दर्गाह (मजार/कब्र)
कबर पर चिराग जलाना मना है
रसुलुल्लाह (ﷺ) ने उन लोगो पर लानत की है जो लोग कबरो पर जा कर चिराग जलाते है (सुनान अबु दाऊद, हदीस-३२३०)
नोट- रसुलुल्लाह (ﷺ) पर जिन लोगो ने पत्थर बरसाए उन पर आप ने लानत नही की लेकीन कबरो पर चिराग लगाने वालो पर आप ने लानत की है।
कबर को पक्का करना और इमारत बनाना मना है
हजरत जाबीर (रिûज) रिवायत करते है की, नबी (ﷺ) ने कबरो पर बैठना, कबर का पक्का करवाना और कबर पर इमारत बनवाना मना फरमाया था।
(Sahih Muslim, kitabul janaza,Kitab-4, Hadith-2116.)
नबी-ए-करीम (ﷺ) ने हजरत अली (रजि) को खास तौर पर हुकम दिया था की "वो उंची कबरो को जमीन के बराबर कर दे।"
हजरत अली रजि. ने हजरत अबुल हय्याज असदी रजि. से फरमाया कि तुम्हें उसी काम पर मै भेजता हूँ जसि काम पर अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने मुझे भेजा था वह यह कि "किसी बडी ऊंची कब्र को बराबर किए बगैर न छोडो , न किसी मूरत को बगैर मिटाए रहने दो” (Sahih Muslim 2243 (969)
हजरत अम्र बिन अलहारित रजि. से रिवायत है की वे हजरत फादालह बिन उबैद रजि. के साथ रोमन साम्राज्य के -रुदिस- नामक जगह पर थे,वहा पर हमारे एक दोस्त का इंतेक़ाल हो गया। तो हजरत फादालह बिन उबैद रजि.ने हमें हुक्म दिया की "एक कब्र बनाई जाएँ और उसे समतल रखा जाए" और फिर फ़र्माया की मेने रसूलुल्लाह (ﷺ) से सुना की उन्होंने "कब्र को जमीन के बराबर रखने का हुक्म दिया-।"
(Sahih Muslim 2242 (968))
नोटः
नबी-ए-करीम (ﷺ) ने अपने वालीद, वालेदा और सहाबीयो की कबरो को कभी पुख्ता (पक्का) नही किया।
दर्गाहो की कबरे संग-मरमर पक्की बनाई जातीè है और आलीशान गुंबद भी बनाए जाते है। ये सब हराम है
कबर पर बैठना मना है
Abu
Marthad al-Ghanawi radi allahhu anhu se rivayat hai ki Rasoollallah Sallallahu
Alaihi Wasallam ne farmaya Qabro par na baitho aur na unki taraf namaz paro.
(Sahih Muslim, Vol 2, 2251)
Abu
Huraira radi allahu anhu se rivayat hai ki Rasoollallah Sallallahu Alaihi
Wasallam ne farmaya agar koi Ek Angaarey par baithey aur uskey kapdey jal jaye
aur uski khaal tak pahunchey ye behatar hai, us sey ki Wo Qabr par baithey.
(Sahih Muslim, Vol 2, 2248)
रसूलुल्लाह (ﷺ) के इंतेक़ाल के बाद आप (ﷺ) की कब्रे-मुबारक घर में किस वजह से बनाई गयी?
