तलाक के मुकम्मल मसाईल

 

तलाक के मुकम्मल मसाईल

१।    इस्लाम मे तलाक जायज है लेकीन नापसंदीदा अमल है।

२।    इस्लाम ने तलाक से पहेले मियाँ बिवी को अपनी गलती सुधारने का मौका दिया है। जैसा के शोहर अपनी बिवी की किसी गलती को माफ करे ये सोच कर के इस में ये एक खामी है लेकीन बाकी तो बहोत सारी अच्छाईया भी है ना। फिर भी बात नही बनती तो उसे बैद कर समझाए यानी उसे नसीहत करे। फिर भी बात नही बनती तो उस से बिस्तर अलग कर दे। फिर भी बात नही बनती तो उसे बहोत हलकी मार मारे (चेहरे पर ना मारे ना ही उस के जिस्म पर कोई निशान आए)। फिर भी बात नही बने तो लडकी और लडके वालो की तरफ से एक-एक इंसाफ पसंद शख्स को बुला कर बात की जाए। हो सकता है अल्लाह कोई नया रास्ता निकाल दे। अगर इस में भी बात नही बनी तो तलाक के बारे मे सोचा जा सकता है।

३।    सुरे बकरा, आयत नं.२२९ में अल्लाह तआला फरमाता है के "तलाक दो मरतबा है फिर या तो अच्छे तरीके से रोकना है या एहसान के साथ छोड देना है।

४।    तलाक देने का शरई तरीका निचे की तरहा हैः

सुरे तलाक (६५), आयत नं.१ में अल्लाह तआला फरमाता है के औरत को इदत की आगाज में तलाक दो। यानी जब वो नापाकी से पाक होती है तो उस के शुरूवात के पाकी के दिन में ही तलाक दे जिस में उस के शोहर ने उस से हमबिस्तरी ना की हो।

तलाक एक ही दे (एक साथ तीन ना दे)।

पहेला तलाकः एक तलाक देने के बाद उस की इदत गुजरने से पहेले पहेले अगर शोहर ने उसे रुजु कर लिया तो उसे दोबारा निकाह नही करना होगा। और अगर इदत गुजर गई फिर भी शोहर ने रुजु नही किया तो अब उसे उस की बिवी से नया निकाह करना होगा नए महेर के साथ।

दुसरा तलाकः इसी तरहा से अगर दुसरा तलाक दे दिया तो भी वही उसुल लागु होगा। यानी वो इदत गुजरने के पहेले रुजु कर सकता है। लेकीन अगर इदत गुजरजाने तक भी रुजू नही किया तो उसे नया निकाह करना होगा नए महेर के साथ।

तिसरा तलाकः अब अगर तिसरा तलाक दे दिया तो वो औरत उस के लिए हराम हो गया। अब वो शरई हलाला के बगैर उस के साथ निकाह नही कर सकता।

५।    तिन (३) तलाक देने के बाद निकाह खत्म हो जाता है। चाहे एक साथ दे या एक-एक कर के जींदगी मे कभी भी दे। ये साहबा इकराम का मसला है के एक बार मे दी गई ३ तलाके ३ ही होगी। इसी पर चारो इमाम भी इत्तेफाक (राजी, agree) रखते है। लेकीन अगर एक तलाक देने का इरादा था और तिन तलाक दे दी तो एक तलाक ही मानी जाएगी।

हुजुर () के जमाने अकदस मे, सहाबा के जमाने में, हजरत अबुबकर (रजि) के पुरे दौरे खिलाफत में और हजरत उमर (रजि) के दौरे खिलाफत के शुरावाती ३ सालो में तीन तलाक को एक ही माना जाता था। लेकीन हजरत उमर फारूक (रजि) के दौरे खिलाफत में लोगो ने तलाक का मजाक बना कर रखा था इसलिए उन को सजा देने के तौर पर उमर फारूक  (रजि) ने ३ तलाक को ३ ही तलाक माना जाए एैसा हुकूम जारी किया था। लेहाजा उमर फारूक  (रजि) का जो फैसला था वो कानुनी फैसला था ना के शरई फैसला था।

