रफयुलदैन मंसुख (Cancel) नही हुआ
रफयुलदैन मंसुख (Cancel) नही हुआ
बरेलवी और देवबंदी हजरात हनफी फिकाह से तालुक रखते है इसलिए ये कहते है के रफयुलदैन बाद में मंसुख (वùŠन्सल) हुआ था। आईये देखते है के उन की इस बात में कितनी सच्चाई है।
अकल की बातः
हनफी मस्लक के मुताबीक नबी-ए-करीम (ﷺ) ने शुरूवाती दिनो में रफयुलदैन किया था और अपनी उम्र के आखरी हिस्से में आप ने रफयुलदैन छोड दिया था।
अकसर ये कहा जाता है के मुनाफीक लोग अपने बगल में बुत को रख कर नमाज पढा करते थे इसलिए नबी-ए-करीम (ﷺ) ने रफयुलदैन का हुकूम दिया था। ये बात किसी भी सहीह या जईफ हदीस से साबीत नही है, ये सिर्फ सुनी सुनाई बात है और एैसी बात करने वालो ने सुन्नत का मजाक उडाया है लेहाजा उन को तौबा करना चाहिए।
१। नमाज मक्का में फर्ज नही थी और बुत मक्का में थे। नमाज मदिने में फर्ज हुई मदिने में बुत नही थे, तो मदिने में किसने बुत लाए?
२। पहेले ही रफयुलदैन में बुत गिर जाते तो इलग से रफयुलदैन करने की क्या जरूरत थी। इसी तरहा से रुकु और सजदो के दौरान ही बुत गिर जाते तो अलग से रफयुलदैन करने की क्या जरूरत थी?
३। बुत लाने वाले को क्या ये पता नही था के बुत गिरने के बाद उन्हे क्या सजा दी जाती।
४। वो लोग बुतो को बगल में क्यु लाते थे अपने जेब में क्यु नही लाते थे?
जाबीर-बिन-समरा (रजि) बयान करते है के रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया, क्या बात है के मैं तुम को इस तरहा हाथ उठाते देखता हुँ गोया के वो सरकश घोडो की दुमें है। नमाज में सुकुन इख्तीयार किया करो (सहीह मुस्लीम, किताबुस सलात, हदीस-४३०)
इस हदीस का अहनाफ गलत मतलब निकाल कर ये कहते है के रसुलुल्लाह (ﷺ) ने रफयुलदैन करने से मना फरमाया । हकीकत ये है के ये हदीस इन लोगो के लिए थी जो नमाज में सलाम करते वक्त अपने सिधे और बाये जानीब के लोगो को हाथ उठा कर सलाम करते थे। इसी की वûजाहत सहीह मुस्लीम की हदीस नं.४३१ में की गई है।
इमाम अबु हनिफा को छोड कर बाकी के तीनो इमाम (शाफई, मलिकी, हंबली) रफयुलदैन करते थे। अगर कोई कहता है के चारो मस्लक हक पर है। तो चार में से तीन ने रफयुलदैन किया और एक ने नही किया तो तीन सही और एक गलत हुआ या एक सही तीन गलत हुए? फैसला खुद कर दिजीए। इमाम अबु हनिफा ने रफयुलदैन इसलिए नही किया होगा क्युंकी हो सकता है की उन के पास रफयुलदैन वाली हदीस ना पहोची हो। लेकीन साथ-साथ इमाम अबु हनिफा ने ये भी कहा था के जब सहीह हदीस मिल जाए तो वही मेरा मजहब है (इब्ने आबीदीन -अल-हाशीया (१/६३)- में) तो इमाम अबु हनिफा ने इन्डायरेक्टली रफयुलदैन करने को कहा है।
जो भी हदिसे रफयुलदैन के मंसुख (रद) होने पर पेश की जाती है वो तमाम जईफ हदीस है। किसी भी सहीह हदीस से रफयुलदैन का मंसुख होना साबीत नही है और यही रफयुलदैन मंसुख ना होने की दलील है।
अगर रफयुलदैन मंसुख होता तो आज भी अहनाफ (बरेल्वी, देवबंदी) वितर की नमाज में और ईद की नमाज में रफयुलदैन क्यु करते है?