۞ इब्ने-जूरैज रह. से मरवी है, वो कहते है की मुझे मेरे वालिद ने यह हदीस सुनाई की जब रसूलुल्लाह (ﷺ) का इंतेक़ाल हो गया तब , नबी (ﷺ) के सहाबा को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो नबी (ﷺ) को कहा दफ़न करे, यहाँ तक के सैयदना अबु बकर सिद्दीक रजि. ने कहा, मेने रसूलुल्लाह (ﷺ) को यु फरमाते हुए सुना था के "हर नबी की कब्र वही बनाई जाती जहा इनका इंतेक़ाल होता है" , चुनाँचे आप (ﷺ) के बिस्तर को हटा कर इसी के नीचे वाली जगह को कब्र के लिए खोदा गया"
कबरो पर इमारत (गुंबद) बनाना मना मना है तो हुजुर के रोजे पर गुंबद क्यु है
इस गुंबद की हकीकत ये है के, ये गुंबद ७ वी सदी में बनाई गई थी। इस गुंबद को बादशाह अल-जहीर अल-मन्सुर कलावुन अल-सालीही ने ६७८ हिजरी में बनाई थी। और सब से पहेले ये लकडी के रंग का था, फिर ये सफेद रंग का हुआ और फिर निले और फिर ये हरे रंग का हुआ और अब तक वो इसी रंग का है। उस जमाने के उलेमा इकराम और इस जमाने के उलेमा इकराम इस की तंकीद (आलोचना) करते है।
एैसा कही से साबीत नही है की, आप (ﷺ) के कबर पर गुंबद बनाई गई थी, जो आज अल्लाह के औलीया और नेक बंदो की कबर के उपर गुंबद बनाने का बहाना करते है, क्युं के ये आप (ﷺ) की हिदायत नही है के उन के कबर पर गुंबद बनायी जाए और ये गुंबद किसी सहाबा, ताबयीन, या हिदायत वाले इमाम जो के इब्तेदाई जमाने के थे उन लोगो ने नही बनाई थी जिन लोगो की अच्छाई की गवाही खुद रसुलुल्लाह (ﷺ) ने दी थी। बल्की ये बिदअती लोगो ने किया था।
सहाबा ने आप (ﷺ) की कब्र को न तो पक्का बनाया न ही उस पर इमारत बनाई बल्कि जो इमारत पहले से बनी थी यानी नबी (ﷺ) का घर, उसी के अंदर आपको दफनाया गया। सहाबा करिाम ने दफनाने के बाद कब्र पर "एक्स्ट्रा" अपनी तरफ से कोई तामीरात की हो इसका कोई सबूत सहीह हदीस से नहीं मलिता हैं।
कबरो को इबादत की जगह बनाना मना है
हुजुर (ﷺ) ने फरमाया : आगाह रहेना उन लोगो से जिन्हो ने अपने नबी और नेक बुजुर्गो की कबरो को इबादत की जगह ले लिया है लेकीन तुममे से एैसा कोई मत करना मै तुम्हे मना फरमाता हु इस चिज से। (Sahih al bukhari, thee Book of Prayers (Kjitab Al-Salat) [004:1083])
हजरत आयशा (रिûज) रिवायत करती है के, नबी-ए-करीम (सल्लाहु अलैहि व-सल्लम) ने अपने इस बिमारी के वक्त फरमाया था के यहुद और अन्सारी पर लानत हो इन्हो ने अपने अंबिया (नबी) की कबरो को मसाजीद बना लिया। अगर ये डर ना हो तो आप (सल्लाहु अलैहि व-सल्लम) की कबर भी खुली रहने दी जाए। लेकीन डर इस का है के कही इसे भी लोग मस्जीदगाह ना बना ले। [Sahih Bukhari.1390, Sahih Muslim.529]
तुम से पहले के लोग अपने अम्बयिा और स्वालेहीन (नेक लोग) की कब्रो को मस्जिद (places of worship and prayers / सज्दागाहें) बना लिया करते थे, कब्रो को मस्जिद मत बनाना,में तुम को इससे मना करता हुँ" (Sahih Muslim ११८८ (५३२))
कब्रो पर उर्स / मेला, कव्वाली व महफिले सिमाअ, ढोल व सारंगी
कब्रो पर उर्स / मेला, कव्वाली व महफिले सिमाअ, ढोल व सारंगी वगैरह मुनकरात कायम करते है उनके इस अमल की दलील कुरआन और सुन्नत में मौजूद नहीं है। ये गैर-मुस्लिम कौम से मुसलमानो में रिवाज पकड़ा हुआ अमल है, दीन-ए-इस्लाम में इसकी कोई हकीकत नहीं हैं बल्कि ये सभी अमल बिदअत में शुमार है।
۞ हजरत अब हुरैरह रजि. से रिवायत है
