्बुद्धि) होती है सिर्फ अल्लाह ही की मदद से होती है "
(क़ुरआन अल हूद आयत ८८)
और बराबर नही है जिंदे और मुर्दे बेशक अल्लाह सुनाता है जिसे चाहे, और तुम नही सुनाने वाले इन्हे जो कबरो में पढे है। (सुरे फातीर (३५), आयत-२२)
आयत से पता चला के जो लोग इमान वाले नही है वो लोग महेज नबी (ﷺ) की दावत से इमान लाने वाले नही, इस के लिए अल्लाह की हिदायत जरूरी है।
अल्लाह के नबी (ﷺ) ने अपने चाचा अबु तालीब को हिदायत नही मिली
जब हुजुर (ﷺ) के चाचा अबु तालीब के इंतेकाल का वक्त करीब आया तो आप (स.स.) ने उन्हे कहा के अभी तो भी आप कलमा पढ लिजीए मै इस का गवाह रहुँगा, फिर भी उन्हो ने कलमा नही पढा।
(Sahih al-Bukhari no:4399 and Sahih Muslim no:35)
उस के बाद कुरआन की आयत नाजील हुई
नबी और मोमनिन (momin) पर जब ज़ाहरि हो चुका कि मुशरेकीन जहन्नुमी है तो उसके बाद मुनासबि नहीं कि उनके लिए मग़फरित की दुआएं माँगें अगरचे वह मुशरेकीन उनके क़राबतदार हो (क्यों न) हो
(Sure Tauba (9), Ayat-113)
अबु तालीब को ले कर एक हदीस भी नाजील हुई
हुजुर ने फरमाया, --जहान्नमीयो में से अबु तालीब को सब से कम दर्जे की तकलीफ होंगी, उन को आग के जुते पहेनाए जाएंगे जिस से उन का दिमाग खौलेगा।
(Sahih Muslim no:312, Kanz al--Ummal no:39512, Musnad Ahmed ibn al-Hanbal no:2636)
Allah-s messenger (S) said: “Among the inhabitants of the fire AbuTalib would have the least suffering, and he would be wearing two shoes (of Fire) which would boil his brain.”
सवालः क्या बुजुर्ग की दर्गाह पर हर एक की मुराद पुरी होती है।
जवाबः मुराद अल्लाह से हि मांगी जानी चाहिए और वही है जो मुराद पुरी करता है
आज का मुसलमान सोचता है के वली की दरगाह पे जा कर उस की हर मुराद पुरी हो जाती है, वली रहेम वाले होते है जल्दी दुआ कबुल करते है किसी को खाली हाथ नही लौटाते। जब की सुरे फातीर (३५) की आयत नं १५ में अल्लाह तआला फरमाता है के, "एै लोगो तुम सब अल्लाह के दर के फकीर हो,अल्लाह तो गणी व हमीद है"।
इसी तरहा से अल्लाह तआला हम से ७० मांओ से ज्यादा बंदे से मोहब्बत करता है।
बिस्मील्लाह हिर्ररहेमा निर्ररहीम का मतलब होता है अल्लाह के नाम से शुरु जो बडा महेरबान और रहेम वाला है।
सवालः क्या बुजुर्ग को सब का पास्ट (गुजरा हुआ कल) और Future (आने वाला कल) मालुम है।
जवाबः कुरआन और हदीस में एैसे कही वाकीयात है जो बताते है के पास्ट (गुजरा हुआ कल) और प‹युचर (आने वाला कल) का इल्म सिर्फ अल्लाह तआला को है। और हुजुर (ﷺ) को भी तब ही इल्म होता था जब उन्हे वही के जरीए बताया जाता था। वही सिर्फ नबी पर आती है बुजुर्गो पर नही। इसलिए उन के पास किसी भी तरहा का गैबी इल्म आना का सवाल ही पैदा नही होता।
सवालः क्या बुजुर्ग गैब का इल्म रखते है
जवाबः गैबा का इल्म सिर्फ अल्लाह तआला को है। इल्मे-गैब का मतलब होता है बगैर किसी के बताए गैब की बात (छुपी हुई बात) मालुम पड जाना।
हुजुर (ﷺ) को भी तब ही इल्म होता था जब उन्हे वही के जरीए बताया जाता था। जो चिज बताने से मालुम हो उसे इल्मे-गैब नही कहते। वही सिर्फ नबी पर आती है बुजुर्गो पर नही। इसलिए बुजुर्ग के पास किसी भी तरहा का गैबी इल्म आना का सवाल ही पैदा नही होता।
नोटः इल्मे- गैब एक बहोत बडा टाùपीक है, इस टाùपीक पर हमारे पास बेशुमार दलिले मौजुद है, इसलिए हम ने इल्मे-गैब नाम से एक अलग टाùपीक बनाया है, इल्मे-गैब के टाùपीक मे इंशाल्लाह ज्यादा से ज्यादा दलिले देने की कोशिश करेंगे।
सवालः क्या बुजुर्ग के मजार के उदी और फुल और काजल में भी शिफा है
