औलिया अल्लाह (अल्लाह के वली)

 

औलिया अल्लाह (अल्लाह के वली)

 

वली का मतलब होता है अल्लाह का दोस्त।

हिंदु लोगो में मशहुर है के, रिशीमुनी सब छोड छाड कर एकांत में भगवान की प्रार्थना करते थे, फिर कई सालो की तपस्या के बाद भगवान उन से खुश हो कर उन्हे पाùवर दे देता है। कुरआन और हदीस का इल्म नही होने की वजह से हमारे मुसलमान भाई और बहेन भी यही अकिदा वलीयो के बारे में रखते है। वली बन्ने के लिए कोई स्पेशल इबादत या फजीफो की जरूरत नही होती। वली तो हर कोई बन सकता है लेकीन उस के लिए ईमान, फर्ज व नफील की अदाईगी, हराम से बचना, तकवा और परहेजगारी और हुजुर के रास्ते पर चलना शर्त है।

 

कोई नही बता सकता अल्लाह का वली कौन ही

वली अल्लाह का दोस्त होता है। क्या कोई अंजान इंसान बता सकता है के आप के कौन-कौन दोस्त है, नही ना। इसी तरहा से कोई इंसान नही बता सकता के फलाह शख्स या फलाह बुजुर्ग अल्लाह के वली है।

 

हम ने किन लोगो को वली समझ लिया

जु ही वली का नाम आए तो लोगो के ûजहेनो में कुछ हस्तीया आ जाती है। पहेले तो हम ने अपने दिल से फैसला कर दिया के फलाह बुजुर्ग अल्लाह के वली है और तो और उन की दर्गाह भी बना ली। दर्गाह बनाना वैसे भी इस्लाम में मना है।

कुछ कबरे तो एैसी भी है जीन मे कोई भी इंसान दफन नही और कुछ कबरे तो घोडे, तोते, हाथी और कबुतरो की भी है। इन को भी हम अल्लाह के वली समझ बैठे है। उन के नाम भी अजीब रख दिए जाते है - घोडे शाह, तोते शाह, खंबे शाह, पिर सोते शाह, बेरी-पिर, डंडे वाली सरकार, गैबी पिर, पालकी वाले बाबा, वगैरा-वगैरा

 

अल्लाह के वली बनाने के गलत तरीके

Ø  सब दुनियादारी छोड कर भुखे पेट पहाडो मे या जंगलो मे जा कर इबादत करने वाले

Ø  दिन-रात अल्लाह-अल्लाह करने वाले

Ø  शादी नही करने वाले

Ø  अजीब व गरीब कर्तब और करामत बताने वाले

Ø  सब छोड छाड कर जुनुन में मुबतेला रहने वाले

Ø  हिकमत वाली बाते बताने वाले

Ø  लिबास और जाहीरी इबादत का दिखावा करने वाले

Ø  वली एक स्पेशन डिग्री है जो बहोत महेनत करने वाले को ही मिलती है

Ø  वगैरा

Ø  हम अपने दिल और अपनी मर्जी से फैसला नही कर सकते के वली कौन है, इस के लिए हमे कुरआन व सुन्नत देखना होगा।

 

HADEES SE DALIL

3 aadmi ummuhatul momineen (ra) ki khidmat me haazir hue, aur unhone(parde ke peeche se) nabi akram(sws) ki nafl ibadat ke muttalik sawal kiya, jab unhe bataya gaya ki( aap sws is andaz se ibadat karte hain) to unhone mahsus kiya ki yah ibadat thodi hai, phir unhone kaha: hamara aap(sws) se kya muqabla? Unke to agle pichle gunah maaf ho chuke hain( wah to agar zyada ibadat na bhi karen to koi baat nahi, hame to bahut zyada mahnat karne ki zarurat hai, unme se ek bola: main hamesha namaz(tahajjud) padha karunga; dusre ne kaha: main hamesha roza rakhunga, kisi din naaga nahi karunga; teesre ne kaha: main aurton se alag rahunga, kabhi nikaah nahi karunga; (jab aap(sws) ko in baaton ka ilm huwa to) aap(sws) unke paas tashrif le gaye aur farmaya:

