विरासत के तकसीम का तरीका

 

विरासत के तकसीम का तरीका

१।    वसीयत का तालुक मरने के बाद होता है और तोहफे का तालुक है जींदगी मे होता है।

२।    विरासत बांटने से पहेले फौतशुदा (मरे हुए, dead) पर अगर कोई कûर्जा हो तो उसे अदा किया जाए और फिर कोई वसीयत की है तो उसे भी अदा किया जाए, फिर विरासत बांटी जाए। औरत का महेर भी कर्जे मे शामील है। कûर्जा एैसी चिज है के शहीद का भी माफ नही होता। विरासत की तकसीम जल्द से जल्द की जाए। कर्जो की अदाईगी मे अगर पुरा माल और जायदाद भी खर्च करना पडे तो भी कर्जो की अदाएगी करना जरूरी है। जब तक कर्जे की अदाईगी बाकी रहेगी मरने वाले की रुह को जन्नत मे दाखील होने से रोक दिया जाएगा।

३।    मरने वाले ने अगर कोई जायûज वसीयत की है तो उस के माल और जायदाद मे से १/३ हिस्से की हद तक इन वसीयतो को पुरा किया जाएगा। अगर वसीयत नाजायûज है तो इस को पुरा करना जरूरी नही।

४।    कुरआन-ए-करीम मे सुरतुन्नीसा मे अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है

लडके का हिस्सा दो लडकीयो के बराब है।

अगर बेटीया ही बेटीया हो और दो या दो से ज्यादा हो तो उन को २/३ हिस्सा मिलेगा।

अगर एक ही बेटी है तो उसे आधा हिस्सा मिलेगा।

बेटा एक ही है (कोई लडकी नही है) तो उसे पुरा हिस्सा मिलेगा।

१/६ हिस्सा मां को और १/६ हिस्सा बाप को मिलेगा।

अगर उस की कोई औलाद ही नही है और मां-बाप ही उसके वारीस है तो मां को १/३ और बाप को बाकी सारा हिस्सा मिलेगा।

अगर उसके बहेन भाई है तो मां का हिस्सा और कम हो जाएगा।

बीवी मर चुकी है और उस से कोई औलाद नही है तो उस के हिस्से का आधा हिस्सा शोहर का होंगा। बाकी का आधा बीवी के भाईयो वगैरा को जाएगा। और अगर उस की औलाद है तो शोहर के लिए १/४ हिस्सा होगा और बाकी ३/४ औलाद मे बांटा जाएगा।

अगर मर्द मर जाए और उस को औलाद नही है तो उस की विरासत मे उसकी बिवीयो का १/४ हिस्सा है, और औलादे है तो बिवीयो के लिए १/८ वा हिस्सा है।

अगर किसी मर्द को मां-बाप, बीवी और बच्चे नही है तो उस के वारीस उस के भाई और बहेन होंगे। अगर १ बहेन और १ भाई है तो हर एक को पुरी रकम का १/६ हिस्सा मिलेगा। अगर सिर्फ १ ही बहेन है तो उस को आधा हिस्सा मिलेगा। अगर १ भाई और ज्यादा बहने है तो भाई का हिस्सा बहेन से डबल (दो गुना) होगा। अगर बहेन या भाई १ से ज्यादा है तो सब को मिलाकर १/३ हिस्सा मिलेगा और बाकी २/३ कहा जाएगा इसके उपर अलग अलग उलमा ने अलग अलग राय दी है और इस पर बहोत सारी किताबे छपी है। अगर किसी औरत को मां-बाप, शोहर और बच्चे ना हो और एक ही भाई हो तो उस की पुरी जायदाद का वारीस उस का भाई होगा।

अगर बेटा है तो उस शख्स के वारीस उस के मां-बाप, बीवी/शोहर और औलाद होंगे। अगर लडका नही है और सिर्फ बेटीया है तो उस के वारीस मां-बाप, बीवी/शोहर, औलाद और उस के भाई-बहेन होंगे।

कोई शख्स हयाती में (जिंदगी मे) अपने बच्चो मे पैसा या कोई चिज बांटना चाहता हो (जिसे तोहफा देना कहते है) तो बेटा और बेटी का हिस्सा बराबर का होगा। मिसाल के तौर पे - अगर किसी बाप ने अपनी बेटी को जहेज मे ४ लाख रुपये का सोना दे दिया तो उस पर ये वाजीब होगा के वो उतनी ही रकम अपने बाकी बेटो को भी दे। इसी तरहा वालीद अपने बेटे की कोई प्रोब्लेम की वजह से २ लाख रुपये देता है तो उस पर वाजीब होगा के अपने दुसरे बच्चो को भी इतनी ही रकम दे दे। अगर बाकीयो ने अपने मर्जी से माफ कर दिया तो अलग बात है।

