सजदा-ए-तिलावत और सजदा-ए-शुक्र
सजदा-ए-तिलावत और सजदा-ए-शुक्र
सजदा-ए-तिलावतः
१। सजदा-ए-तिलावत उस सजदे को कहते है जो कुरआन मे सजदे की आयत पढने के बाद करते है। इसे शरीयत ने मुस्तहब (पसंदीदा) दर्जे पर रखा है। सजदा-ए-तिलावत फर्ज नही है बल्की सुन्नत है।
२। इब्ने उमर (रजि) रिवायत करते है की, जब रसुलुल्लाह (ﷺ) किसी सुराह की तिलावत करते जिस में सजदा होता तो वो सजदे में चले जाते और हम भी वही करते और हम में से कुछ को जगह नही मिलती थी (सहीह बुखारी, हदीस-१०७९)
३। रबिया (रजि) रिवायत करती है की, उमर बिन अल-खत्ताब ने जुमा के दिन मिम्बर पर सुरे नहल की तिलावत की और जब वो सजदा की आयत पे पहोचे तो वो मिम्बर से उतर कर सजदा किया और साथ में लोगो ने भी किया। अगले जुमा के दिन उमर बिन अल-खत्ताब ने उसी सुराह की तिलावत की और जब वो आयते सजदा पे पहोचे तो उन्हो ने कहा, "एै लोगो! जब हम सजदा की आयत तिलावत करते है, जो सजदा करता है वो सही करता है, फिर भी जो सजदा नही करता है उस के उपर कोई गुनाह नही है। और उमर (रजि) ने (उस दिन) सजदा नही किया। उन्हो ने कहा "अल्लाह ने तिलावत के सजदे को फर्ज नही किया है लेकीन अगर कोई चाहे तो वो कर सकता है" (सहीह बुखारी-१८३)
४। सजदा तिलावत मे वही पढना चाहिए (सुब्हाना रब्बीयलआला) जो हम नमाज में सजदे में पढते है।
५। सजदा तिलावत करने से पहेले मुंह से कुछ बोलने की जरूरत नही है, दिल में नियत होना काफी है।
६। सजदे की आयत का तरजुमा पढते वक्त सजदा करने की जरूरत नही है। और अगर कोई सजदे की आयत याद कर रहा हो तो उस के लिए एक बार ही सजदा कर लेना काफी है, या फिर ना भी करे तो कोई गुनाह नही है।
सजदा-ए-शुक्रः
१। सजदा-ए-शुक्र किसी खुशी के मिलने पर या कोई गम टालने पर या जब दिल खुशी महेसुस करे उस हाल मे करना चाहिए।
२। अबुबकर (रजि) रिवायत करते है की, जब भी कोई चिज रसुलुल्लाह (ﷺ) के पास आती जिस से वो खुश होते तो वो अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए सजदा करते (सुनन अबु दाऊद, बुक आùफ जिहाद, हदीस-२७६८)
३। सजदा शुक्र मे वही पढना चाहिए (सुब्हाना रब्बीयलआला) जो हम नमाज में सजदे में पढते है।
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