" tum logon ne ye ye Baatein ki hai? Allah ki qasam! Main tum sabse zyada khauf e khuda aur taqwa rakhta hun, lekin main (nafli) roze bhi rakhta hun aur chhod ta bhi hun, (raat ko) namaz (tahajjud) bhi padhta hun aur sota bhi hun, aur maine nikaah bhi kiye hain, to jo mere tariqe pe nahi chalega wo hum se nahi"
(sahih bukhari, kitabunnikah h4774)(sahih muslim, kitabun nikaah, h 1401)

 

पता चला के जो हुजुर के तरीके को छोड दे और अपने तरीके से अल्लाह की इबादत करे वो वली बन ही नही सकता और अल्लाह के रसुल के तरीके पर चलना ही कामयाबी है

 

कुरआन और हदीस किन लोगो को वली कहते है

अल्लाह तआला फरमाता है के, "वो जो इमान लाए और परहेजगारी करते रहे"।

(सुरे युनुस (१०) की आयत नं.-६३)

 

हदीस में आता है के, "जिन का अमल व अकिदा कुरआन है वो अल्लाह के खास बंदे होते है, अल्लाह उन को प्यारे बंदो में शामील कर देता है।

कुरआन से पता चला के अल्लाह के वली मे दो सिफात होती है १) सही अकिदा (इमान) और २) तकवा (हराम से बचना, परहेजगारी)। वो वली नही होगा जिस मे ये दो सिफात ना हो। जिस में ये दो सिफात जिस दर्जे के हो वो उस दर्जे का वली होता है।

 

"और मेरा बंदा जिन जिन इबादतो से मेरा कुर्ब हासील करता है (यानी मेरे करीब आता है) कोई इबादत मुझ को उस से ज्यादा पसंद नही है जो मैने उस पर फर्ज की है। और मेरा बंदा फर्ज अदा करने के बाद नवाफील इबादत कर के मुझ से इतना ज्यादा नजदीक हो जाता है के मैं उस से मोहब्बत करने लगता हुँ।

(Hadees-E-Qudsi : Hadees 25, Sahih al-Bukhari : Hadees 6502, Book ref. : 81, Hadees 91, Eng ref. : Vol. 8, Book 76, Hadees 509)

 

हदीस से पता चला के अल्लाह का वली बन्ने के लिए हमे सब से पहले अल्लाह की फर्ज की हुई इबादत करना जरुरी है और उस के साथ-साथ नफली इबादत करने से अल्लाह हम से मोहब्बत करता है।

 

 

वली कौन-कौन है

अल्लाह के नबी रसुलुल्लाह () नबी भी है और सब से बडे वली भी है, फिर सहाबा इकराम सहाबी भी है और वली भी है, ताबयीन और तबे-ताबयीन भी वली है। इसी तरहा से जो लोग इमान पर हैं और नेक काम करते है वो भी वली है। जो इंसान जितना मुत्तकी उतने बडे दर्जे का वली।

                   

इमाम शाफई फरमाते हैः

इमाम शाफई फरमाते है के, अगर कोई अजीब व गरीब चिज कर के बताए तो इस के धोके में ना आना। उस की जिंदगी किताब और सुन्नत (कुरआन और हदीस) के मुताबीक है या नही ये जाच लेना चाहिए। अगर उस की जिंदगी किताब व सुन्नत के मुताबीक है तो वो कुछ करता है तो करामत है और अगर वो किताब व सुन्नत के मुताबीक जिंदगी नही गुजारता है तो वो वली नही है बल्की धोकेबाज आदमी है।

बाज औकात शैतान और जिन्न उस धोकेबाज आदमी की मदत करते है एैसी अजीब व गरीब चिज करने में।