नबी करीम {ﷺ} ने फर्माया, "अपने घरो को कब्रिस्तान मत बनाओ, और न मेरी कब्र को ईद (मेलागाह)
बनाओ और मुझ पर दरूद पढ़ो, तुम जहाँ कही भी होंगे तुम्हारा
दरूद मुझ तक पहुच जायेगा"
(Sunan Abu Dawud 2042)
इस हदीस से पता चलता है की रसूलुल्लाह {ﷺ} की कब्र-मुबारक के पास आकर ईद त्यौहार,मेला/उर्स जैसा इज्तेमा करना दुरुस्त नहीं है तो और किसी की आप {ﷺ} के मुकाबले क्या हैसियत हो सकती है।
कबर पर फुल डालनाः
इब्ने अब्बास (रजि) रिवायत करते है की, रसुलुल्लाह (ﷺ) दो कबरो से गुजरे और फरमाया, इन दोनो को हो रही है लेकीन उस चिज के लिए नही जिस से बचना मुश्कील था। उन में से एक को सजा इसलिए हो रही है क्युं की वो पेशाब के कत्रो से (अपने जिस्म और कपडो) की हिफाजत नही करता था। और दुसरा शख्स लोगो में गलत बाते फैलाता था। फिर उन्हो ने (आप (ﷺ) ने) एक ताजी खजुर के पत्ते की डाल ली और उस को दो हिस्सो मे तक्सीम किया और दोनो कबरो पर एक तुकडा रख दिया। उन लोगो ने फरमाया - या रसुलुल्लाह (ﷺ) आप ने ये क्या किया? आप (ﷺ) ने फरमाया, --शायद ये अजाब कम हो जाए जब तक ये सुखी नही होती--।
(Sahi Bukhari, Vol Kitabuz Janaiz, Hadees : 1361) (Sahi Bukhari, Kitabul Waju, Hadees : 216) (sahi Bukhari, Kitabl Adab, Hadees : 6055) (Sunan Nasai, Kitabuz Janaiz, Hadees : 2070/2071) (Sunan Nasai, Kitabut Tahara, Hadees : 31)
कबरो पर फुल डालना और कबर को पास झाड लगाना साबीत नही है इस से मय्यत को सवाब नही मिलता। हुजुर (ﷺ) ने दो कबरो पर खजुर की टहनी गाढी थी तो ये चिज आप (ﷺ) को वही के जरीये मालुम हुई थी के दो कबरो पर अजाब हो रहा है। क्या आप अपने मुर्दे के बारे मे ये सोचते है के उसे भी अजाब हो रहा है। मुर्दे के साथ बदगुमानी (बुरी सोच) रखना शरीयतन जायûज नही है। दुसरी बात आप (ﷺ) ने खजुर की टहनी लगाई थी फुल नही डाला था।
कबर पर पानी डालनाः
मुर्दे को दफन करने के बाद मिट्टी ना उडे एैसी नियत से कबर पर पानी डालने की इजाजत उलेमा देते है। लेकीन सुरे मुल्क और यासीन पढ कर दम किया हुआ पानी कबर पे डालना मना है इस से मुर्दे को कोई फायदा नही पहोचता।
कबर पर अगरबत्ती लगानाः
कबर पर अगरबत्ती लगाने से मुर्दे को कोई फायदा नही पहोचता और ये मना है। सुन्नी जमाअत के उलेमा भी बताते है के कबर पर अगरबत्ती लगाने से कबर को कोई फायदा नही पहोचता।
कबर पर चादर चढाना लगानाः
कबर पर चादर चढाना ये किताब व सुन्नत और फिके हनफी से साबीत नही है। दरगाहो पर जो चादरे चढाई जाती है वो दरगाह के मुजावरो के लिए पैसे कमाने का जरीया बन चुकी है और मुजावरो ने इसे धंदा बना लिया है। जो भोले भाले लोगो को महंगी चादरे खरीदने पर उकसाते है और वही चादरे दरगाह से उतार कर फिर से दुकानदार को बेच देते है।
कबर का बोसा (kiss) लेनाः
कबर को हाथ लगाना और बोसा देना बिल्कुल जायज नही है। बरेलवीयो के इमाम अहमद रजा खान बरेलवी ने भी इस अमल को नाजायज कहा है।
कबर को चुमना, मजारात को चुमना, खंबो और चौकटो को चुमना प्यारे आका रसुलुल्लाह (ﷺ) से और सहाबा इकराम से साबीत नही है। बाज उलेमा भी कबर को चुमने से मना करते है और कबर को चुमना अदब के खिलाफ मानते है।