जब के काबे में जो पत्थर लगा उसे हजरे अस्वद कहते है। ये पत्थर जन्नत से आया है और जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने इसे लाया है और पहिली बार इसे काबे में इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने लगाया था और जब काबा दुसरी बार तामीर हुआ तो दुसरी बार इसे नबी-ए-करीम (ﷺ) ने काबे में ये पत्थर लगाया था। इस पत्थर के बारे में हजरत उमर (रजि) कहते है के, "मैं जानता हुँ के तु एक पत्थर है, तु ना नुकसान पहोचा सकता है ना नफा, अगर मै ने अल्लाह के नबी (ﷺ) को चुमते ना देखा होता तो मैं कभी तुझे नही चुमता।
(सहीह बुखारी - १५९७)
पता चला के हजरे अस्वद एक जन्नती पत्थर है फिर भी हजरत उमर इस पत्थर से ये अकिदा रखते थे के ये सिर्फ पत्थर है, ना किसी को फायदा पहोचा सकता है ना नुकसान।
सवालः क्या इमाम अबु हनिफा और अब्दुल कादीरशाह जिलानी (गौस) ने ४० साल एक वजु से नमाज पढी
जवाबः नही, एैसा अमल ना तो शरीयत को मंजुर है और ना ही इंसान के लिए एैसा करना मुमकीन है
HADEES SE DALIL
3
aadmi ummuhatul momineen (ra) ki khidmat me haazir hue, aur unhone(parde ke
peeche se) nabi akram(sws) ki nafl ibadat ke muttalik sawal kiya, jab unhe
bataya gaya ki( aap sws is andaz se ibadat karte hain) to unhone mahsus kiya ki
yah ibadat thodi hai, phir unhone kaha: hamara aap(sws) se kya muqabla? Unke to
agle pichle gunah maaf ho chuke hain( wah to agar zyada ibadat na bhi karen to
koi baat nahi, hame to bahut zyada mahnat karne ki zarurat hai, unme se ek
bola: main hamesha namaz(tahajjud) padha karunga; dusre ne kaha: main hamesha
roza rakhunga, kisi din naaga nahi karunga; teesre ne kaha: main aurton se alag
rahunga, kabhi nikaah nahi karunga; (jab aap(sws) ko in baaton ka ilm huwa to)
aap(sws) unke paas tashrif le gaye aur farmaya:
" tum logon ne ye ye Baatein ki hai? Allah ki qasam! Main tum sabse zyada
khauf e khuda aur taqwa rakhta hun, lekin main (nafli) roze bhi rakhta hun aur
chhod ta bhi hun, (raat ko) namaz (tahajjud) bhi padhta hun aur sota bhi hun,
aur maine nikaah bhi kiye hain, to jo mere tariqe pe nahi chalega wo hum se
nahi"
(sahih bukhari, kitabunnikah h4774)(sahih muslim, kitabun nikaah, h 1401)
पता चला के जो हुजुर के तरीके को छोड दे और अपने तरीके से अल्लाह की इबादत करे वो वली बन ही नही सकता और अल्लाह के रसुल के तरीके पर चलना ही कामयाबी है
सवालः क्या शिफा देना बुजुर्ग के इख्तीयार मे है
जवाबः नही, शिफा देना सिर्फ अल्लाह के इख्तीयार में है
रसुलुल्लाह (ﷺ) ने हमे ये दुआ सिखाई "एै इंसानो के रब- दुर कर दे ये बिमारी और शिफा दे तु, तु ही शिफा देने वाला है, नही कोई शिफा तेरी शिफा के सिवा और (एैसी शिफा जिस से) कोई तकलीफ बाकी ना रहे"।
(सुनन अबु दाऊद की सहीह हदीस नं.३८८३)
सवालः क्या बुजुर्ग के वसीले से दुआ मांगे तो कबुल होती
जवाबः वसीला भी एक बहोत बडा टाùपीक है जो हम ने अल्लाह के करम से अलग से तयार कर रखा है। हम आने वाले वक्त में कुरआन और हदीस की दलिलो के साथ इंशाल्लाह बताएंगे।
फिल्हाल वसीले के बारे में यु समझ लिजीए के वसीले की कुछ शर्ते होती है। ये शर्ते उन बुजुर्गो पर लागु नही होती जो दुनिया से चला जा चुके है।
सवालः एक कव्वाली में सुना है के, --खुदा को देना पडता है जिसे ख्वाजा दिलाते है-- ये अकिदा कैसा है?
