दर्गाह एक बिझनेस है
दर्गाह एक बिझनेस है
जिस तरहा हिंदु लोगो के लिए मंदिर एक बिझनेस है उसी तरहा कुछ कबर परस्त लोगो के लिए दर्गाह एक कभी ना बंद होने वाला बिझनेस है। जितना दर्गाह का नाम उतनी कमाई। कई बडे बडे मंदिर और दर्गाहो का लाखो-करोडो का टर्नओवर होता है, मिसाल के तौर पर साईबाबा मंदिर और अजमेर दर्गाह।
एक अच्छे बिझने को लिए investment (पैसा लगाना) और publicity (प्रचार) की जरूरत होती है।
Investment (पैसा लगाना)
दर्गाह पर खुप पैसा लगाया जाता है। झुमर, टाईल्स, सोने के कलश, आयने की दिवारे, नक्शी निगार, फुल, चादर, डेकोरेशन वगैरा।
Publicity (प्रचार)
दर्गाह की पब्लीसीटी के लिए बुजुर्ग के नाम से घडे गए किस्से कहानिया काफी होते है। कव्वाली भी अहम किरदार निभाती है। कुछ कसर दर्गाह में मौजुद जिन्नात अजीब व गरीब करामत बता कर पुरी कर देते है।
Management (व्यवस्थापन)
दर्गाह की देखभाल के लिए दर्गाह कमिटी बनाई जाती है। लोगो से चंदे की सुरत मिला हुआ पैसे कमिटी के मेंबरान को जाता है। दर्गाह की कमिटी को दर्गाह पर आने वाले लोगो से ढेर सारा पैसा मिलते रहता है।
ये कमिटी हर साल मुजावर को एक साल दर्गाह की खिदमत करने का और पैसा कमाने का मौका देती है।
मुजावर (Mujawar)
मुजावर फुल-चादर-शिरणी वालो से सेंटींग करते है। फुल चादर वाले महेंगे दामो में लोगो को फुल-शिर्णी-चादर बेचते है। मुजावर इस चादर को दर्गाह पर डालते है। फातेहा के नाम पर भी देणगी वसुल करते है। थोडी ही देर बाद चादर को मजार से निकाल कर अलग रखते है और बाद में वही चादर फिर से फुल-शिर्णी के दुकानदार को बेच देते है। दर्गाह में मौजुद चंदा पेटी का चंदा भी मुजावर को मिलता है। इसी तरहा से दर्गाह पर हाजरी देने वालो लोगो को नाडा और तावीज दे कर भी अच्छी कमाई कमाई जाती है।
इसी तरहा से जब संदल और उरूस का वक्त आता है, ये मुजावर के लिए बहोत बडा कमाई का दिन होता है। मुजावर इस दिन जितने भी भेट दर्गाह को मिलते है (चादर, फुल, पैसे, शिरणी, चावल, तेल, शक्कर, नारीयल वगैरा) सब जमा कर के बेच देता है।
फिर उरूस खत्म होने के बाद इस मुजावर का एक साल का contract खतम होता है और दुसरा मुजावर appoint किया जाता है एक साल के लिए।
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