६।    तीन बार तलाक देने के बाद मिया बीवी हलाला के बगैर एक दुसरे के साथ नही रह सकते। उन पर साथ मे रहना और हमबिस्तरी करना हराम हो जाता है।

७।    तलका दो लफ्जों से होता है १) लफ्जे सरीह (लपजे तलाक), २) लफ्जे किनाया। लफ्जे सरीह का मतलब ये है के, "तलाक" लफ्ज़ का इस्तेमाल कर के तलाक देना। और लफ्जे किनाया का मतलब ये है के "तलाक" लफ्ज़ के अलावा किसी दुसरे लपज का इस्तेमाल करना। (लफ्ज़ = word, शब्द)

मिसाल के तौर पे -

अगर शोहर तलाक देने के इरादे से बोले के "जा, दफा हो जा, मै ने तुझे छोड दिया,जा चली जा, निकल जा मेरे घर से, मैने तुझे आजाद कर दिया, वगैरा"। इस तरहा के अल्फाज लफ्जे किनाया होते है। इन लफ्जों से भी तलाक हो जाती है लेकीन उस का इरादा तलाक देने का था या नही ये देखा जाएगा। लफ्जे किनाया से एक (१) तलाक वाक्य होगी।

८।    लफ्जे सरीह और लफ्जे किनाया से कैसे तलाक होती है?

अगर लफ्जे सरीह यानी "तलाक" लफ्ज़ १ या २ बार इस्तेमाल किया जाए तो इस से निकाह नही टुटता लेकीन इदत शुरू हो जाती है। इस इदत के दौरान शोहर बिवी से रुजु कर सकता है। लेकीन अगर इदत खत्म हो गई (यानी ३ हैज गुजर गए) फिर भी रुजु नही किया तो अब उस का निकाह टुट गया और उसे दोबारा निकाह करना होगा और नया महेर देना होगा।

अगर लफ्जे किनाया १ या २ बार इस्तेमाल किया जाए तो इस से निकाह फौरन टुट जाएगा और इदत शुरू हो जाएगी, अब वो अपनी बीवी से रुजु नही कर सकता जब तक के उस से दोबारा निकाह ना कर ले। निकाह किये बगैर रुजू करना हराम है। निकाह करने के बाद इदत के दौरान भी रुजू कर सकता है। अगर लफ्जे किनाया की वजह से तलाक हो जाए तो हलाला किये बगैर निकाह कर सकता है।

९।    "मै तुम्हे छोडता हुँ" ये सरीह लफ्ज़ है जिस मे शोहर तलाक की नियत करे ना करे तलाक हो जाएगी।

१०।   अगर शोहर कहे "जा, मै तुझे छोडता हुँ"। यहाँ "जा" लफ्ज़ लफ्जे-किनाया है और "मै तुम्हे छोडता हुँ" लफ्जे-सरीह हुआ। अगर "जा" लफ्ज़ तलाक की नियत से कहा तो एक तलाक हुआ और अगर तलाक की नियत से नही कहा तो तलाक नही हुआ। यहा लफ्जे-सरीह की वजह से एक तलाक हुआ। लफ्जे किनाया के तालुक से शोहर से पुछना जरुरी है के उस की नियत क्या थी। अगर तलाक की नियत थी तो दोनो लफ्ज़ आपस में मिलेंगे और दो (२) तलाके पडेंगी। और अगर तलाक की नियत नही थी तो सिर्फ लफ्जे-सरीह की वजाह से एक तलाक हुआ।

११।   तलाक देते वक्त बिवी का या किसी गवाह का शोहर के सामने मौजुद होने जरूरी नही है। फोन पर, एस।एम।एस।, इ-मेल, खत वगैरा से भी तलाक हो जाती है। और मजाक में भी तलाक हो जाती है।