जवाबः ये अकिदा कुफरीया और शिर्कीया है।
आज का मुसलमान वली से सिफारीश की उमीद लगाता है। शैतान ने लोगो के दिमाग में डाल रखा है के, अल्लाह दुआ कबुल नही करता, हम को वसीले से जाना पडेगा।
"कौन है जो अल्लाह के पास सिफारीश करे अल्लाह की इजाûजत के बगैर"। (सुरे बकरा (२) की आयत नं.२५५)
क्या इन लोगो ने अल्लाह तआला के सिवा औरो को सिफारीश करने वाला मुकर्रर कर रखा है, तो कह दे के क्या उस सुरत में भी जब को वो किसी चिज के मालीक नही और ना ही कोई अकल रखता है? कह दे के तमाम सिफारीश का मुख्तार अल्लाह तआला ही है, आस्मान और जमीन की बादशाही उसी की है, फिर उस की तरफ तुम सब (मरने के बाद) लौट जाओगे। (सुरे जुमर (३९), आयत-४३,४४)
कौन है जो इस की जनाब मे इस की इजाûजत के बगैर सिफारीश कर सके (सुरे बकरा (२), आयत-२५५)
और वो अपने हुकुम मे किसी और को शरीक नही करता (सुरे कहफ (१८), आयत-२६)
और अल्लाह जैसा चाहता है हुकुम करता है कोई इस के हुकुम को रद्द करने वाला नही (सुरे राअद (१३), आयत-४१)
सवालः क्या बुजुर्ग दुनिया में कही भी किसी भी शकल में आ जा सकते है और लोगो की मदत कर सकते है
जवाबः नही, जो लोग इंतेकाल कर जाते है वो दुनिया से बेखबर होते है। शकल बदल कर घुमने फिरने की ताकत जिन्नात को दी गई है। ये अकिदा सुन्नी लोगो के यहा पाया जाता है जिसका सबुत ना तो कुरआन में मिलता है ना ही हदीस में।
सवालः क्या बुजुर्ग के नजरे करम से तकदीर संवर जाती है।
जवाबः नजरे करम यानी करम की नजर करना। यानी किसी बंदे को एैसी नजर से देखा के उस पर करम हो गया, उस की काया पलट हो गई, उस की तकदीर सवर गई।
एैसा अकिदा शिर्क है। तकदीर के फैसले सिर्फ अल्लाह के हाथ में है। कोई भी बंदा किसी की तकदीर नही बता सकता, ना संवार सकता ना ही बिगाड सकता।
कुरआन
और हमने तुमसे पहले और (भी) बहोत सारे पैग़म्बर भेजे और हमने उनको बिविया भी दी और औलाद (भी अता की) और किसीपैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मोजज़ा ख़ुदा की इजाज़त के बगैर ला दिखाए हर एक वक्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहाँ) एक (किस्म की) तहरीर (होती) है
फिर इसमें से ख़ुदा जसिको चाहता है मिटा देता है और जसिको चाहता है बाक़ी रखता है और उसके पास असल किताब (लौहे महफूज़) मौजूद है
(सुरे राअद (१३), आयत - ३८-३९)
पता चला के किस्मत लोह महेफुज में लिखी है और अल्लाह के अलावा कोई इसे बदल नही सकता। हां किसी जिंदा नेक शख्स की दुआ से तकदीर बदल सकती है लेकीन नजर से नही।
सवालः क्या बुजुर्ग अपने मुरीदो को और उन के चाहने वालो को जन्नत में डालेंगे
जवाबः Sunniyon ka aqeeda hai ka baroz e qayamat wali jannat me jayenge inhe koi khauf nahi, na apni jaan ka na apne yaron ki jaan ka. Khud bhi jannat me jayenge aur murid bhi jannat me jayenge. Aur Gause Pak ke baare me ye dawa hai ke jo bhi Kadri Silsile se murid banega wo jannat me jayega, Gause Pak use jahannam nahi jane denge.