काबे में जो पत्थर लगा उसे हजरे-अस्वद कहते है। ये पत्थर जन्नत से आया है और जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने इसे लाया है और पहिली बार इसे काबे में इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने लगाया था और जब काबा दुसरी बार तामीर हुआ तो दुसरी बार नबी-ए-करीम (ﷺ) ने काबे में ये पत्थर लगाया था। इस पत्थर के बारे में हजरत उमर (रजि) कहते है के, "मैं जानता हुँ के तु एक पत्थर है, तु ना नुकसान पहोचा सकता है ना नफा, अगर मै ने अल्लाह के नबी (ﷺ) को चुमते ना देखा होता तो मैं कुभी तुझे नही चुमता
कबर (मजार) का तवाफ करनाः
हम ने इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और इस्माईल (अलैहिस्सलाम) से वादा लिया के तुम मेरे घर को तवाफ करने वालो और एैतेकाफ करने वालो और रुकू सुजुद करने वालो के लिए पाक साफ रखो
(सुरे बकराह (२), आयत-१२५)
पता चला के तवाफ अल्लाह की इबादत है और सिर्फ अल्लाह के लिए है।
कबर पर सजदा करनाः
कबर पर ताजीमी मोहब्बत वाला सजदा करना हराम है और अगर इबादत की नियत से किया जाए तो शिर्क है।
कुरआन का फरमानः दिन-रात और सुरज-चांद भी (उसी की) निशानीयो में से है, तुम सुरज को सजदा ना करो ना चांद को बल्के सजदा उसी अल्लाह के लिए करो जिस ने इन सब को पैदा किया है, अगर तुम उसी की इबादत करते हो तो (सुरे हा-मिम (४१), आयत-३७)
पता चला के सजदा सिर्फ अल्लाह के लिए है।
हदीस शरीफः कैस बिन-साअद (रजि) कहते है के, मैं हिरा आया तो देखा के लोग अपने सरदार को सजदा कर रहे हैं तो मैं ने कहा "रसुलुल्लाह (ﷺ) इस के ज्यादा हकदार है के इन्हे सजदा किया जाए"। मैं जब आप (ﷺ) की खिदमत में हाजीर हुआ तो मै ने आप से कहा के मैं हिरा शहर आया तो मैं ने वहा लोगो को अपने सरदार के लिए सजदा करते हुए देखा तो अल्लाह के रसुल इस बात के ज्यादा मुस्तहीक है (हकदार है) के हम आप को सजदा करें। आप (ﷺ) ने फरमाया, "बताओ क्या अगर तुम मेरी कबर के पास से गुजरोगे तो इसे भी सजदा करोगे?" वो कहते हैः मै ने कहा -नही-। आप (ﷺ) ने फरमाया, "तुम एैसा ना करना, अगर मैं किसी को किसी के लिए सजदा करने का हुकम देता तो औरतो को हुकम देता के वो अपने शोहरो को सजदा करे, इस वजह से के शोहरो का हम अल्लाह तआला ने मुकर्रर किया है।" (सुनन अबी दाऊदः २१४०)
इस हदीस से पता चला के अल्लाह के सिवा किसी मख्लुक को सजदा करना जायûज नही है।
मजारात (दरगाह) पर जाना क्यु गलत है?
१। रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया, --मै ने तुम्हे कबरो की जियारत से मना किया था, अब तुम इन की जियारत किया करो (सहीह मुस्लीम-९७७)
२। अबु हुरेरा (रजि) से रिवायत है के, रसुलुल्लाह (ﷺ) ने अपनी वालेदा की कबर की जियारत की, खुद भी रोए और जो आप के साथ थे वो भी रोए। फिर आप ने फरमाया, --मैं ने अपनी वालेदा की बख्शीश की दुआ करने के लिए अल्लाह तआला से इजाûजत मांगी, मुझे इजाûजत नही मिली, फिर मैं ने इन की कबर की जियारत करने की इजाûजत मांगी, पस मुझे इजाûजत दे दी गई, पस तुम भी कबरो की जियारत किया करो, क्युं के कबरो की जियारत मौत याद दिलाती है (सहीह मुस्लीम-२१३०)
