तहाज्जुद और वितर पढने का सही तरीका
वितर की नमाज का सही सुन्नत तरीका / तहाज्जुद और वितर पढने का सही तरीका
वितर की नमाज रात की आखरी नमाज होनी चाहिएः
नबी (ﷺ) ने फरमाया, "जो शख्स आखीर रात में ना उठ सके (तहाज्जुद को ना उठ सके) तो वो शुरु रात में (इशा के बाद) वितर पढ ले और जो आखीर रात में उठ सके वो आखीर रात वितर पढे क्युंके आखरी रात की नमाज बहेतरीन है" (सहीह मुस्लीम-७५५)
पता चला के वितर रात की आखरी नमाज होनी चाहिए। जो शख्स तहाज्जुद मे उठना चाहता है तो वो तहाज्जद के बाद वितर पढे और जो तहाज्जुद में उठना नही चाहता है तो इशा के बाद ही वितर की नमाज पढ ले।
तहाज्जुद और वितर की कितनी रकाते?
तहाज्जुद की २, ४, ६, या ८ रकात पढ सकते है (२-२ कर के)
वितर की १, ३, ५, ७ या ९ रकाते पढ सकते है। (सुनन अबु दाऊद-१४२२)- ये हदीस सहीह है
हदीसः हजरत आयशा (रजि) से रिवायत है के, रमजान होता या गैर-रमजान, रसुलुल्लाह (ﷺ) (रात की नमाज आम तौर पर) ग्याराह रकात से ज्यादा नही पढते। (पहेले) आप चार रकात पढते और उस नमाज की लंबाई और खुबसुरती को मत पुछीये, फिर आप चार रकात पढते और उस नमाज की लंबाई और खुबसुरती को मत पुछीये, फिर (आखीर) मे आप तिन रकात (वितर) पढते। (सहीह बुखारी-११४७, २०१३, ३५६९)
इस हदीस से साबीत होता है के, रसुलुल्लाह (ﷺ) हमेशा ११ रकात तरावीह पढते थे (८ तरावीह+३वितर), चाहे रमजान होता या गैर-रमजान। इसलिए ज्यादातर वितर की ३ रकात नमाज पढी जाती है।
वितर की नमाज का सही सुन्नत तरीका - तहाज्जुद और वितर पढने का सही तरीका
३ रकात वितर पढने का तरीकाः
तिन रकात नमाज २ तरीको से पढी जा सकती है -
१। दो सलाम से तिन रकातः
तकबीर कहे कर हाथ बांधे, २ रकात पढे। २ रकात के बाद कायदा करे, कायदे के बाद २ सलाम करे। फिर १ रकात की नियत से खडे हो, एक रकात पढ कर कायदा करे और सलाम करे। (यानी पहेले २ रकात नमाज पढे फिर १ रकात नमाज पढे) (Ibn Hibbaan (२४३५); Ibn Hajar said in al-Fath (२/४८२) its isnaad is qawiy (strong))
२। एक सलाम से तिन रकातः
तिन रकात की नियत से खडे हो, लगातार तिन रकात नमाज पढे, दुसरी रकात में नही बैठेंगे, तिसरी रकात पढने के बाद कायदा करेंगे और सलाम करेंगे।
हदीसः हजरत आयशा (रजि) फरमाती है की, रसुलुल्लाह (ﷺ) ३ रकात वितर पढते थे और वो आखरी रकात के अलावा किसी रकात मे नही बैठते थे। (al-Nasaai, ३/२३४)
वितर की नमाज का सही सुन्नत तरीका तहाज्जुद और वितर पढने का सही तरीका
दुआ-ए-कुनुत पढनाः
दुआ-ए-कुनुत दो तरहा से पढी जा सकती हैः
१। रुकु से पहेलेः
दुआ-ए-कुनुत आखरी रकात में पढी जाएगी। सुरे फातेहा के बाद एक सुरा मिलाले और फिर दुआए-कुनुत (या दुआए-कुनुत नाûजीला) पढे। फिर रुकू कर के सजदा करे। दोनो एक साथ भी पढी जा सकती है। (सहीह बुखारी-१००२)
२। रुकु के बादः
आखरी रकात में सुरे फातेहा के बाद कोई भी सुरा पढ कर रुकु में जाए, रुकु से उठ कर (समीअल्लाहु लिमन-हमीदाह) पढ कर दुआ-ए-कुनुत (या दुआए-कुनुत नाûजीला) पढे। और दुआ पढने के बाद सिधे सजदे में जाए।
(नोटः रुकु के बाद दुआए कुनुत पढने वाली सब रिवायते जईफ है, इसलिए रुकू से पहेले दुआ-ए-कुनुत पढना चाहिए)
दुआ-ए-कुनुत
दुआ-ए-कुनुत नाजीला
नोटः
१। दुआ-ए-कुनुत वितर की नमाज मे पढना जरूरी नही है। लेकीन पढ ली जाए तो अच्छी बात है, ना पढे तो कोई नुकसान नही है।
२। दुआ-ए-कुनुत पढते वक्त दुआ के लिए जिस तरहा हाथ उठाए जाते है उस तरहा नमाज में हाथ उठा सकते है। या फिर हाथ बांध कर भी दुआ-ए-कुनुत पढी जा सकती है।
३। दुआ-ए-कुनुत से पहेले अल्लाहु अकबर कहे कर हाथ उठाना किसी भी सहीह या जईफ हदीस से साबीत नही है।
४। हदीसः वितर की नमाज को मगरीब की तरहा पढना मना है।
सलातुल तस्बीह नमाज पढने का सही तरीका
सलातुल तस्बीह नमाज हो सके तो रोज पढे, अगर ना हो सके तो जुमा के दिन पढे, अगर ये भी ना हो सके तो महिने मे एक बार पढे, अगर ये भी ना हो सके तो साल में एक बार पढे, और अगर ये भी ना हो सके तो जिंदगी में एक बार जरूर पढे।
तस्बीह
चार रकात नफील नमाज की दिल में नियत करे। हर रकात मे सुरे फातेहा और एक सुरा पढे, फिर कयाम मे (रुकु से पहेले) १५ बार ये ही कलमा (तस्बीह) पढेंगे। फिर रुकू मे जाने के बाद ये ही कलमा १० बार पढेंगे। फिर रुके से उठने के बाद ये ही कलमा १० बार पढेंगे। फिर सजदे मे १० बार, फिर जलसे मे १० बार और दुसरे सजदे मे १० बार यही कलमा पढेंगे । दुसरे सजदे से उठने के बाद दुसरे जलसे में १० बार ये कलमा पढेंगे। इसतरहा १ रकात मे ७५ बार तो चार रकातो मे ३०० बार यही कलमा पढा जाएगा। (सुनन अबी दाऊद-१२९७, तिरमीजी-४८१, इब्ने माजा-१३८६)
सलातुल तस्बीह नमाज पढने की फजीलतः
सलातुल तस्बीह पढने वाले के गुनाह माफ कर दिए जाते है, पहेले और आखरी, पुराने और नये, जानबुछ कर और अंजाने में, छोटे और बडे, जाहीरी और बातनी। (सुनन अबी दाऊद-१२९७)
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