१२।   अगर कोई मर्द दुसरी शादी करने के लिए झुद इस तरहा कहे के "मैने पहिली बिवी को छोड दिया" तो पहिली बिवी के साथ इस का एक तलाक हो गया। क्योंकी "छोड दिया" सरीह लफ्ज़ है। अब उस औरत की इदत शुरू हुई। अब अगर इदत के दौरान उस ने उस औरत से रुजु किया तो उस का निकाह बच गया। और अगर इदत खत्म होने तक भी रुजु नही किया तो उस का निकाह पहिली वाली से खत्म हो गया। अब उन को दोबारा निकाह करना होगा। इसी तरहा से दुसरी औरत को झूट कहा था इसलिए झूट बोलने का भी उस मर्द को गुनाह मिलेगा।

१३।   रुजु कैसे करेः रुजु की दो किसमे है - १) रुजु-बिल-कौल और २) रुजु-बिल-फेल।

रुजु-बिल-कौल - आमने सामने या फोन पर बीवी को बोल दे के "मैने तुम्हे जो तलाक दे दी थी तो मै उस से रुजु करता हुँ" इस तरहा कहने पर रुजु हो जाएगा। अगर बीवी से मुखातीब ना हो तो कोई दो गवाह बनाकर उन से कह दे के "मै ने अपनी बीवी को जो तलाक दी थी तो मै अपनी बीवी से रुजु करता हुँ"। वो दो गवाह उस की बीवी को बाद मे जा कर कह दे।

रुजु-बिल-फेल - बीवी के साथ कोई एैसा काम करना जो एक शोहर ही अपने बीवी के साथ कर सकता है, दुसरा कोई मर्द नही कर सकता। इस से मुराद जिस्मानी तालुक है। चाहे पुरा जिस्मानी तालुक करे या थोडा।

१४।   इदत का वक्त तिन बार महावारी (period) आ कर गुजर जाना है। हामेला (प्रेगनेन्ट) औरत की इदत बच्चा पैदा होने तक की है।

१५।   लोगो मे गलतफहेमी ये पाई जाती है के शोहर अगर बीवी से चार महिने दुर रहा तो निकाह खत्म हो जाता है। अगर मिया बीवी दोनो राजी है तो दोनो कितने भी दिन एक दुसरे से अलग रहे सकते है इस से उन का निकाह खत्म नही होता। हां, अगर बीवी राजी नही है तो आप उस की मर्जी के बगैर नही जा सकते।

१६।   चार महिने से ज्यादा अलग रहने को और बीवी से चार महिनो तक मुबाशेरत (जिस्मानी तालुकात) ना करने को फुकहा ने मना किया है क्योंकी औरत मे चार महिना ही सब्र करने की ताकत होती है। हûजरत उमर (रजी) ने शादीशुदा फौजियो को चार महिनो बाद घर जाने की इजाजत दी थी।

१७।   अगर किसी वजह से शोहर कसम खा ले की "मैं चार महिनो तक अपनी बीवी से जिस्मानी तालुक नही करूंगा" (कसम खाने को -इला- कहते है)। अगर कसम तोड दे तो उसे कफ्फारा (दंड, penalty) देना होगा। अगर कसम ना तोडे और चार महिने गुजर जाए तो एक तलाके बाईन पड जाएगी और वो औरत इस के निकाह से निकल जाएगी। चुंकी कसम की मुदत चार महिने थी इसलिए कसम खत्म हो जाएगी। इदत के बाद उस आदमी को दोबारा निकाह करना होगा।

 

