साहबा.. ताबयीन... तबे-ताबयीन... मोहदसीन. हुजुर की हदीस पहले ३०० साल के बारे में

 

साहबा (साहबी की जमा)

रसुलुल्लाह () के हयाते मुबारका मे जिन लोगे ने आप () को देखा, या उनसे मिले, या उनसे बाते की, और इमान की हालत मे जिंदा रहे और इमान की हालत मे ही इंतेकाल कर गये उन लोगो को सहाबा (या सहाबा किराम) कहते है। सहाबी के नाम के आगे एक दुआ "रजि-अल्लाह-तआला-अन्हो" लगाई जाती है।

 

ताबयीन

रसुलुल्लाह () की वफात के बाद जो जमाना आया वो ताबयीन का आया। ताबयीन वो है जो इमान की हालत मे जिंदा रहे और इमान की हालत मे ही इंतेकाल कर गये ।

 

 

तबे-ताबयीन

ताबयीन के बाद जो जमाना आया वो तबे-ताबयीन का आया। वो लोग जिन्हो ने कम से कम एक ताबयीन को देखा, जो इमान की हालत मे जिंदा रहे और इमान की हालत मे ही इंतेकाल कर गये उन्हे ताबयीन कहते है।

 

मोहदसीन

हदीस लिखने वाले को मोहदसीन कहते है।

 

हुजुर की हदीस पहले ३०० साल के बारे में

Abdullah hin masood Radi allahu anhu se rivayat hai ki Rasoollallah sallallahu alaihi wasallam ne farmaya Sabse behtar mera zamana hai uske baad un logo ka jo uske baad aayenge aur phir (unka) jo uske baad aayenge aur uske ke baad aise log paida ho jayenge jo qasasm se pahle gawahi denge aur kabhi gawahi se pahle qasam khayenge
(Sahih Bukhari, Vol 7, 6429)

_नोट_ - पहेले १०० साल सहाबा के, उस के बाद के १०० साल ताबायीन के, उस के बाद के १०० साल तबे-ताबयीन के माने जाते है

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