अगर वालीद वसीयत करे के, मेरे मरने के बाद मेरे फला फला बेटा या बेटी को जायदाद मे से कोई हिस्सा ना मिले तो एैसी वसीयत जायûज नही। विरासत जो बांटी जा रही है वो अल्लाह की तरफ से है लेहाजा अल्लाह के उसुल को कोई बदल नही सकता। 


५।    विरासत बांटने का तरीकाः विरासत बांटने का तरीका ये है के, मां-बाप और बीवी/शोहर को पुरे माल मे से हिस्सा दिया जाए और इनका हिस्सा निकालने के बाद बचे हुए माल मे से बाकी वारीसो को हिस्सा दिया जाए।

मिसाल के तौर पेः कोई शख्स १ लाख २० हजार रुपये छोड कर मर गए। उस मे से १० हजार का कर्ज देना है और १० हजार रुपये की उस ने वसीयत भी की हुई है के मेरे मरने के बाद फलाह मस्जीद मे या फलाह आदमी को मेरे माल मे से १० हजार रुपये दिए जाए। तो पहेले १० हजार रुपये कर्ज और १० हजार रुपयो की वसीयत को पुरा करना होगा। अब १ लाख रुपये बचे। अब मां-बाप को पुरे माल मे से १/६ हिस्सा मिलेगा - यानी मां को १६,६६७/- रुपये और बाप को भी १६,६६७/- रुपये मिलेंगे (१/६x१०००००)। अब बीवी/शोहर को पुरे माल मे से १/८ हिस्सा मिलेगा - यानी १२५००/- रुपये मिलेंगा (१/८x१०००००)। अगर दो बीवीया है तो १२५००/- के दो हिस्से कर दे। अब ५४१६६/- रुपये बचे। बचे हुए पैसे बाकी औलादो मे तकसीम होंगे। फर्ज किजीए उस के २ बेटे और ३ बेटीया है। तो बची हुई रकम ५४१६६/- के ७ हिस्से होंगे। तो एक लडकी को ७७३८/- रुपये और एक लडके को १५४७६/- रुपये मिलेंगे। (५४१६६/७ = ७७३८ और ७७३८ x २ = १५४७६)

६।    बेटा और बेटी को बराबर हिस्सा देना मुस्तहब (पसंद किया जाने वाले अमल) है।

७।    चिûजे देने से बेटीयो का विरासत मे हिस्सा खत्म नही हो जाता।

८।    किसी एक बच्चे को सब कुछ दे दिया और दुसरे को महरूम रख दिया तो इस्लाम ने इसको जुल्म करार दिया है। और जुल्म गुनाह है जो अल्लाह को ना पसंद है। एक हदीस मे हुजुर () ने इरशाद फरमाया "जिस शख्स ने वारीस को विरासत से महेरूम कर दिया तो अल्लाह तआला इस को जन्नत मे इस के हिस्से से महेरूम कर देगा"। 

९।    जु ही किसी शख्स का इंतेकाल होता है तो इंतेकाल होते ही इस की विरासत का तमाम माल इस की मिलकीयत से निकल कर वारीसो की मिलकीयत मे दाखील हो जाता है और तमाम वारीस इस के मालीक बन जाते है। यहा तक के सुई धागे मे भी तमाम वारीस शरीक हो जाते है।

अगर तमाम वारीस बालीग और अकल वाले है और वो सब अपने खुशी से किसी एक वारीस को मरने वाले का सामान इस्तेमाल करने की इजाजत दे तब इस को सामान इस्तेमाल करना जायûज है। 

अगर एक भी वारीस सामान इस्तेमाल करने की इजाûजत नही देता, या कोई वारीस मौजुद नही है बल्की घर से लापता है (जिसकी रजामंदी का हमे इल्म नही), या कोई वारीस नाबालीग है (जिस की रजामंदी का एतेबार नही) एैसी सुरतो मे मरने वाले का माल किसी शख्स के लिए यहा तक के वारीसो के लिए इस्तेमाल मे लाना नाजायज और हराम है।

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