पता चला के कबरो की जियारत मौत याद दिलाती है इसलिए कबरो की जियारत का हुकुम है। लेकीन मजारात और मकबरो की जियारत हमे आखेरत की याद नही दिलाती। पहेली बात तो मजार बनाना ही इस्लाम के कानुन के खिलाफ है। दरगाहो के उर्स में मेले ठेले लगते है, मजारात पे जाने से पहेले लोग साथ में खाना लेते है, कुछ लोग तो पिकनीक के तौर पर दरगाह पर जाते है, कुंवारे लडके कुंवारी लडकीयो को देखने के लिए जाते है, बन-ठन कर और सज-संवर कर लोग मजारात पे जाते है, मजारात पे कव्वालीया और बाजे-गाजे होते है। इस्लाम ने कबरो की जियारत का हुकूम दिया ताके मौत याद आए ना के मजार बना कर उसे तफरीहगाह बनाने का।
३। अबु हुरेरा (रजि) से रिवायत है के, रसुलुल्लाह (ﷺ) ने कसरत से कबरो की जियारत करने वाली औरतो पे लानत फरमाई है (तिरमीजी, अल-जनाएûज, हदीस-१०५६)
मजारात पर जाने के बाद शिर्क और बहोत सारी बिदअते होती हैः
१। वली से दुआ मांगना, और उन्हे पुकारना, और मदत मांगना जैसा के "एै वली मेरे कर्ज चुका दो, मेरी बिमारी दुर कर दो, मेरी जरूरत पुरी कर दो, तुम ही जरीया हो, तुम ही मेरी जरूरत पुरी कर सकते हो" इस तरहा के अल्फाज कहना शिर्क है और तौहीद के खिलाफ है जिस का सिर्फ अल्लाह तआला ही हकदार है।
२। जिंदा नेक इंसान के वसीले से दुआ मांगना साबित है, लेकीन मरे हुऐ से मांगना साबीत नही।
३। कबर पर जा कर मांगना रसुलुल्लाह (ﷺ), साहबा इकराम, खुलफाए राशिदीन से साबीत नही है (अगर इस में भलाई होती तो रसुलुल्लाह (ﷺ) उम्मत को जरूर बताते)
४। अल्लाह पाक कुरआन में फरमाता हैः "हा खालीस अल्लाह ही की बंदगी है और जिन्हो ने इस के सिवा और वली बना लिए कहते है हम तो इन्हे सिर्फ इतनी बात के लिए पुजते है के ये हमे अल्लाह के पास नûजदीक कर दे अल्लाह इन में फैसला कर देगा इस बात का जिस मे इख्तेलाफ कर रहे है बेशक अल्लाह राह नही देता इसे जो झुठा बडा ना शुक्र हो" (Surah az zumar (३९), ayat ३) ।
पता चला के मक्का के मुशरीक ये समझते थे के ये बुत हम को अल्लाह के करीब करने का वसीला है इसलिए बुतो को पुजते थे। आज हमारी भी ये हालत हो चुकी है के हम माजारात पर जा कर अल्लाह का वसीला तलाश करते है।
५। कबर पर जा कर बुतो को वसीला बना कर अल्लाह से मांगना यहुदी और अन्सारी की आदत थी।
६। कबर के सामने नमाज जैसी हालत में खडे रहना, सिधा हाथ उलटे हाथ के उपर छाती के उपर या निचे रखना हराम है। ये अमल इबादत की अलामत है और ये सिर्फ अल्लाह तआला के लिए है।
७। झुकना और सजदा करना सिर्फ अल्लाह के लिए है। हजरत अनस (रजि) से बयान करते है केः एक इंसान को दुसरे इंसान के सामने झुकना दुरुस्त अमल नही है। (अहमद, ३/१५८, अल-अलबानी ने इसे सहीह अल-तरगीब, १९३६, १९३७, इरवा अल-गलील में सहीह कहा)
८। हदीस शरीफः "हजरत नौमान-बिन-बशीर (रिûज) से रिवायत है रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया दुआ एक इबादत है, फिर आपन सुरे मोमीन की आयत नं.६० पढी, तुम्हारे परवरदिगार ने फरमाया मुझे पुकारो मैं तुम्हारी दुआ कबुल करूंगा, और जो लोग मेरी इबादत (दुआ) से तकब्बुर करते है वो ûजलील व ख्वार हो कर जहान्नुम मे दाखील होंगे।" (Tirmizi J#५ P#२४३ H#३३७२)
इस हदीस से पता चला के दुआ और पुकार एक इबादत है। इबादत सिर्फ अल्लाह के लिए होती है। तो अल्लाह के सिवा किसी गैरुल्लाह से दुआ मांगना भी शिर्क है।
९। जो अमल अल्लाह को राजी करने के लिए होना चाहिए वो अमल अगर किसी मख्लुक (इल्लाह के बंदे) को राजी करने के लिए किया जाए तो शिर्क है। जैसे - नियाज वगैरा।