अगर शोहर ने एैसी कसम खाई थी के "मैं तेरे पास कभी नही आऊंगा या मै तुझ से अब तालुक कायम नही करूंगा" या शोहर ने कोई मुदत नही दी। इस मे भी अगर वो शख्स चार महिने के अंदर अगर कसम तोड देता है (यानी बीवी से तालुक करता है) तो उस पर कसम तोडने का कफ्फारा होगा। और चार महिने के अंदर अगर बीवी से तालुक कायम नही किया तो उस का निकाह टुट गया और उस की कसम कायम रहेगी। अगर वो बीवी से निकाह कर के रुजु होता है तब भी कसम कायम है। अब इस ने दोबारा निकाह करने के बाद चार महिने के अंदर तालुक कायम कर दिया तो कसम टुट जाएगी और कपफरा अदा करना पडेगा। लेकीन अगर दोबारा निकाह करने के बाद फिर चार महिने तक तालुक कायम नही किया तो चार महिने गुजरने के बाद दुसरा तलाक पड जाएगा। इसी तरहा से दुसरी बार निकाह करने के बाद अगर चार महिने के अंदर तुलाक कायम किया तो कसम टुट जाएगी और कपफारा अदा करना पडेगा। लेकीन अगर चार महिने तक कोई तालुक कायम नही किया तो तिसरी तलाक पड जाएगी। तिन तलाक होने की वजह से उस की बीवी उस पर हराम हो जाएगी।

कफ्फारा कैसे दे? - १) या तो गुलाम आजाद करे, २) या १० मिस्कीनो को पेट भर के २ वक्त खाना खिला दे, ३) या १० मिस्कीनो को औसत दर्जे का जोडा पहेना दे। अगर इतना गरीब है के तिनो मे से कोई भी चिज नही कर सकता तो उस को शरीयत ने इजाजत दी है के वो लगातार ३ रोजे रखे तो कफ्फारा हो जाएगा)

१८।   नाराज हो कर या किसी मजबुरी की वजह से (बगैर कसम खाए) कोई शोहर अपने बीवी से १० साल भी दुर रहेगा तो कोई तलाक का पहेलु नही है। 

१९।   जिहारः जिहार की तारीफ ये है के, "इंसान अपनी बीवी को अपने उन मेहरम औरतो के किसी उज्र (जिस्म का हिस्सा) से तशबीह (बराबरी) दे दे के जिस उज्र की तरफ देखना हमेशा के लिए हराम है"। मिसाल से समझीए - जो औरते मर्द के लिए महेरम है उन की पिद देखना मर्द के लिए हराम है। अगर मर्द अपनी बीवी से कह दे की तेरी पिद मेरी फला फला (मां, बहेन, चाची, खाला वगैरा) जैसी है तो जिहार साबीत हो जाएगा। यानी मेहरम औरत के जिस्म का कोई भी हिस्सा देख ले जो देखाना हराम है और गुस्से मे या कोई भी हालात मे उस को अपनी बीवी के जैसा कहे दे तो जिहार साबीत हो जाएगा। अगर जिहार साबीत हो जाए तो वो औरत उस आदमी के लिए तब तक हराम होगी जब तक के वो कपफारा ना दे। कफ्फारा कैसे दे? १) या एक गुलाम आजाद करे, २) या दोन महिने के लगातार रोजे रखे, ३) या ६० मिस्कीनो को खाना खिलाए)। जब तक कपफारा ना दे इस की बीवी इस पर हराम है। अगर रोजो के दरम्यान इस ने बीवी से तालुक किया तो रखे हुए रोज इस के चले गए, इस को दोबारा रोजे रखने पडेंगे। कफ्फारा की आयत कुरआन शरीफ मे मौजुद है। कफ्फारा अदा करने के बाद ही औरत उस पर हलाल होगी। अगर कोई इसे ना माने ते उन के लिए दर्दनाक अजाब है।

२०।   अगर कोई शख्स अपने बीवी को माँ या बहेन कहे दे "जैसा के तु आज से मेरी माँ है, बहेन है" तो ना तलाक हुआ ना जिहार। अगर इस तरहा कहे दे के, "तु मेरी मा जैसी है" तो जिहार होगा।

२१।   खुलाः औरत अपने शोहर से खुद तलाक चाहे उसे खुला लेना कहते है। अगर कोई शरई मसला है तो बीवी को खुला लेनी की इजाûजत है। औरत खुला के लिए दारुल कझा के दफ्तर मे काझी के पास जा सकती है और खुला मांग सकती है।

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