कुरआन और हदीस से पता चलता है के जन्नत में वही जाएगा जिस का इंतेकाल इमान पर हुआ। कुछ नेक लोगो को भी सिफारीश करने का मौका मिलेगा। लेकीन कौन जन्नत में जाएगा और कौन जहान्नम में ये फैसला सिर्फ अल्लाह का होगा। वलीयो के नाम से इतने बडे दावे शिर्क की तरफ ले जाते है।
एक बुजुर्ग परस्त इंसान अपनी जिंदगी में क्या-क्या करता है
Ø बुजुर्ग के खुश करने के लिए और खैर व बरकत के लिए उन नाम के नजर व नियाज करता है।
Ø बुजुर्ग के हर संदल और उरुस में हाजरी देता है।
Ø बुजुर्ग के लिए चंदा देता है
Ø अपने हर हाजत (जरूरते) बुजुर्ग से मांगता है
Ø औलाद अगर नही हो रही हो तो औलाद मांगता है
Ø नजरे करम हो इसलिए रोजाना दर्गा पर हाजरी देता है
Ø मुरादे बुजुर्ग से मांगता है
Ø मुराद पुरी होने पर बुजुर्ग का एहसान मान कर कुछ तोहफा दर्गा के लिए देता है
Ø सारी उमीदे बुजुर्ग से लगाए रखता है
Ø हर वक्त बुजुर्ग का तस्व्वुर दिमाग में रखता है
Ø बुजुर्ग का ही जिक्र हर महेफील में करता है
Ø बुजुर्ग की बढाई एैसी करता हो के अल्लाह के बराबर शरीक ठहराने जैसा हो।
नोटः ये हर चिज अल्लाह के लिए होना चाहिए था क्युं के ये सब अल्लाह की इबादत है।
तो आप ही बताईये के, जिंदगी भर बुजुर्ग के नाम से शिर्क बिदअत करने वाला बुजुर्ग परस्त इंसान अगर शिर्क की हालत में इंतेकाल कर जाता है तो क्या उसे जन्नत मिलेगी?
दुसरी बात उस इंसान ने ये सब काम बुजुर्ग के इंतेकाल के बाद किए। बुजुर्ग को खुद पता नही है के उन के नाम से क्या कुछ किया जा रहा है। और आखेरत में ये खुद उन के शिर्क और बिदअत से इंकार करेंगे। कहेंगे के हम ने इन्हे एैसा करने के लिए नही कहा था इस की दलिल निचे है।
"जिन को तुम उसके सिवा पुकार रहे हो वो तो खजुर की गुठली के छिलके के भी मालीक नही है, अगर तुम उन को पुकारो तो वो तुम्हारी पुकार सुनते ही नही और अगर (मान लो) सुन भी ली तो तुम्हारी फर्याद पुरी नही करेंगे, बल्की कयामत के दिन तुम्हारे इस शिर्क का साफ इंकार कर देंगे" (Sure Fatir (३५), Ayat-१३,१४)
सवाल : क्या बुजुर्ग हमारे बिगडे हुए काम बना सकते है
जवाब : अल्लाह के अलावा कोई नही जो बिगडे काम बना सके
भला बताओ तो अल्लाह के अलावा तुम जिन को पुकारते हो अगर अल्लाह मुझे कोई तकलीफ पहोंचाना चाहे तो क्या ये उस की दी हुई तकलीफ को दुर कर सकते है या अल्लाह मुझ पर इनायत करना चाहे तो ये उस की इनायत को रोक सकते है
(सुराह जुमर (३९), आयत-३८)
कह दिजीए की तो क्या तुम ने (फिर भी) उस के अलावा और कारसाज करार दे दिए है तो अपनी ही जात के लिए नफा और नुकसान का इख्तियार नही रखते
(सुराह राअद (१३), आयत-१६)
कौन है जो इस की जनाब मे इस की इजाûजत के बगैर सिफारीश कर सके
(सुरे बकरा (२), आयत-२५५)
और वो अपने हुकुम मे किसी और को शरीक नही करता
(सुरे कहफ (१८), आयत-२६)
और अल्लाह जैसा चाहता है हुकुम करता है कोई इस के हुकुम को र करने वाला नही
(सुरे राअद (१३), आयत-४१)
Allah ke siwa koi ma-abood nahin, woh akela hai, us ka koi shareek nahin, usi ke liye baadshaahat hai aur usi ke liye tamaam ta-areefein hain, wahi zinda karta hai aur wahi maut deta hai, usi ke qabze mein tamaam bhalaai hai aur woh har cheez par qaadir hai.