 

एक हदीस जिस का इस्तेमाल सुन्नी उलमा भोले भाले लोगो को बहेकाने के लिए करते

_उस हदीस का सहीह माना आप समझ लिजीए ताके आप ना बहेके_

हुजुर () इरशाद फरमाते है के अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया "और मेरा बंदा जिन जिन इबादतो से मेरा कुर्ब हासील करता है (यानी मेरे करीब आता है) कोई इबादत मुझ को उस से ज्यादा पसंद नही है जो मैने उस पर फर्ज की है। और मेरा बंदा फर्ज अदा करने के बाद नवाफील इबादत कर के मुझ से इतना ज्यादा नजदीक हो जाता है के मैं उस से मोहब्बत करने लगता हुँ, फिर जब मैं उस से मोहब्बत करने लगता हुँ तो मैं उस का कान बन जाता हुँ जिस से वो सुनता है, उस की आँख बन जाता हुँ जिस से वो देखता है, उस का हाथ बन जाता हुँ जिस से वो पकडता है, उस का पाव बन जाता हुँ जिस से वो चलता है। और अगर मुझ से मांगता है तो मैं उसे देता हुँ, अगर वो किसी दुश्मन या शैतान से मेरी पनाह का तालीब होता है तो मैं उस को महेफुज रखता हुँ और मैं जो काम करना चाहता हुँ उस में मुझे इतना तरददुद (हिचकिचाहट) नही होता जितना की अपने मोमीन बंदे की जान निकालने में होता है वो तो मौत को पसंद नही करता और मुझे भी उस को तकलीफ देना अच्छा नही लगता

(Hadees-E-Qudsi : Hadees 25, Sahih al-Bukhari : Hadees 6502, Book ref. : 81, Hadees 91, Eng ref. : Vol. 8, Book 76, Hadees 509)

 

इस हदीस से कुछ लोग इस गलतफहेमी का शिकार हो जाते है। अल्लाह इरशाद फरमाता है के... मैं उस के हाथ, पाव, कान और आँख बन जाता हुँ। इस से लोग समझते है के बंदा फनाफिल्लाह हो गया और अब वो अल्लाह ही बन गया, अब जो चाहे कर सकता है, इस का हुकूम कोई टाल नही सकता। इस हदीस को समझने के लिए पुरी हदीस पढना जरूरी है। हदीस में आगे लिखा है के..... अगर मुझ से मांगता है तो मैं उसे देता हुँ, अगर वो किसी दुश्मन या शैतान से मेरी पनाह का तालीब होता है तो मैं उस को महेफुज रखता हुँ और मैं जो काम करना चाहता हुँ उस में मुझे इतना तरददुद (हिचकिचाहट) नही होता जितना की अपने मोमीन बंदे की जान निकालने में होता है वो तो मौत को पसंद नही करता और मुझे भी उस को तकलीफ देना अच्छा नही लगता । अगर बंदा अल्लाह ही बन गया होता तो उसे मांगने की क्या जरूरत? किसी दुश्मन से वो पनाह क्यु तलब करता? और बंदे को मौत क्यु आती?

 
 

क्या वली कबर में जिंदा (zinda) है या नही? क्या मरे हुए इंसान वापस आते है?

बरेलवी (सुन्नी) कहता है के, जब शहीद को मरा हुए कहने से मना किया गया है तो वली को आप मरा हुआ कैसे कह सकते हो, क्युं के वली का मर्तबा तो शहीद से बडा है।