१०। जो हस्तीया इंतेकाल कर गई है उन को पुकारना (दुआ), उन से मदत मांगना शिर्क है। जैसे - या गौस अल-मदद, या अली अल-मदद वगैरा। या बात और है के वो मदत कर सकते है या नही लेकीन उन को मदत के लिए पुकारना शिर्क है।
११। दरगाह या मकबरे या आसतानो पर या कबरो पर, ताजीयो पर जाना, इन से मांगना, इन पर तवाफ करना, इन के लिए कुर्बानी करना, इन के खुश करने की नियत से नियाज बनाना, इन से मन्नत मांगना वगैरा शिर्क है।
१२। अल्लाह के अलावा गैरुल्लाह के लिए कुर्बानी और नियाज करना शिर्क है।
१३। अल्लाह के अलावा दुसरो को (गैरुल्लाह को) खुश करने की नियत से नियाज वगैरा करना शिर्क है।
१४। अल्लाह के अलावा किसी से मन्नत मांगना शिर्क है।
१५। अल्लाह के अलावा गैरुल्लाह से दुआ मांगना या पनाह मांगना (हिफाजत में जाना) शिर्क है।
१६। मजारात पर फुल डालना, अत्तर डालना, नारीयल फोडना बिदअत है।
१७। रसुलुल्लाह (ﷺ) को सलाम और दुरूद कही से भी पहोच जाता है। अल्लाह के फरीश्ते जमीन पर घुमते रहते है और दुरुद पढने वाले का दुरूद आप (ﷺ) तक पहोंचा देते है। तो कोई साहब अगर मदिना जाए तो उन से कहना के हमारा सलाम कह दो ये बिदअत है।
१८। रसुलुल्लाह (ﷺ) ने इरशाद फरमाया के मेरी कबर को बार बार आने की जगह मत बनाओ (जैसा के हर नमाज के बाद जाना, हर दिन जाना) और कबर को इबादत की जगह बनाने से मना फरमाया। आज हम वलीयो के मजारात पर बार बार जाते है और मजारात पर बैठ कर इबादत, जिक्र व अजकार, सलातु सलाम पढते है जो के सख्त मना है।
१९। गैरुल्लाह के सामना झुकना हराम है। " अनस इब्ने मालीक (रजि) बयान करते हैः एक शख्स ने कहा, एै अल्लाह के नबी (ﷺ), जब हम मे से कोई अपने दोस्त से मिले, क्या हम उस के लिए झुक सकते है? अल्लाह के रसुल (ﷺ) ने कहा -नही-। उस ने पुछा, -क्या हम गले मिल सकते है और बोसा ले सकते है"?, अल्लाह के रसुल (ﷺ) ने कहा -नही-। उस ने पुछा, -क्या हम हाथ मिला सकते है?, अल्लाह के रसुल (ﷺ) ने कहा -हां अगर वो चाहता है तो- (Narrated al-Tirmidhi, २७२८; he said it is a hasan hadeeth। Also narrated Ibne Maajah। ३७०२। The hadeeth was Classed as hasan in al-Silsilah al-Saheehah, १६०)
२०। अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारना, किसी और से मदत ना मांगना, किसी और से उमीद लगाना, किसी और पर भरोसा करना के वो हमारा बेडा पार कर देगा शिर्क है।
२१। "भला कौन है जो मजबुर की पुकार को कुबुल करता है जब वो उसे पुकारता है, और तकलीफ को दुर करता है? (इलावा अल्लाह के) और तुम को जमीन पर खलीफा बनाता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और माबुद भी है? (हरगीज नही) बल्की तुम बहोत कम ही सोचते समझते हो"। [Surah An-Naml (२७), Ayat-६२]
मालुम हुआ के तुम ये क्यु नही समझते के सिर्फ अल्लाह ही पुकार सुनता है और तकलीफ दुर करता है और अल्लाह की सिफात मे कोई शरीक नही है।
२२। "उस जैसी कोई चिज नही, और वो सब कुछ सुन्ने और देखने वाला है" [surah Shuraa (४२), ayat ११] पता चला के अल्लाह जैसा सुनता है और देखता है उस की ये सिफत किसी में नही।
२३। "औैर ना पुकारो तुम अल्लाह के सिवा किसी को जो तुम को नफा दे सके और ना नुकसान पहोंचा सके, अगर एैसा करोगे तो जालीमो में से हो जाओगे (गुनाह करोगे)"। [surah Younus (१०), Ayat-१०६]
पता चला के गैरुल्लाह को पुकारना शिर्क है
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