(Musnad-e-Ahmad : 26551)
सवालः क्या बुजुर्ग के आस्ताने पर जाने से औलाद भी मिल सकती है
जवाबः औलाद देना या बांझ रखना सिर्फ अल्लाह के इख्तीयार में है।
हजरत जकरीया (अलैहिस्सलाम) और हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) जो के अपने वक्त के नबी है लेकीन उन को बुढापे में औलाद हुई। उन्हो ने अल्लाह से ही औलाद मांगी।
अल्लाह के रसुल हुजुर (A) ने हमें कभी नही सिखाया के औलाद के लिए मजार पर जाओ, उन से दुआ मांगो या उन से कहो के हमारे लिए अल्लाह से दुआ करे। बल्की अल्लाह के रसुल ने तो उंची कबरो को तोडने का हुकूम दिया था। दुआ कबर वालो के लिए होती है, कबर वालो से नही।
सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़ास ख़ुदा ही की है जो चाहता है पैदा करता है (और) जिसे चाहता है (फ़क़त) बेटिया देता है और जिसे चाहता है (महज़) बेटा अता करता है या उनको बेटे बेटिया (औलाद की) दोनों किस्मे इनायत करता है और जसिको चाहता है बांझ बना देता है बेशक व वाकिफ़कार कदीर है
(सुरे शुरा (४२), आयत -४९-५०)
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ
परवरदगिार मुझे एक नेको-कार (फरज़न्द) इनायत फरमा
(सुरे साफात (३७, आयत -१००)
हजरत जकरीया अलैहिस्सलाम की दुआ
और जकरीया (को याद करो) जब उन्होंने (मायूस की हालत में) अपने परवरदिगार से दुआ की ऐ मेरे पालने वाले मुझे तन्हा (बे औलाद) न छोड़ और तू तो सब वारिसो से बेहतर है
(सुरे अंबिया (२१), आयत -८९)
सवालः क्या बुजुर्ग खुद अपनी तरफ से करामत बता सकते है
जवाबः कोई भी नबी अपनी तरफ से मोजजा या करामत नही बता सकते। अल्लाह उन के लिए मोजजा करता है।
सुन्नी (बरेल्वी) लोगो ने अपने बुजुर्गो के नाम से मनघडत किस्से कहानिया बना रखी है, जिस में बुजुर्ग खुद अपने दम पर करामत करते नजर आते है (ये खुला शिर्क है)
मिसाल के तौर पर - गौस पाक ने एक पुरानी कबर से खुद के नाम से कव्वाल को कबर से जिंदा कर के उठाया।
जुनेद बगदादी ने अपने नाम का विरद करा के एक इंसान को पानी पर चलाया। जब उस इंसान ने पानी पर चलते हुए जुनेद बगदादी का विर्द करना बंद किया और या अल्लाह कहा तो डुबने लगा। (अस्तगफिरुल्लाह)
एैसी कई मिसाले झुठे मनघडत किस्से कहानियो में मिलेगी। इन कहानियो से इमान खतरे में पड सकता है।
और हमने तुमसे पहले और (भी) बहुत सारे पैग़म्बर भेजे और हमने उनको बिविया भी दी और औलाद (भी अता की) और किसी पैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मोजज़ा ख़ुदा की इजाज़त के बगैर ला दिखाए हर एक वक्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहाँ) एक (किस्म की) तहरीर (होती) है
(सुरे राअद (१३), आयत - ३८)
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