हदीस जो बताती है के नबी-ए-करीम (ﷺ) ने हर दौर में रफयुलदैन किया थाः
१। सय्यदना अब्दुल्लाह-बिन-उमर (रजि) से रिवायत है के मै ने रसुलुल्लाह (ﷺ) को देखा के, आप जब भी नमाज के लिए खडे होते तो कांधो तक रफयुलदैन करते, रुकू करते वक्त भी आप इसी तरहा करते थे और जब रुकु से सर उठाते तो इसी तरहा करते थे और फरमाते : -समिअल्लाहु लिमन हमीदाह- और सजदे में आप एैसा नही करते थे (सहीह बुखारी-७३६)।
इस हदीस में उमर (रजि) के बेटे अब्दुल्लाह फरमाते है के रसुलुल्लाह (ﷺ) जब भी नमाज पढते थे वो रफयुलदैन करते थे।
२। सय्यदीना अब्दुल्लाह-बिन-उमर (रजि) ने एक हदीस में फरमाया, रसुलुल्लाह (ﷺ) ने अपनी जिंदगी के आखरी दौर में हमें ईशा की नमाज पढाई फिर जब आप ने सलाम फेरा तो खडे हो गए।।।। [Sahih Bukhari, Hadith No।११६।५६४।६०१, Sahih Muslim ६४७९, Abu Dawud ४३४८, Tirmizi २२५१]
इस बात से पता चला के उमर (रजि) के बेटे अब्दुल्लाह ने रसुलुल्लाह (ﷺ) को आखरी दौर में नमाज पढते हुए देखा था लेहाजा रसुलुल्लाह (ﷺ) का आखरी दौर में भी रफयुलदैन करना साबीत हुआ।
३। वईल-बिन-हजर फरमाते है, मै नें नबी-ए-अकरम (ﷺ) को देखा, जब आप नमाज शुरू करते तो अल्लाहु अकबर कहते और अपने दोनो हाथ उठाते। फिर अपने हाथ कपडे में ढांक लेते, फिर दाया हाथ बाये हाथ पर रखते। जब रुकू करने लगते तो कपडो से हाथ निकालते अल्लाहु अकबर कहते और रफयुलदैन करते, जब रुकू से उठते तो -समिअल्लाहु लिमन हमीदाह- कहते और रफयुलदैन करते (सहीह मुस्लीम-४०१, किताबुस सलात)
वईल-बिन-हजर ९ हिजरी मे रसुलुल्लाह (ﷺ) के पास आए थे। (अल बिदाया वल निहाया, जिल्द-५, पेज-७१)
एैनी हनफी फरमाते है - वईल-बिन-हजर मदिने में ९ हिजरी में इस्लाम कुबुल किया था (उमदा-तुल कारी, जिल्द-५, पेज-२७४, हदीस नं.७३५)
सहीह इब्ने हब्बान, जिल्द-३, पेज-१६९, हदीस नं.१८५७ में ये जिक्र किया गया है की वईल-बिन-हजर रसुलुल्लाह (ﷺ) से अगले साल सर्दी के मौसम में फिर मिले थे (मतलब १० हिजरी में) और उन्हो ने इस साल भी रसुलुल्लाह (ﷺ) के रफयुलदैन करते हुए देखा (सुनन अबी दाऊद-७२७)
लेहाजा साबीत हुआ के रसुलुल्लाह (ﷺ) १० हिजरी यानी अपने आखरी दौर तक रफयुलदैन करते थे, ११ हिजरी में नबी-ए-रहेमत ने वफात पाई।
ताबयीन के रफयुलदैन करने की दलीलेः
अगर रसुलुल्लाह (ﷺ) रफयुलदैन करना बंद कर देते तो आप की वफात के बाद सहाबा इकराम, ताबयीन और तबे-ताबयीन रफयुलदैन ना करते।
४। सईद-बिन-जुबैर (ताबयीन) से नमाज में रफयुलदैन के तालुक से पुछा गया उन्हो ने फरमाया, ये लोगो के नमाज की खुबसुरती है और रसुलुल्लाह के सहाबी (रजि) नमाज शुरू करते वक्त, रुकु से पहेले और रुकु के बाद रफयुलदैन करते थे। (सुनन अल-कुबरा बेहाकी, जिल्द-२, पेज-७५, हदीस-२३५५, शेख जुबेर अली ûजाई ने इसे सहीह कहा)
५। हसन बसरी (ताबयीन) ने कहा, रसुलुल्लाह (ﷺ) के साहाबा रुकु में और रुकू से उठने के बाद रफयुलदैन करते थे एैसा जैसे वो पंखे हो। (जुûज-अल- रफयुलदैन हदीस नं.२९, शेख जुबेर अली ûजाई ने इसे सहीह कहा)
तबे ताबयीन के रफयुलदैन करने की दलीलेः
६। अय्युब अल-सुख्तीयानी (रहे) के शागीर्द (तबे ताबयीन) हम्माद-बिन-जैद (रहे) भी शुरू नमाज, रुकु से पहेले और रुकु के बाद रफयुलदैन करते थे। (सुनन कुबरा बैहाकी)