वो अपनी बात मनाने के लिए शहीद की आयत को वली पर फिट कर देते है। कुरआन और हदीस (सहीह) में कही नही लिखा है के वली जिंदा है। इसी तरहा से चारो उलेमा (हनफी, शाफई, मालीकी और हंबली) से भी ये अकिदा साबीत नही है।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है के, शहीद जन्नत में जिंदा है और उन्हे रिûज्क दिया जाता है, तुम्हे इल्म नही। शहीद की रुह हरे रंग के परींदो में बसती है और वो परींदा जन्नत की सैर कर के अर्श के निचे कंदील में आता है। अल्लाह तआला शहीदो से कहता है के, तुझे और क्या चाहिए लेकीन शहीद और कुछ नही मांगता। अब शहीद को अल्लाह तआला का जवाब देना होता है तो वह अल्लाह तआला से कहता है के मुझे दोबारा दुनिया में भेज मैं फिर तेरी राह में कत्ल होकर आना चाहता हुँ। इस पर अल्लाह तआला उन्हे कुछ नही कहता।

लेहाजा शहीद दुनियावी जिंदगी मांग रहा है फिर भी उसे दोबारा दुनिया में अल्लाह तआला नही भेजता तो एक आम इंसान मरने के बाद कैसे दुनिया में वापस कैसे आ सकता है? अगर रूह मरने के बाद वापस आती तो सब से पहेले उस से बदला लेती जिस ने उसे मारा है।


कब्र में वली जिंदा होते है ये अकिदा कैसा है

सुन्नी लोगो का मान्ना है के अल्लाह के वली दुनिया में जैसे जिंदा थे वैसे ही कब्र में जिंदा है।

मरने के बाद दुनियावी जिंदगी मान लेना गलत है क्युं के मरने के बाद वली तो क्या हर कोई जिंदा होता है लेकीन ये जिंदगी दुनियावी नही बलकी बरजख की जिंदगी है। बरजख का मतलब होता है -आड-। अब वो दुनिया से पर्दा है। 

 

क्या मुर्दे कबरो मे आवाज सुनते है?      

मुर्दे इतनी ही आवाज सुनते है जितना के अल्लाह तआला उन्हे सुनाना चाहता है।

जो लोग कहते है के मुर्दे बिल्कुल नही सुनते वो गलत है और जो लोग कहते है के मुर्दे सब सुनते है वो भी गलत है।

 

तिन जगहो पर आता है के मुर्दे आवाज सुनते है।

१।    और बराबर नही है जिंदे और मुर्दे बेशक अल्लाह सुनाता है जिसे चाहे, और तुम नही सुनाने वाले इन्हे जो कबरो में पढे है। (सुरे फातीर (३५), आयत-२२)

२।    हदीस मे आता है के मुर्दा अपनी कबर मे दफना कर जाने वालो की जुतो और चप्पल की आवाज सुनता है।

३।    जंगे बदर मे आप () ने कुपफार के कबर पर जा कर मुर्दो से मुखातीब हो कर फरमाया था क्या तुम्हे वो मिल गया जिस से मै तुम्हे डराया करता था (यानी अजाब)। सहाबा ने रसुलुल्लाह () से पुछा के क्या ये मुर्दे सुन रहे है? आप () ने फरमाया के मै जो कुछ उन से कह रहा हुँ तुम उन से ज्यादा नही सुनते, हा लेकीन ये जवाब नही दे सकते। - ये रसुलुल्लाह () का मोजûजा था । मोहदसीन ने इस हदीस को मोजûजे के चाùपटर में लिखा है। इस हदीस से एक और बात पता चलती है के साहाबा इकराम को इल्म था के मुर्दे नही सुनते इसलिए आप () से इसतरहा का सवाल किया।

Comments

Popular posts from this blog

टखनो के उपर पँट के पायचे

वो काम जो नमाज के दौरान करना जायज है

Makeup, Facial, Waxing, Plucking, Threading, Sar ke baal katna, नकली बाल (wick), जुडा (बुछडा), पैरो में घुंगरु, Namaz me nakli jewellery, kangan, Kaan me bali, आवाज का पर्दा, खुश्बु लगा कर घर से बाहर निकलना, औरत का पर्दा, bemaqsad ghar se niklna, Chahre Ka Parda, बालो को कलर करना