७। इमाम बुखारी ने पुरी एक किताब तैयार की है -जुûज रफयुलदैन- नाम की और उन्हो ने उस किताब में १०० से ज्यादा हदीस लिख कर साबीत किया है की हर मुसलमान और जो सुन्नत से मोहब्बत रखता है उसे रफयुलदैन करना चाहिए।
८। अव्वल जमाने में जितने मोहदसीन (हदीस लिखने वाले) थे वो सब रफयुलदैन किया करते थे। इमाम बुखारी, इमाम मुस्लीम, इमाम अबु दाऊद, इमाम तिरमीजी, इमाम नसाई, इमाम इब्ने माजा, और बाकी इमाम भी। और ये बात सुन्नी बरेल्वी हनफी शेख ताहीरूल कादरी भु तस्लीम करते है। ये लिंक देखीए -https://www.youtube.com/watch?v=०P६-६५VpxiM
अगर रसुलुल्लाह (ﷺ) रफयुलदैन करना छोड देते तो उलेमा, मोहदसीन और इमाम कभी रफयुलदैन नही करते क्युं के सब रसुलुल्लाह (ﷺ) के बाद आए, इन तमाम को रफयुलदैन मंसुख होने का इल्म जरूर होता क्युंके ये अव्वल जमाने के उलेमा और मोहदसीन थे। इसी तरहा से इन में से किसी ने नही कहा के रफयुलदैन मंसुख हो गया था बल्की ये सब कसरत से रफयुलदैन करते थे।
मालुम हुआ के रफयुलदैन पर नबी के दौर में, सहाबा के दौर में, ताबयीन और तबे ताबयीन के दौर में और हर जमाने में अमल होता होता लेहाजा इसे मंसुख समझना और झुठे किस्सो के साथ इस का मजाक उडाना सुन्नत का मजाक उडाना है।
जिन हदीस से रफयुलदैन ना करने की दलील ली जाती है इन का मुख्तेसर तजजीया (analysis)
१। अबु दाऊद की हदीस नं.७४९, रावी- अल-बारा इब्ने आûजीब कहते है के अल्लाह के रसुल (ﷺ) जब नमाज शुरू करते तो अपने कानो तक हाथ उठाया करते थे, फिर उस के बाद उन्हे ने एैसा नही किया। - ये हदीस जईफ है।
इमाम नवावी फरमाते है के ये हदीस जईफ है इसे सुफियान-बिन-ओयना, इमाम शाफई, इमाम बुखारी के उस्ताद इमाम हमिदी और इमाम अहमद-बिन हंबल जैसे उलेमाओ ने इस हदीस को जईफ करार दिया है।
२। अबु दाऊद की हदीस नं.७४८ रावी, अब्दुल्लाह इब्ने मसुद (रजि) कहते है के, क्या मैं तुम्हे रसुल (ﷺ) की नमाज पढाऊ? पस आप ने नमाज पढी और सिर्फ पहिली मर्तबा हाथ उठाए।
इमाम अबु दाऊद ने खुद इस हदीस को जईफ कहा।
इसी तरहा से इमाम तिरमीजी ने अब्दुल्लाह-बिन-मुबारक का कौल नकल किया है --अब्दुल्लाह-बिन-मसुद के तरक रफयुलदैन की हदीस साबीत नही है-- (तिरमीजी-२५४)
इमाम इब्ने हिब्बान ने तो यहा तक लिख दिया है के, इस में बहोत सी इल्लते है जो इसे बातील बना रही है।
३। जाबीर-बिन-समरा (रजि) बयान करते है के रसुलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया, क्या बात है के मैं तुम को इस तरहा हाथ उठाते देखता हुँ गोया के वो सरकश घोडो की दुमें है। नमाज में सुकुन इख्तीयार किया करो (सहीह मुस्लीम, किताबुस सलात, हदीस-४३०)
इमाम नवावी -अल-मजमुआ- में फरमाते है के, जाबीर-बिन समराह (रजि) की रिवायत से रूकु में जाते वक्त और उठते वक्त रफयुलदैन ना करने की दलील लेना अजीब बात है...... इस के बाद इमाम नवावी, इमाम बुखारी का कौल नकल करते है की, इस हदीस से बाज जाहील लोगो का दलील पकडना सही नही है क्युं के ये सलाम के वक्त हाथ उठाने के बारे में है.....
४। अब्दुल्लाह-बिन-मसुद (रजि) ने फरमाया, मैं ने रसुलुल्लाह (ﷺ) और अबुबकर और उमर (रजि) के साथ नमाज पढी ये लोग शुरू नमाज के अलावा हाथ नही उठाते थे (बेहाकी, जिल्द-२, पेज-७९-८०)
इमाम दार-ए-कुतनी लिखते है के इसका रावी मुंहम्मद-बिन-जाबीर जईफ है। और बाज उलेमा (इमाम इब्ने जौûजी और इमाम इब्ने तैमिया वगैरा) ने इसे मौजु (झुठी) हदीस कहा है।
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